अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ९० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| दूरे स्थाप्य महासैन्यं भरतः सानुजो ययौ ॥४१॥<br>आश्रमे मुनिमासीनं ज्वलन्तमिव पावकम् ।<br>दृष्ट्वा ननाम भरतः साष्टाङ्गमतिमक्तितः ॥४२॥ | मुनिके आश्रमकी ओर चले। वहाँ अपनी महान् सेनाको आश्रमसे दूर छोड़कर भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी आश्रमपर गये ॥४१॥ और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी मुनिवर भरद्वाजको आश्रममें बैठे देख उन्हें अति भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम किया ॥ ४२ ॥ |
| ज्ञात्वा दाशरथिं प्रीत्या पूजयामास मौनिराट् ।<br>पप्रच्छ कुशलं दृष्ट्वा जटावल्कलधारिणम् ॥४३॥<br>राज्यं प्रशासत्तस्तेऽद्य किमेतद्वल्कलादिकम् ।<br>आगतोऽसि किमर्थं त्वं विपिनं मुनिसेवितम् ॥४४॥ | मुनीश्वरको जब मालूम हुआ कि वे दशरथनन्दन भरत हैं तो उन्होंने प्रीतिपूर्वक उनकी पूजा की और उन्हें जटा-वल्कलादि धारण किये देख कुशल-प्रश्नके अनन्तर पूछा—॥४३॥ "भाई भरत ! राज्य-शासन करते हुए तुमने आज यह वल्कलादि कैसे धारण कर लिये और इस मुनिजनसेवित तपोवनमें तुम किसलिये आये हो ?" ॥४४॥ |
| भरद्वाजवचः श्रुत्वा भरतः साश्रुलोचनः ।<br>सर्वं जानासि भगवन् सर्वभूताशयस्थितः ॥४५॥<br>तथापि पृच्छसे किञ्चित्तदनुग्रह एव मे ।<br>कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्यविघातनम् ॥४६॥<br>वनवासादिकं वापि नाहि जानामि किञ्चन ।<br>भवत्पादयुगं मेऽद्य प्रमाणं मुनिसत्तम ॥४७॥ | भरद्वाजके ये वचन सुनकर भरतने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भगवन् ! आप सब जानते हैं, क्योंकि आप सर्वान्तर्यामी हैं ॥४५॥ फिर भी आप जो पूछ रहे हैं वह मेरे ऊपर आपकी कुछ कृपा ही है। कैकेयीने श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित करनेवाला और वनवासादि-विषयक जो कुछ कार्य किया है, हे मुनिश्रेष्ठ ! आपके चरणोंकी साक्षी करके कहता हूँ; मुझे उसके विषयमें कुछ भी पता नहीं था" ॥४६-४७॥ |
| इत्युक्त्वा पादयुगलं मुनेः स्पृष्ट्वाऽऽर्त्तमानसः ।<br>ज्ञातुमर्हसि मां देव शुद्धो वाऽशुद्ध एव वा ॥४८॥ | ऐसा कह उन्होंने अति आर्त्तचित्त हो मुनिके चरण-युगल पकड़कर कहा—"भगवन् ! आप स्वयं जान सकते हैं कि मैं दोषी हूँ या निर्दोष ॥४८॥ |
| मम राज्येन किं स्वामिन् रामे तिष्ठति राजनि।<br>किङ्करोऽहं मुनिश्रेष्ठ रामचन्द्रस्य शाश्वतः ॥४९॥ | हे स्वामिन् ! महाराज रामके रहते हुए मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है ? हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो सदासे ही श्रीरामचन्द्रका दास हूँ ॥४९॥ |
| अतो गत्वा मुनिश्रेष्ठ रामस्य चरणान्तिके ।<br>पतित्वा राज्यसम्भारान् समर्प्यैत्रैव राघवम्॥५०॥<br>अभिषेक्ष्ये वसिष्ठाद्यैः पौरजानपदैः सह ।<br>नेष्येऽयोध्यां रमानाथं दासः सेवेऽतिनीचवत् ॥५१॥ | अतः हे मुनिनाथ ! मैं श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें पड़कर यह सारी राजपाटकी सामग्री उन्हें यहीं सौंप दूँगा ॥५०॥ तथा वसिष्ठ आदि पुरजन और जनपदवासियोंके साथ मिलकर उनका राज्याभिषेक कर अयोध्या ले जाऊँगा और अति तुच्छ दासके समान उन लक्ष्मीपतिकी सेवा करूँगा" ॥५१॥ |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य भरतस्य वचो मुनिः ।<br>आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय प्रशंस सविस्मयः॥५२॥ | मुनीश्वरने भरतके ये उद्गार सुनकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और विस्मयपूर्वक शिर सूँघकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥५२॥ |
| वत्स ज्ञातं पुरैवैतद्भवष्यिं ज्ञानचक्षुषा ।<br>मा शुचस्त्वं परो भक्तः श्रीरामे लक्ष्मणादपि ॥५३॥ | वे बोले—"बेटा ! अपने ज्ञानचक्षुओंसे मैंने पहले ही ये होनेवाली बातें जान ली थीं। तुम शोक न करो; तुम तो लक्ष्मणकी अपेक्षा भी रामके परम भक्त हो ॥५३॥ हे अनघ ! मैं सेनाके |