अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ८ ] अयोध्याकाण्ड ९१
| आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि ससैन्यस्य तवानघ ।<br>अद्य भुक्त्वा ससैन्यस्त्वं श्वो गन्ता रामसन्निधिम् ॥५४॥ | सहित तुम्हारा आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ । आज सेनासहित तुम यहीं भोजन करो, कल रामके पास जाना" ॥५४॥ |
| यथाऽऽज्ञापयति भवांस्तथेति भरतोऽब्रवीत् ।<br>भरद्वाजस्त्वपः स्पृष्ट्वा मौनी होमगृहे स्थितः ॥५५॥ | भरतजीने कहा—"आपकी जैसी आज्ञा होगी, वही होगा।" तब मुनिवर भरद्वाज आचमन कर मौन होकर यज्ञशालामें बैठे ॥५५॥ |
| दध्यौ कामदुघां कामवर्षिणीं कामदो मुनिः ।<br>असृजत्कामधुक् सर्वं यथाकाममलौकिकम् ॥५६॥ | वहाँ बैठकर उन कामप्रद मुनीश्वरने समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुका स्मरण किया । तब उस कामधेनुने इच्छानुसार सम्पूर्ण अलौकिक भोग प्रस्तुत कर दिये ॥ ५६ ॥ |
| भरतस्य ससैन्यस्य यथेष्टं च मनोरथम् ।<br>यथा ववर्ष सकलं तृप्तांस्ते सर्वसैनिकाः ॥५७॥ | उसने सेनाके सहित भरतजीके सम्पूर्ण मनोरथोंको इस प्रकार पूर्ण किया जिससे वे समस्त सैनिक सन्तुष्ट हो गये ॥५७॥ |
| वसिष्ठं पूजयित्वाग्रे शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।<br>पश्चात्ससैन्यं भरतं तर्पयामास योगिराट् ॥५८॥ | फिर उन योगिराजने शास्त्रानुकूल प्रथम वसिष्ठजीकी पूजा की और तदनन्तर सेनाके सहित भरतजीको तृप्त किया ॥५८॥ |
| उषित्वा दिनमेकं तु आश्रमे स्वर्गसन्निभे ।<br>अभिवाद्य पुनः प्रातर्भरद्वाजं सहानुजः ।<br>भरतस्तु कृतानुज्ञः प्रययौ रामसन्निधिम् ॥५९॥ | इस प्रकार उस स्वर्ग-सदृश आश्रममें एक दिन रहकर प्रातःकाल मुनिवरको प्रणाम कर उनकी आज्ञा ले भाईके सहित भरतजी रामचन्द्रजीके पास चले ॥५९॥ |
| चित्रकूटमनुप्राप्य दूरे संस्थाप्य सैनिकान् ।<br>रामसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ भरतः स्वयम् ॥६०॥ | चित्रकूटके निकट पहुँचनेपर उन्होंने सैनिकोंको दूर खड़ा कर दिया और स्वयं राम-दर्शनकी लालसासे आगे बढ़े ॥६०॥ |
| शत्रुघ्नेन सुमन्त्रेण गुहेन च परन्तपः ।<br>तपस्विमण्डलं सर्वं विचिन्वानो न्यवर्तत ॥६१॥ | परंतप भरतजी शत्रुघ्न, सुमन्त्र और गुहके साथ समस्त तपस्वियोंके आश्रमोंमें खोजते-खोजते फिर आये ॥६१॥ |
| अदृष्ट्वा रामभवनमपृच्छदृषिमण्डलम् ।<br>कुत्रास्ते सीतया सार्धं लक्ष्मणेन रघूत्तमः ॥६२॥ | किन्तु उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कुटी कहीं न मिली। तब उन्होंने ऋषि-मण्डलीसे पूछा—"सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजी कहाँ रहते हैं?" ॥६२॥ |
| ऊचुरग्रे गिरेः पश्चाद्गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>विविक्तं रामसदनं रम्यं काननमण्डितम् ॥६३॥ | उन्होंने कहा—"सामनेवाले पर्वतके उस ओर श्रीमन्दाकिनीके उत्तरीय तटपर वनावलीसे सुशोभित रामकी परम रमणीक एकान्त कुटी है ॥६३॥ |
| सफलैराम्रपनसैः कदलीखण्डसंवृतम् ।<br>चम्पकैः कोविदारैश्च पुन्नागैर्विपुलैस्तथा ॥६४॥ | वह फलयुक्त आम्रवृक्ष, पनस और कदलीखण्ड (केलेकी क्यारियों) से घिरी हुई है। तथा उसके चारों ओर बहुत-से चम्पक, कोविदार और पुन्नाग आदिके भी वृक्ष सुशोभित हैं" ॥६४॥ |
| एवं दर्शितमालोक्य मुनिभिर्भरतोऽग्रतः ।<br>हर्षाययौ रघुश्रेष्ठभवनं मन्त्रिणा सह ॥६५॥ | मुनियोंके इस प्रकार बतलानेपर भरतजी प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रियोंको साथ ले सबसे आगे रघुनाथजीके निवास-स्थानको चले ॥६५॥ आगे बढ़नेपर उन्होंने दूरहीसे रामका |