भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
९४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

[संस्कृत मूल पाठ]

इङ्गुदीफलपिण्याकरचितान्मधुसम्प्लुतान् ।
वयं यदन्नाः पितरस्तदन्नाः स्मृतिनोदिताः ॥१९॥

इति दुःखाश्रुपूर्णाक्षः पुनः स्नात्वा गृहं ययौ ।
सर्वे रुदित्वा सुचिरं स्नात्वा जग्मुस्तदाश्रमम् ॥२०॥

तस्मिंस्तु दिवसे सर्वे उपवासं प्रचक्रिरे ।
ततः परेद्युर्विमले स्नात्वा मन्दाकिनीजले ॥२१॥

उपविष्टं समागम्य भरतो राममब्रवीत् ।
राम राम महाभाग स्वात्मानमभिषेचय ॥२२॥

राज्यं पालय पित्र्यं ते ज्येष्ठस्त्वं मे पिता तथा ।
क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम् ॥२३॥

इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैः पुत्रानुत्पाद्य तन्तवे ।
राज्ये पुत्रं समारोप्य गमिष्यसि ततो वनम् ॥२४॥

इदानीं वनवासस्य कालो नैव प्रसीद मे ।
मातुर्मे दुष्कृतं किञ्चित्स्मर्तुं नार्हसि पाहि नः।२५।

इत्युक्त्वा चरणौ भ्रातुः शिरस्याधाय भक्तितः ।
रामस्य पुरतः साक्षाद्दण्डवत्पतितो भुवि ॥२६॥

उत्थाप्य राघवः शीघ्रमारोप्याङ्केऽतिमक्तितः ।
उवाच भरतं रामः स्नेहार्द्रनयनः शनैः ॥२७॥

शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वयोक्तं यत्तथैव तत् ।
किन्तु मामब्रवीत्तातॊ नव वर्षाणि पञ्च च ॥२८॥

उषित्वा दण्डकारण्ये पुरं पश्चात्समाविश ।
इदानीं भरतायेदं राज्यं दत्तं मयाखिलम् ॥२९॥

ततः पित्रैव सुव्यक्तं राज्यं दत्तं तवैव हि ।
दण्डकारण्यराज्यं मे दत्तं पित्रा तथैव च ॥३०॥

अतः पितुर्वचः कार्यमावाभ्यामतियत्नतः ।
पितुर्वचनमुल्लङ्घ्य स्वतन्त्रो यस्तु वर्तते ॥३१॥


[हिन्दी अनुवाद]

हमारा अन्न है वही हमारे पितरोंको प्रिय होगा, यही स्मृतिकी आज्ञा है' ऐसा कह उन्होंने इंगुदी फलके पिण्ड बना उनपर मधु डालकर उन्हें दान किया ॥ १९॥ फिर नेत्रोंमें शोकाश्रु भरे हुए वे पुनः स्नानकर आश्रममें आये । इसी प्रकार और सब भी बहुत देरतक रोकर अन्तमें स्नान करके आश्रमको लौटे ॥२०॥

उस दिन सबने उपवास किया। दूसरे दिन, मन्दाकिनीके निर्मल जलमें स्नान कर भरतजीने आश्रममें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर कहा—"हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! आप अपना अभिषेक कीजिये ॥ २१-२२ ॥ यह पैतृक राज्य आपहीका है, आप इसका पालन करें । आप हमारे बड़े भाई हैं, अतः पितृतुल्य हैं। महाराज ! प्रजाका पालन करना यही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है। ॥ २३॥ अतः आप नाना प्रकारके यज्ञोंसे यजन करके फिर वंशवृद्धिके लिये पुत्र उत्पन्न कर उसे (बड़े होनेपर) राजसिंहासनपर बैठाकर तब वनको जायें ॥ २४ ॥ हे प्रभो ! अभी वनवासका समय नहीं है, आप मुझपर प्रसन्न होइये । मेरी माताका जो कुछ अपराध है उसे भूल जाइये और हमारी रक्षा कीजिये" ॥ २५॥ ऐसा कहकर उन्होंने भाईके चरणोंको भक्तिपूर्वक अपने मस्तकपर रख लिया और श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख दण्डके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥

रामजीने भरतको शीघ्रतासे उठाकर अति प्रेमपूर्वक गोदमें बैठा लिया और नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भरकर धीरे-धीरे उनसे कहने लगे—॥ २७॥ “भाई ! मैं जो कहता हूँ वह सुनो । तुम जो कुछ कहते हो सो बिलकुल ठीक है । किन्तु पिताजीने मुझे आज्ञा दी थी कि चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहकर फिर अयोध्यामें आना; इस समय यह सम्पूर्ण राज्य मैं भरतको देता हूँ ॥ २८-२९ ॥ अतः स्पष्ट ही पिताजीने यह राज्य तो तुम्हींको दिया है और वैसे ही मुझे उन्होंने दण्डकारण्यका राज्य दिया है ॥ ३० ॥ इसलिये हम दोनोंको ही प्रयत्नपूर्वक पिताजीके वचनोंको सफल करना चाहिये । जो मनुष्य अपने पिताके वचनोंका उल्लङ्घन कर स्वेच्छापूर्वक बरतता है वह जीता हुआ भी मृतकके समान है और शरीर छोड़नेपर नरकको जाता है ।

