भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ९]
अयोध्याकाण्ड
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदामिभिदुद्राव रघूत्तमं शुचा<br>हर्षाच्च तत्पादयुगं त्वराग्रहीत् ॥६॥हर्ष और शोकयुक्त होकर तुरन्त उनके चरण-युगल पकड़ लिये ॥ ६ ॥
रामस्तमाकृष्य सुदीर्घबाहु-<br>र्दोर्भ्यां परिष्वज्य सिषिञ्च नेत्रजैः ।<br>जलैरथाङ्कोपरि संन्यवेशयत्<br>पुनः पुनः संपरिपस्वजे विभुः ॥७॥बड़ी भुजाओंवाले श्रीरामचन्द्रजीने अपनी दोनों बाहुओंसे उन्हें उठाकर आलिङ्गन किया और उन्हें गोदमें बैठाकर अपने आँसुओंसे सींचते हुए बारम्बार हृदय लगाया ॥ ७ ॥
अथ ता मातरः सर्वाः समाजग्मुस्त्वरान्विताः ।<br>राघवं द्रष्टुकामास्तास्तृषार्ता गौर्रथा जलम् ॥८॥फिर प्यासी गौएँ जिस प्रकार जलकी ओर दौड़ती हैं उसी प्रकार कौसल्या आदि समस्त माताएँ रघुनाथजीको देखनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चलीं ॥ ८ ॥
रामः स्वमातरं वीक्ष्य द्रुतमुत्थाय पादयोः ।<br>ववन्दे साश्रु सा पुत्रमालिङ्ग्यातीव दुःखिता ॥९॥रामजीने अपनी माताको देखते ही शीघ्रतासे उठकर उनका चरण-वन्दन किया और उन्होंने अत्यन्त दुःखसे नेत्रोंमें जल भरकर पुत्रको हृदयसे लगाया ॥ ९ ॥
इतराश्च तथा नत्वा जननी रघुनन्दनः ।<br>ततः समागतं दृष्ट्वा वसिष्ठं मुनिपुङ्गवम् ॥१०॥फिर श्रीरघुनाथजीने उसी प्रकार अन्य माताओंको भी प्रणाम किया।<br>तदनन्तर, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीको आते देख ॥ १० ॥
साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह धन्योऽस्मीति पुनः पुनः ।<br>यथार्हमुपवेश्याह सर्वानैव रघूद्वहः ॥११॥उन्हें साष्टांग प्रणामकर बारम्बार कहने लगे 'मैं धन्य हूँ, मैं धन्य हूँ !'<br>फिर श्रीरघुनाथजीने सबको यथायोग्य बैठाकर पूछा— ॥ ११ ॥
पिता मे कुशली किंवा मां किमाहातिदुःखितः ।<br>वसिष्ठस्तमुवाचेदं पिता ते रघुनन्दन ॥१२॥"कहिये, हमारे पिताजी कुशलसे हैं ? उन्होंने मेरे वियोगसे अत्यन्त दुःखातुर होकर मेरिलिये क्या आज्ञा दी है ?" तब वसिष्ठजीने कहा—
त्वद्वियोगाभितप्तात्मा त्वामेव परिचिन्तयन् ।<br>रामरामेति सीतेति लक्ष्मणेति ममार ह ॥१३॥"हे रघुनन्दन ! तुम्हारे पिताने तुम्हारे वियोगसे अति सन्तप्त होकर 'हे राम ! हे राम ! हे सीते ! हे लक्ष्मण !' इस प्रकार तुम्हारा ही चिन्तन करते हुए अपने प्राण छोड़ दिये" ॥ १२-१३ ॥
श्रुत्वा तत्कर्णशूलाभं गुरोर्वचनमञ्जसा ।<br>हा हतोऽस्मीति पतितो रुदन् रामः सलक्ष्मणः ॥१४॥कानोंमें शूलके समान लगनेवाले गुरुके इन वचनों-को सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण 'हाय ! हम मारे गये' इस प्रकार रोते हुए सहसा गिर पड़े ॥ १४ ॥
ततोऽनुरुददुः सर्वा मातरश्च तथापरे ।<br>हा तात मां परित्यज्य क्व गतोऽसि घृणाकर ॥१५॥तब समस्त माताएँ और अन्यान्य सभी उपस्थित लोग रोने लगे। श्रीरामचन्द्रजी बारम्बार कहने लगे—"हा तात ! हे दयामय ! आप मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ १५ ॥
अनाथोऽस्मि महाबाहो मां को वा लालयेदितः ।<br>सीता च लक्ष्मणश्चैव विलेपतुग्तो भृशम् ॥१६॥हे महाबाहो ! मैं अनाथ हो गया; अब मुझे कौन लाड़ लड़ायेगा।" फिर इसी प्रकार सीता और लक्ष्मण भी बहुत विलाप करने लगे ॥ १६॥
वसिष्ठः शान्तवचनैः शमयामास तां शुचम् ।<br>ततो मन्दाकिनीं गत्वा स्नात्वा ते वीतकल्मषाः ॥१७॥तब वसिष्ठजीने शान्तिमय वाक्योंसे वह शोक शान्त किया और फिर सब लोग मन्दाकिनीपर जाकर स्नान करके पवित्र हुए ॥ १७ ॥
राज्ञे ददुर्जलं तत्र सर्वे ते जलकाङ्क्षिणे ।<br>पिण्डान्निर्वपयामास रामो लक्ष्मणसंयुतः ॥१८॥वहाँ सबने जलकांक्षी महाराज दशरथको जलाञ्जलि दी तथा लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजीने पिण्डदान किया ॥ १८ ॥ 'जो