भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ८ ]अयोध्याकाण्ड८९
गुहेन सहितस्तत्र यत्र रामः स्थितो निशि ।<br>ययौ ददर्श शयनस्थलं कुशसमास्तृतम् ॥२७॥<br>सीताऽऽभरणसंलग्नस्वर्णबिन्दुभिरञ्चितम् ।<br>दुःखसन्तप्तहृदयो भरतः पर्यदेवयत् ॥२८॥<br>अहोऽतिसुकुमारी या सीता जनकनन्दिनी ।<br>प्रासादे रत्नपर्यङ्के कोमलास्तरणे शुभे ॥२९॥<br>रामेण सहिता शेते सा कथं कुशविष्टरे ।<br>सीता रामेण सहिता दुःखेन मम दोषतः ॥३०॥<br>धिङ् मां जातोऽस्मि कैकेय्यां पापराशिसमानतः।<br>मन्निमित्तमिदं क्लेशं रामस्य परमात्मनः ॥३१॥<br>अहोऽतिसफलं जन्म लक्ष्मणस्य महात्मनः।<br>राममेव सदान्वेति वनस्थमपि हृष्टधीः ॥३२॥<br>अहं रामस्य दासा ये तेषां दासस्य किङ्करः।<br>यदि स्यां सफलं जन्म मम भूयान्न संशयः ॥३३॥<br>भ्रातर्जानासि यदि तत्कथयस्व ममाखिलम्।<br>यत्र तिष्ठति तत्राहं गच्छाम्यानेतुमञ्जसा ॥३४॥इस प्रकार विरहव्याकुल हुए वे गुहके साथ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रात्रिके समय श्रीरामने निवास किया था। वहाँ जाकर उन्होंने उस कुशा बिछे हुए शयन-स्थानको देखा ॥ २७॥ वह सीताजीके आभूषणोंसे झड़े हुए सुवर्णकणोंसे सुशोभित था। उसे देखकर भरतजीका हृदय दुःखसे भर आया और वे इस प्रकार विलाप करने लगे—॥ २८ ॥ “अहो ! जो अति सुकुमारी जनकदुलारी सीता राजमहलमें कोमल बिछौनेसे युक्त अति सुन्दर रत्नपर्यङ्कपर श्रीरघुनाथजीके साथ शयन किया करती थीं वे ही मेरे दोषसे श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस कुशाओंकी साथरीपर किस प्रकार क्लेशपूर्वक सोती होंगी ? ॥ २९-३० ॥ मुझे धिक्कार है ! जो मैं मूर्त्तिमान् पापपुञ्जके समान कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ । हाय ! मेरेलिये ही परमात्मा रामको यह क्लेश उठाना पड़ा ! ! ॥ ३१ ॥ अहा ! महात्मा लक्ष्मणका जन्म अत्यन्त सफल है जो भगवान् रामके वनमें रहते समय भी सदा प्रसन्नमनसे उन्हींका अनुसरण करते हैं ॥३२॥ जो लोग रामके दास हैं उनके दासोंका दास भी यदि मैं हो जाऊँ तो मेरा जन्म सफल हो जाय—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ भाई ! यदि तुम्हें मालूम हो तो मुझे यह सब बताओ कि राम कहाँ हैं ? वे जहाँ कहीं भी होंगे, मैं उन्हें तुरन्त लानेके लिये वहीं जाऊँगा” ॥३४॥
गुहस्तं शुद्धहृदयं ज्ञात्वा सस्नेहमब्रवीत् ।<br>देव त्वमेव धन्योऽसि यस्य ते भक्तिरीदृशी ॥३५॥<br>रामे राजीवपत्राक्षे सीतायां लक्ष्मणे तथा।<br>चित्रकूटाद्रिनिकटे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥३६॥<br>मुनीनामा श्रमपदे रामस्तिष्ठति सानुजः।<br>जानक्या सहितो नन्दन्सुखमास्ते किल प्रभुः॥३७॥<br>तत्र गच्छामहे शीघ्रं गङ्गां तर्तुमिहार्हसि ।<br>इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा नावः पञ्चशतानि ह ॥३८॥<br>समानयत्तत्सैन्यस्य तर्तुं गङ्गां महानदीम् ।<br>स्वयमवानिनायैकां राजनावं गुहस्तदा ॥३९॥<br>आरोप्य भरतं तत्र शत्रुघ्नं राममातरम् ।<br>वसिष्ठं च तथान्यत्र कैकेयीं चान्ययोषितः ॥४०॥<br>तीर्त्वा गङ्गां ययौ शीघ्रं भरद्वाजाश्रमं प्रति।गुहने उनका चित्त शुद्ध देखकर स्नेहपूर्वक कहा—“स्वामिन् ! आपकी कमलनयन राम, सीता और लक्ष्मणमें ऐसी विशुद्ध भक्ति है, अतः आप ही धन्य हैं। छोटे भाई लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्र चित्रकूट-पर्वतके पास मन्दाकिनी नदीके समीप मुनियोंके आश्रममें रहते हैं। वहाँ जानकीके सहित भगवान् राम आनन्द और सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३५—३७॥ चलिये, शीघ्र ही हमलोग वहाँ चलें। पहले आपलोग यहाँ गङ्गाजी पार कर लें।” ऐसा कहकर उसने तुरन्त ही सेनाके सहित भरतजीको गङ्गाजीसे पार करनेके लिये पाँच सौ नावें मँगवायीं और स्वयं एक राजनौका ले आया ॥ ३८-३९ ॥ उसमें भरत, शत्रुघ्न, रामकी माता कौसल्या और वसिष्ठजीको चढ़ाया तथा एक दूसरी नावमें कैकेयी आदि अन्य राजमहिलाओंको सवार किया ॥४०॥<br><br>इस प्रकार शीघ्र ही गङ्गाजीको पार कर वे भरद्वाज

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