सर्ग ९ ]अयोध्याकाण्ड९५
स जीवन्नेव मृतको देहान्ते निरयं व्रजेत् ।<br>तस्माद्राज्यं प्रशाधि त्वं वयं दण्डकपालकाः ॥३२॥अतः तुम राज्य-शासन करो, हम दण्डकवनकी रक्षा करेंगे ॥ ३१-३२ ॥
भरतस्त्वब्रवीद्रामं कामुको मूढधीः पिता ।<br>स्त्रीजितो भ्रान्तहृदय उन्मत्तो यदि वक्ष्यति ।<br>तत्सत्यमिति न ग्राह्यं भ्रान्तवाक्यं यथा सुधीः ३३तब भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"यदि पिताजीने कामी, मूढ़बुद्धि, स्त्रीके वशीभूत, भ्रान्तचित्त और उन्मत्त होनेके कारण ऐसा कह भी दिया है तो भी उसे सत्य न मानना चाहिये; जिस प्रकार बुद्धिमान् लोग भ्रान्त पुरुषोंके वाक्यका आदर नहीं करते ॥३३॥
श्रीराम उवाच<br>न स्त्रीजितः पिता ब्रूयान्न कामी नैव मूढधीः ।<br>पूर्वं प्रतिश्रुतं तस्य सत्यवादी ददौ भयात् ॥३४॥<br>असत्याद्भीतिरधिका महतां नरकादपि ।<br>करोमीत्यहमप्येतत्सत्यं तस्यै प्रतिश्रुतम् ॥३५॥<br>कथं चाक्यमहं कुर्यामसत्यं राघवो हि सन् ।<br>इत्युदीरितमाकर्ण्य रामस्य भरतोऽब्रवीत् ॥३६॥<br>तथैव चीरवसनो वने वत्स्यामि सुव्रत ।<br>चतुर्दश समास्त्वं तु राज्यं कुरु यथासुखम् ॥३७॥**श्रीरामजी बोले—**पिताजीने स्त्रीवश, कामवश अथवा मूढ़बुद्धि होकर ऐसा नहीं कहा। उन सत्यवादीने अपनी पूर्व-प्रतिज्ञानुसार ही प्रतिज्ञा-भंगके भयसे ये वर दिये थे ॥ ३४ ॥ महान् पुरुषोंको असत्यसे नरककी अपेक्षा भी अधिक भय हुआ करता है। मैं भी 'ऐसा ही करूँगा' यह कहकर उनसे सत्य-प्रतिज्ञा कर चुका हूँ ॥ ३५ ॥ फिर, मैं रघुवंशमें जन्म लेकर अपना वचन कैसे उलट सकता हूँ ?<br><br>रामजीका ऐसा कथन सुनकर भरतजी बोले—॥३६॥ “हे सुव्रत ! पिताजीके कथनानुसार मैं तो आपके समान चौदह वर्षतक वल्कल-वस्त्र धारणकर वनमें रहूँगा और आप सुखपूर्वक राज्य भोगिये" ॥ ३७ ॥
श्रीराम उवाच<br>पित्रा दत्तं तवैवैतद्राज्यं मह्यं वनं ददौ ।<br>व्यत्ययं यद्यहं कुर्यामसत्यं पूर्ववत् स्थितम् ॥३८॥**श्रीरामजी बोले—**पिताजीने तुमको यह राज्य और मुझे वनवास दिया है। अब यदि मैं इसका उलटा करूँ तो असत्य ज्यों-का-त्यों ही रहता है ॥ ३८ ॥
भरत उवाच<br>अहमप्यागमिष्यामि सेवे त्वां लक्ष्मणो यथा ।<br>नोचेत्प्रायोपवेशनं त्यजाम्येतत्कलेवरम् ॥३९॥<br>इत्येवं निश्चयं कृत्वा दर्भानास्तीर्य चातपे ।<br>मनसापि विनिश्चित्य प्राङ्मुखोपविवेश सः ॥४०॥<br>भरतस्यापि निर्बन्धं दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।<br>नेत्रान्तसंज्ञां गुरवे चकार रघुनन्दनः ॥४१॥भरतजी बोले—( अच्छा, यदि आप वनसे नहीं लौटना चाहते तो मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे ) मैं भी वनमें आकर लक्ष्मणके समान ही आपकी सेवा करूँ, नहीं तो मैं अन्न-जल छोड़कर इस शरीरको त्याग दूँगा ॥ ३९ ॥ अपना ऐसा निश्चय प्रकट कर और मनमें भी यही ठानकर वे धूपमें कुशा बिछाकर पूर्वकी ओर मुख करके बैठ गये ॥ ४० ॥ भरतजीका ऐसा हठ देखकर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो गुरु वसिष्ठजीको नेत्रोंसे संकेत किया ॥ ४१ ॥
एकान्ते भरतं प्राह वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ।<br>वत्स गुह्यं शृणुष्वेदं मम वाक्यात्सुनिश्चितम् ॥४२॥<br>रामो नारायणः साक्षाद्ब्रह्मणा याचितः पुरा ।<br>रावणस्य वधार्थाय जातो दशरथात्मजः ॥४३॥तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने भरतको एकान्तमें ले जाकर कहा, "वत्स ! मैं जो कहता हूँ यह सुनिश्चित गुह्य रहस्यकी बात सुनो ॥४२॥ भगवान् राम साक्षात् नारायण हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर उन्होंने रावणको मारनेके लिये दशरथके यहाँ पुत्र-

