अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ९२ | अध्यात्मरामायणं | [सर्ग ९ |
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| ददर्श दूरादतिभासुरं शुभं<br>रामस्य गेहं मुनिवृन्दसेवितम् ।<br>वृक्षाग्रसंलग्नसुवल्कलाजिनं<br>रामाभिरामं भरतः सहानुजः ॥ ६६॥ | मुनिजनसेवित अति सुन्दर और भासमान सुन्दर भवन देखा। जिसमें वृक्षकी शाखापर वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म टँग हुए थे और श्रीरामचन्द्रजीके वास करनेके कारण जो परम रमणीक था ॥ ६६ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवम सर्ग
भगवान् राम और भरतका मिलन, भरतजीका अयोध्यापुरीको लौटना और श्रीरामचन्द्रजीका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाना ।
</div>| श्रीमहादेव उवाच<br>अथ गत्वाऽऽश्रमपदसमीपं भरतो मुदा ।<br>सीतारामपदैर्युक्तं पवित्रमतिशोभनम् ॥ १ ॥ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीभरतजी अति मग्न मनसे सीता और रामके चरण-चिह्नोंसे सुशोभित आश्रमके समीप अति सुन्दर और पवित्र स्थलमें पहुँचे ॥ १ ॥ |
| स तत्र वज्राङ्कुशवारिजाञ्चित-<br>ध्वजादिचिह्नानि पदानि सर्वतः ।<br>ददर्श रामस्य भुवोऽतिमङ्गला-<br>न्यचेष्टयत्पादरजःसु सानुजः ॥ २ ॥ | वहाँ उन्होंने सब ओर भगवान् रामचन्द्रके वज्र, अंकुश, कमल और ध्वजा आदिके चिह्नोंसे सुशोभित तथा पृथिवीके लिये अति मंगलमय चरण-चिह्न देखे । उन्हें देखकर भाई शत्रुघ्नके सहित वे उस चरण-रजमें लोटने लगे ॥ २ ॥ |
| अहो सुधन्योऽहममूनि राम-<br>पादाराविन्दाङ्कितभूतलानि ।<br>पश्यामि यत्पादरजो विमृग्यं<br>ब्रह्मादिदेवैः श्रुतिभिश्च नित्यम् ॥ ३ ॥ | और मन-ही-मन कहने लगे—<br>“अहो ! मैं परम धन्य हूँ, जो आज श्रीरामचन्द्रजीके उन चरणारविन्दोंके चिह्नोंसे सुशोभित भूमिको देख रहा हूँ जिनकी रजको ब्रह्मा आदि देवगण और सम्पूर्ण श्रुतियाँ भी सदा खोजती रहती हैं” ॥ ३ ॥ |
| इत्यद्भुतप्रेमरसाप्लुताशयो<br>विगाढचेता रघुनाथभावने ।<br>आनन्दजाश्रुस्नापितस्तनान्तरः<br>शनैरवापाश्रमसन्निधिं हरेः ॥ ४ ॥ | इस प्रकार जिनका हृदय अद्भुत प्रेमरससे भरा हुआ है, मन रघुनाथजीकी भावनामें डूबा हुआ है तथा वक्षःस्थल आनन्दाश्रुओंसे भीगा हुआ है वे भरतजी धीरे-धीरे श्रीहरिके आश्रमके निकट पहुँचे ॥ ४ ॥ |
| स तत्र दृष्ट्वा रघुनाथमास्थितं<br>दूर्वादलश्यामलमयतैक्षणम् ।<br>जटाकिरीटं नववल्कलाम्बरं<br>प्रसन्नवक्त्रं तरुणाणद्युतिम् ॥ ५ ॥<br>विलोकयन्तं जनकात्मजां शुभां<br>सौमित्रिणा सेवितपादपङ्कजम् । | वहाँ उन्होंने दूर्वा-दलके समान श्याम-शरीर और विशाल-नयन श्रीरघुनाथजीको बैठे हुए देखा, जो जटाओं-का मुकुट और नवीन वल्कल-वस्त्र धारण किये थे तथा प्रसन्नवदन और नवीन सूर्यके समान प्रभायुक्त थे ॥ ५ ॥ एवं जो शुभलक्षणा श्रीजनक-नन्दिनीकी ओर निहार रहे थे तथा श्रीलक्ष्मणजी जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। उन्हें देखते ही श्रीभरतजीने दौड़कर |