अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ८८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८] |
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कौसल्याद्या राजदारा वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।<br>छादयन्तो भुवं सर्वे पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥१३॥<br>शृङ्गवेरपुरं गत्वा गङ्गाकूले समन्ततः ।<br>उवास महती सेना शत्रुघ्नपरिचोदिता ॥१४॥<br>आगतं भरतं श्रुत्वा गुहः शङ्कितमानसः ।<br>महत्या सेनया सार्धमागतो भरतः किल ॥१५॥<br>पापं कर्तुं न वा याति रामस्याविदितात्मनः ।<br>गत्वा तद्धृदयं ज्ञेयं यदि शुद्धस्तरिष्यति ॥१६॥<br>गङ्गां नोचेत्समाकृष्य नावास्तिष्ठन्तु सायुधाः ।<br>ज्ञातयो मे समात्ताः पश्यन्तः सर्वतोदिशम् ॥१७॥<br>इति सर्वान्समादिश्य गुहो भरतमागतः ।<br>उपायनानि संगृह्य विविधानि बहून्यपि ॥१८॥<br>प्रययौ ज्ञातिभिः सार्धं बहुभिर्विविधायुधैः ।<br>निवेश्योपायनान्यग्रे भरतस्य समन्ततः ॥१९॥<br>दृष्ट्वा भरतमासीनं सानुजं सह मन्त्रिभिः ।<br>चीराम्बरं घनश्यामं जटामुकुटधारिणम् ॥२०॥<br>राममेवानुशोचन्तं रामरामेति वादिनम् ।<br>ननाम शिरसा भूमौ गुहोऽहमिति चाब्रवीत् ॥२१॥<br>शीघ्रमुत्थाप्य भरतो गाढमालिङ्ग्य सादरम् ।<br>पृष्ट्वानामयमव्यग्रः सखायमिदमब्रवीत् ॥२२॥<br>भ्रातस्त्वं राघवेणात्र समेतः समवस्थितः ।<br>रामेणालिङ्गितः सार्द्रनयनेनामलात्मना ॥२३॥<br>धन्योऽसि कृतकृत्योसि यत्त्वया परिभाषितः ।<br>रामो राजीवपत्राक्षो लक्ष्मणेन च सीतया ॥२४॥<br>यत्र रामस्त्वया दृष्टस्तत्र मां नय सुव्रत ।<br>सीतया सहितो यत्र सुप्तस्तद्दर्शयस्व मे ॥२५॥<br>त्वं रामस्य प्रियतमो भक्तिमानसि भाग्यवान् ।<br>इति संस्मृत्य संस्मृत्य रामं साश्रुविलोचनः ॥२६॥ | की प्रेरणासे उनके साथ चले ॥ १२ ॥ कौसल्या आदि महारानियाँ तथा वसिष्ठ आदि द्विजगण पृथिवीको आच्छादन कर उनके आगे-पीछे और इधर-उधर यथा-योग्य रीतिसे चलने लगे॥ १३ ॥ इस प्रकार शृंगवेरपुर पहुँचनेपर वह महान् सेना शत्रुघ्नकी प्रेरणासे गंगातट-पर जहाँ-तहाँ ठहर गयी ॥ १४ ॥<br>भरतका आगमन सुन गुहको यह शंका हुई कि भरत बड़ी सेना लेकर आये हैं अतः ये रामके अनजान-में उनका कोई अनिष्ट करनेके लिये न जाते हों ? मुझे उनके पास जाकर उनका मर्म जानना चाहिये । यदि उनका भाव ठीक हो तब तो वे भले ही पार चले जायें ॥ १५-१६ ॥ नहीं तो ( इसके विपरीत उपाय करना पड़ेगा अतः ) मेरे जातिवाले अस्त्र-शस्त्र लेकर सावधानी-से सब ओर चौकस रहें और सब नावोंको खींचकर गंगाके बीचमें खड़ी कर दें ॥ १७ ॥<br>इस प्रकार सबको आज्ञा दे गुह नाना प्रकारकी बहुत-सी भेंटें लेकर अपने बहुत-से हथियारबन्द जाति-भाइयोंके साथ भरतजीके पास आया। वहाँ उनके सामने सब सामग्री रखकर इधर-उधर देखते हुए उसने देखा कि मेघश्याम भरत चीर-वस्त्र और जटाजूट धारण किये मन्त्रियोंके साथ बैठे हैं ॥ १८-२० ॥ वे राम-हीका स्मरण कर रहे हैं और 'राम-नाम' का ही जप कर रहे हैं। यह देखकर उसने पृथिवीपर शिर रखकर भरतजीको प्रणाम किया और बोला 'मैं गुह हूँ' ॥ २१ ॥<br>भरतजीने उसे शीघ्र ही उठाकर आदरपूर्वक गाढ़ आलिंगन किया और प्रसन्न-मुखसे उसकी कुशल पूछ-कर उससे सखा-भावसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥ "भैया ! तुम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीके साथ रहे थे और निर्मलहृदय श्रीरामने नेत्रोंमें जल भरकर तुम्हारा आलिंगन किया था ॥ २३ ॥ तुमसे सीता और लक्ष्मण-के सहित कमल-नयन रामने वार्तालाप की अतः तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सफल है ॥ २४ ॥ हे सुव्रत ! तुमने श्रीरामचन्द्रजीको जहाँ देखा था मुझे वहीं ले चलो, जहाँ वे सीताके सहित सोये थे वह स्थान मुझे दिखाओ ॥ २५ ॥ तुम रामके प्रियतम सखा और भाग्यवान् भक्त हो ।” इस प्रकार पुनः-पुनः रामका स्मरण करनेसे भरतजीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥२६॥