९६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९


योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी । शेषोऽपि लक्ष्म॑णो जातो राममन्वेति सर्वदा ॥४४॥ रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति न संशयः। कैकेय्या वरदानादि यद्यन्निष्ठुरभाषणम् ॥४५॥ सर्वं देवकृतं नोचेदेवं सा भाषयेत्कथम् । तस्मात्त्यजाग्रहं तात रामस्य विनिवर्तने ॥४६॥ निवर्तस्व महासैन्यैर्मातृभिः सहितः पुरम् । रावणं सकुलं हत्वा शीघ्रमेवागमिष्यति ॥४७॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं भरतो विस्मयान्वितः । गत्वा समीपं रामस्य विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥४८॥ पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तव पूजिते । तयोः सेवां करोम्येव यावदागमनं तव ॥४९॥ इत्युक्त्वा पादुके दिव्ये योजयामास पादयोः। रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तितः ॥५०॥ गृहीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रत्नभूषिते । रामं पुनः परिक्रम्य प्रणनाम पुनः पुनः ॥५१॥ भरतः पुनराहेदं भक्त्या गद्गदया गिरा । नवपञ्चसमान्ते तु प्रथमे दिवसे यदि ॥५२॥ नागमिष्यसि चेद्राम प्रविशामि महानलम् । बाढमित्येव तं रामो भरतं संन्यवर्तयत् ॥५३॥ ससैन्यः सवसिष्ठश्च शत्रुघ्नसहितः सुधीः । मातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं गमनायोपचक्रमे ॥५४॥ कैकेयी राममेकान्ते स्रवन्नेत्रजलाकुला । प्राञ्जलिः प्राह हे राम तव राज्यविघातनम् ॥५५॥ कृतं मया दुष्टधिया मायामोहितचेतसा । क्षमस्व मम दौरात्म्यं क्षमासारा हि साधवः ॥५६॥


रूपसे जन्म लिया है ॥४३॥ इसी प्रकार योगमाया- ने जनकनन्दिनी सीताके रूपसे अवतार लिया है। और शेषजी लक्ष्मणके रूपसे उत्पन्न होकर उनका अनुगमन कर रहे हैं ॥४४॥ वे रावणको मारना चाहते हैं इसलिये निस्सन्देह वनको ही जायेंगे। कैकेयी- के जो कुछ भी वरदान आदि और निष्ठुर भाषण आदि कार्य हैं वे सब देवताओंकी प्रेरणासे ही हुए हैं, नहीं तो वह ऐसे वचन कैसे बोल सकती थी ? इस- लिये हे तात ! तुम रामको लौटानेका आग्रह छोड़ दो ॥४५-४६॥ और भाई शत्रुघ्न तथा सेनाके सहित अयोध्याको लौट चलो; राम भी कुलसहित रावणका संहार करके वहाँ शीघ्र ही आ जायेंगे" ॥४७॥

गुरुजीके ये वचन सुनकर भरतको अति विस्मय हुआ और उन्होंने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्र- जीके पास जाकर कहा-॥४८॥ "हे राजेन्द्र ! आप मुझे राज्य-शासनके लिये अपनी जगत्पूज्य चरण- पादुकाएँ दीजिये । जबतक आप लौटेंगे तबतक मैं उन्हींकी सेवा करता रहूँगा ।" ॥४९॥

