अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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'सर्ग ८] अयोध्याकाण्ड ८७
अष्टम सर्ग
भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूटदर्शन ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| वसिष्ठो मुनिभिः सार्धं मन्त्रिभिः परिवारितः ।<br>राज्ञः सभां देवसभासन्निभामविशद्विभुः ॥ १॥ | हे पार्वति ! एक दिन गुनीश्वरोंके सहित मन्त्रियोंसे घिरे हुए भगवान् वसिष्ठजी देवसभाके सदृश राजसभामें आये ॥ १॥ |
| तत्रासने समासीनश्चतुर्मुख इवापरः ।<br>आनीय भरतं तत्र उपवेश्य सहानुजम् ॥ २॥ | वहाँ दूसरे ब्रह्माजीके समान आसनपर विराजमान श्रीवसिष्ठजीने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको बुलाकर आसनपर बैठाया ॥ २ ॥ |
| अब्रवीद्वचनं देशकालोचितमरिन्दमम् ।<br>वत्स राज्येऽभिषेक्ष्यामस्त्वामद्य पितृशासनात् ॥ ३॥ | और उन शत्रुदमन भरतजीसे इस प्रकार देशकालोचित वाक्योंमें कहा—"वत्स ! तुम्हारे पिताके कथनानुसार आज हम तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त करेंगे ॥ ३॥ |
| कैकेय्या याचितं राज्यं त्वदर्थे पुरुषर्षभ ।<br>सत्यसन्धो दशरथः प्रतिज्ञाय ददौ किल ॥ ४॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ ! कैकेयीने तुम्हारे लिये राजा दशरथसे राज्य माँगा था । राजा सत्यपरायण थे, इसलिये प्रतिज्ञा करनेके कारण उन्होंने उसे दे दिया ॥ ४॥ |
| अभिषेको भवत्वद्य मुनिभिर्मन्त्रपूर्वकम् । | अतः मुनिजनोंद्वारा मन्त्रोच्चारपूर्वक आज तुम्हारा अभिषेक होना चाहिये ।" |
| तच्छ्रुत्वा भरतोऽप्याह मम राज्येन किं मुने ॥ ५॥ | यह सुनकर भरतजी बोले—"हे मुनिनाथ ! राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन है ? ॥ ५॥ |
| रामो राजाधिराजश्च वयं तस्यैव किङ्कराः ।<br>श्वःप्रभाते गमिष्यामो राममानेतुमञ्जसा ॥ ६॥ | महाराज राम ही राजाधिराज हैं, हम तो उन्हींके दास हैं । कल प्रातःकाल रामजीको लानेके लिये हम शीघ्र ही वनको जायँगे ॥ ६॥ |
| अहं यूयं मातरश्च कैकेयीं राक्षसीं विना ।<br>हनिष्याम्यधुनैवाहं कैकेयीं मातृगन्धिनीम् ॥ ७॥ | मैं, आप सबलोग और राक्षसी कैकेयीके सिवा अन्य सब माताएँ—ये सभी वनको चलेंगे । मैं क्या करूँ ? मैं तो इस नाममात्रकी माता कैकेयीको अभी मार डालता, |
| किन्तु मां नो रघुश्रेष्ठः स्त्रीहन्तारं सहिष्यते ।<br>तच्छ्वोभूते गमिष्यामि पादचारेण दण्डकान् ॥ ८॥ | किन्तु श्रीरघुनाथजी मुझ स्त्री-हत्यारेको क्षमा न करेंगे । अतः कुछ भी हो, कल प्रातःकाल होते ही, आप लोग चलें या न चलें, मैं तो शत्रुघ्नके सहित पैदल ही दण्डकारण्यको जाऊँगा । |
| शत्रुघ्नसहितस्तूर्णं यूयमायान्तु वा न वा ।<br>रामो यथा वने यातस्तथाऽहं वल्कलाम्बरः ॥ ९॥ | हे मुने ! जिस प्रकार रामजी गये हैं उसी प्रकार जबतक रामचन्द्रजी न लौटेंगे तबतक मैं भी, शत्रुघ्नके सहित वल्कल-वस्त्र और जटाजूट धारणकर कन्द-मूल-फलादिका भोजन करूँगा और पृथिवीपर शयन करूँगा" ॥ ७–१०॥ |
| फलमूलकृताहारः शत्रुघ्नसहितो मुने ।<br>भूमिशायी जटाधारी यावद्रामो निवर्तते ॥ १०॥ | |
| इति निश्चित्य भरतस्तूष्णीमेवावतस्थिवान् ।<br>साधुसाध्विति तं सर्वे प्रशंसुर्मुदान्विताः ॥ ११॥ | ऐसा निश्चयकर भरतजी मौन हो गये । तब सबलोग प्रसन्न होकर 'साधु-साधु' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ११॥ |
| ततः प्रभाते भरतं गच्छन्तं सर्वसैनिकाः ।<br>अनुजग्मुः सुमन्त्रेण नोदिताः साश्वकुञ्जराः ॥ १२॥ | तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर भरतजीके कूच करते समय हाथी और घोड़ोंके सहित समस्त सैनिक सुमन्त्र- |