अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड . ८५
भूयात्तत्पापमखिलं मम जानामि यद्यहम् ।
इत्येवं शपथं कृत्वा रुरोद भरतस्तदा ॥ ९० ॥
कौसल्या तमथालिङ्ग्य पुत्र जानामि मा शुचः ।
एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा भरतस्य समागमम् ॥ ९१ ॥
आसन्नो मन्त्रिभिः सार्धं प्रययौ राजमन्दिरम् ।
रुदन्तं भरतं दृष्ट्वा वसिष्ठः प्राह सादरम् ॥ ९२ ॥
वृद्धो राजा दशरथो ज्ञानी सत्यपराक्रमः ।
भुक्त्वा मर्त्यसुखं सर्वमिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ॥ ९३ ॥
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्लब्ध्वा रामं सुतं हरिम् ।
अन्ते जगाम त्रिदिवं देवेन्द्राद्धासनं प्रभुः ॥ ९४ ॥
तं शोचसि वृथैव त्वमशोच्यं मोक्षभाजनम् ।
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्धो जन्मनाशादिवर्जितः ॥ ९५ ॥
शरीरं जडमत्यर्थमपवित्रं विनश्वरम् ।
विचार्यमाणे शोकस्य नावकाशः कथञ्चन ॥ ९६ ॥
पिता वा तनयो वाऽपि यदि मृत्युवशं गतः ।
मूढास्तमनुशोचन्ति स्वात्मताडनपूर्वकम् ॥ ९७ ॥
निःसारे खलु संसारे वियोगो ज्ञानिनां यदा ।
भवेद्वैराग्यहेतुः स शान्तिसौख्यं तनोति च ॥ ९८ ॥
जन्मवान्यदि लोकेऽस्मिंस्तर्हि तं मृत्युरन्वगात् ।
तस्मादपरिहार्योऽयं मृत्युर्जन्मवतां सदा ॥ ९९ ॥
स्वकर्मवशतः सर्वजन्तूनां प्रभवाप्ययौ ।
विजानन्नप्यविद्वान्वैः कथं शोचति बान्धवान् १००
ब्रह्माण्डकोटयो नष्टाः सृष्टयो बहुशो गताः ।
शुष्यन्ति सागराः सर्वे कैवास्था क्षणजीविते ॥ १०१ ॥
चलपत्त्रान्तलम्बाम्बुबिन्दुवत्क्षणभङ्गुरम् ।
आयुस्त्यजत्यवेलायां कस्तत्र प्रत्ययस्तव ॥ १०२ ॥
देही प्राक्तनदेहोत्थकर्मणा देहवान्पुनः ।
इस प्रकार शपथ करके भरतजी रो उठे ॥ ८९-९० ॥
तब कौसल्याने उन्हें हृदयसे लगाकर कहा—"बेटा ! मैं यह सब जानती हूँ, तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो।"
इसी समय भरतजीका आना सुनकर मन्त्रियोंके सहित वसिष्ठजी राजभवनमें आये और भरतको रोते देखकर आदरपूर्वक बोले— ॥ ९१-९२ ॥ "महाराज दशरथ वृद्ध, ज्ञानी और सत्य-पराक्रमी थे । वे मनुष्य-जन्मके समस्त सुख भोगकर, बहुत-सी दक्षिणाके सहित अश्वमेधादि यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन कर और रामचन्द्रके रूपमें साक्षात् विष्णुभगवान्को पुत्र-रूपसे पाकर अन्तमें स्वर्गलोकमें जाकर देवराज इन्द्रके आधे आसनके अधिकारी हुए हैं ॥ ९३-९४ ॥ वे सर्वथा अशोचनीय और मोक्षके पात्र हैं, उनके लिये तुम वृथा ही शोक करते हो; देखो, आत्मा तो नित्य, अविनाशी, शुद्ध और जन्म-नाशादिसे रहित है ॥ ९५ ॥ और शरीर जड, अत्यन्त अपवित्र और नाशवान् है । इस प्रकार विचार करनेपर शोकके लिये कोई स्थान नहीं रह जाता ॥ ९६ ॥ यदि कोई पिता या पुत्र मर जाता है तो मूढ़जन ही उसके लिये छाती पीटकर रोते हैं ॥ ९७ ॥ किन्तु, इस असार संसारमें यदि ज्ञानियोंको किसीसे वियोग होता है तो वह उनके लिये वैराग्यका कारण होता है और सुख तथा शान्तिका विस्तार करता है ॥ ९८ ॥ यदि किसीने इस लोकमें जन्म लिया है तो मृत्यु भी अवश्य ही उसके साथ लगी हुई है । अतः जन्म लेनेवालोंके लिये मृत्यु सर्वदा अनिवार्य है ॥ ९९ ॥ 'अपने कर्मानुसार ही सब प्राणियोंके जन्म-मरण होते हैं' यह जानकर भी देखो मूढ़लोग अपने बन्धु-बान्धवोंके लिये कैसे शोक करते हैं ॥ १०० ॥ करोड़ों ब्रह्माण्ड नष्ट हो गये, अनेकों सृष्टियाँ बीत गयीं, ये सम्पूर्ण समुद्र एक दिन सूख जायँगे, फिर इस क्षणिक जीवनमें भला क्या आस्था की जाय ? ॥ १०१ ॥ यह आयु हिलते हुए पत्तेकी नोकपर लटकती हुई जलकी बूँदके समान क्षणभंगुर है, असमय ही छोड़कर चली जाती है; उसका तुम क्या विश्वास करते हो ? ॥ १०२ ॥ इस जीवात्माने अपने पूर्व-देह-कृत कर्मोंसे यह शरीर धारण किया है और फिर इस देहके कर्मोंसे यह और शरीर धारण