भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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८६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

तद्देहोत्थेन च पुनरेवं देहः सदात्मनः । १०३।
यथा त्यजति वै जीर्णं वासो गृह्णाति नूतनम् ।
तथा जीर्णं परित्यज्य देही देहं पुनर्नवम् । १०४।
भजत्येव सदा तत्र शोकस्यावसरः कुतः ।
आत्मा न म्रियते जातु जायते न च वर्धते । १०५।
षड्भावरहितोऽनन्तः सत्यप्रज्ञानविग्रहः ।
आनन्दरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी लयविवर्जितः । १०६।
एक एव परो ह्यात्मा ह्यद्वितीयः समः स्थितः ।
इत्यात्मानं दृढं ज्ञात्वा त्यक्त्वा शोकं कुरु क्रियाम् ॥
तैलद्रोण्याः पितुर्देहमुद्धृत्य सचिवैः सह ।
कृत्यं कुरु यथान्यायमसमाभिः कुलन्दन । १०८।
इति सम्बोधितः साक्षाद्गुरुणा भरतस्तदा ।
विसृज्याज्ञानजं शोकं चक्रे स विधिवत्क्रियाम् १०९
गुरुणोक्तप्रकारेण आहिताग्नेर्यथाविधि ।
संस्कृत्य स पितुर्देहं विधिदृष्टेन कर्मणा । ११०।
एकादशेऽहनि प्राप्ते ब्राह्मणांर्वेदपारगान् ।
भोजयामास विधिवच्छतशोऽथ सहस्रशः । १११।
उद्दिश्य पितरं तत्र ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु ।
ददौ गवां सहस्राणि ग्रामान् रत्नाम्बराणि च । ११२।
अवसत्स्वगृहे तत्र राममेवानुचिन्तयन् ।
वसिष्ठेन सह भ्रात्रा मन्त्रिभिः परिवारितः । ११३।
रामेऽरण्यं प्रयाते सह जनकसुता-
लक्ष्मणाभ्यां सुघोरं
माता मे राक्षसीव प्रदहति हृदयं
दर्शनादेव सद्यः ।
गच्छाम्यारण्यमद्य स्थिरमतिरखिलं
दूरतोऽपास्य राज्यं
रामं सीतासमेतं स्मितरुचिरमुखं
नित्यमेवानुसेवे ॥११४॥
| करेगा । इसी प्रकार आत्माको सदा पुनः-पुनः देहकी प्राप्ति होती रहती है ॥ १०३ ॥ मनुष्य जिस प्रकार पुराने वस्त्रोंको उतारकर फिर नये वस्त्र पहन लेता है उसी प्रकार देहधारी जीव पुराने शरीरको छोड़कर नवीन शरीर धारण कर लेता है । अतः इसमें शोकका क्या कारण है ? क्योंकि आत्मा तो न कभी मरता है, न जन्मता है और न बढ़ता ही है ॥ १०४-१०५ ॥ वह षड्-भाव-विकारोंसे रहित, अनन्त, सच्चिद्रूप, आनन्दरूप, बुद्धि आदिका साक्षी और अविनाशी है ॥ १०६ ॥ यह परमात्मा एक, अद्वितीय और समभावमें स्थित है । इस प्रकार तुम आत्माका दृढ़ ज्ञान प्राप्त कर शोकरहित हो समस्त कार्य करो ॥ १०७ ॥ हे कुलन्दन भरत ! अपने पिताका शरीर तैलकी नावमेंसे निकालकर मन्त्रियों और हम सब ऋषियोंके साथ उसका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार करो ॥ १०८ ॥<br><br>तब गुरुजीके इस प्रकार समझानेपर भरतजीने अज्ञानजन्य शोकको छोड़कर राजाका विधिवत् अन्त्य कृत्य किया ॥ १०९ ॥ गुरुजीके कथनानुसार जैसे अग्निहोत्रीका अन्तिम संस्कार करना चाहिये उसी प्रकार विधिपूर्वक पिताके देहका शास्त्रानुकूल संस्कार कराकर ॥ ११० ॥ फिर एकादशाह आनेपर सैकड़ों-हजारों वेदज्ञ ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराया ॥ १११ ॥ तथा पिताके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन, हजारों गौएँ, अनेकों गाँव और रत्न तथा वस्त्रादि दिये ॥ ११२ ॥<br><br>फिर श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए वे गुरु वसिष्ठजी, भाई शत्रुघ्न और मन्त्रियोंके साथ अपने घरमें रहने लगे ॥ ११३ ॥ घरमें रहते हुए वे मन-ही-मन सोचा करते थे कि 'जनकनन्दिनी महारानी सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीके भयंकर वनमें चले जानेसे माता कैकेयी अपने दर्शनमात्रसे ही राक्षसीके समान मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न करती है । अतः अब मैं निस्सन्देह शीघ्र ही सब राज-पाट छोड़कर वनको जाऊँगा और मधुर मुसकानसे जिनका मुखारविन्द अति शोभित हो रहा है उन राम और सीताकी नित्य-प्रति सेवा करूँगा' ॥ ११४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