ऐसा कह भरतजीने उन्हें उनके चरणोंमें दो दिव्य पादुकाएँ (खड़ाऊँ) पहना दीं । श्रीरामचन्द्र- जीने भरतका भक्ति-भाव देखकर वे खड़ाऊँ उन्हें दे दीं ॥५०॥ भरतजीने वे रत्नजटित दिव्य पादुकाएँ लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें बारम्बार प्रणाम किया ॥५१॥

तदनुसार, वे भक्तिवश गद्गद्-वाणीसे बोले, "हे राम ! यदि चौदह वर्षके व्यतीत होनेपर आप पहले दिन ही अयोध्या न पहुँचे तो मैं महान् अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ।" तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीको विदा किया ॥ ५२-५३ ॥

तदुपरान्त बुद्धिमान् भरतजीने सम्पूर्ण सेना, वसिष्ठ, शत्रुघ्न, समस्त माताओं तथा मन्त्रियोंके साथ चलनेकी तैयारी की ॥५४॥

इसी समय कैकेयीने एकान्त स्थानमें नेत्रोंमें जल भरकर हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-"हे राम ! मायासे मुग्धचित्त हो जानेके कारण मुझ कुबुद्धिने तुम्हारे राज्याभिषेकमें विघ्न डाल दिया सो तुम मेरी इस कुटिलताको क्षमा करना क्योंकि साधुजन सर्वदा क्षमाशील ही होते हैं ॥ ५५-५६ ॥ आप साक्षात्

सर्ग ९ ]अयोध्याकाण्ड९७
त्वं साक्षाद्विष्णुरव्यक्तः परमात्मा सनातनः।<br>मायामानुषरूपेण मोहयस्यखिलं जगत्।<br>त्वयैव प्रेरितो लोकः कुरुते साध्वसाधु वा ॥५७॥<br><br>त्वदधीनमिदं विश्वमस्वतन्त्रं करोति किम्।<br>यथा कृत्रिमनेर्तक्यो नृत्यन्ति कुहकेच्छया ॥५८॥<br><br>त्वदधीना तथा माया नर्तकी बहुरूपिणी।<br>त्वयैव प्रेरिताऽहं च देवकार्यं करिष्यता ॥५९॥<br><br>पापिष्ठं पापमनसा कर्माचरमरिन्दम।<br>अद्य प्रतीतोऽसि मम देवानामप्यगोचरः ॥६०॥<br><br>पाहि विश्वेश्वरानन्त जगन्नाथ नमोऽस्तु ते।<br>छिन्धि स्नेहमयं पाशं पुत्रवित्तादिगोचरम् ॥६१॥<br><br>त्वज्ज्ञानानलखङ्गेन त्वामहं शरणं गता।<br><br>कैकेय्या वचनं श्रुत्वा रामः सस्मितमब्रवीत् ॥६२॥<br><br>यदाह मां महाभागे नानृतं सत्यमेव तत्।<br>मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद्विनिर्गता ॥६३॥<br><br>देवकार्यार्थसिद्धयर्थमत्र दोषः कुतस्तव।<br>गच्छ त्वं हृदि मां नित्यं भावयन्ती दिवानिशम् ॥<br><br>सर्वत्र विगतस्नेहा मद्भक्त्या मोक्ष्यसेऽचिरात्।<br>अहं सर्वत्र समदृग् द्वेष्यो वा प्रिय एव वा ॥६५॥<br><br>नास्ति मे कल्पकस्येव भजतोऽनुभजाम्यहम्।<br>मन्मायामोहितधियो मामम्ब मनुजाकृतिम् ॥६६॥<br><br>सुखदुःखाद्यनुगतं जानन्ति न तु तत्त्वतः।<br>दिष्टया मद्गोचरं ज्ञानमुत्पन्नं ते भवापहम् ॥६७॥<br><br>स्मरन्ती तिष्ठ भवने लिप्यसे न च कर्मभिः।विष्णु भगवान्, अव्यक्त परमात्मा और सनातन पुरुष हैं। अपने मायामय मनुष्यरूपसे आप समस्त संसारको मोहित कर रहे हैं। आपकी ही प्रेरणासे लोग शुभ अथवा अशुभ कर्म करते हैं॥ ५७॥ यह सम्पूर्ण विश्व आपहीके अधीन है, अस्वतन्त्र होनेके कारण यह स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता; जिस प्रकार कृत्रिम नर्त्तकियां (कठपुतलियाँ) सूत्रधार (बाजीगर) की इच्छानुसार ही नाचती हैं॥ ५८॥ उसी प्रकार नाना आकार धारण करनेवाली यह मायारूपिणी नटी आपहीके अधीन है। और हे शत्रुदमन! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छावाले आपहीके द्वारा प्रेरित होकर मुझ पापिनीने अपनी दुष्टबुद्धिसे यह पापकर्म किया था। आज मैंने आपको जान लिया, आप देवताओंके भी मन और वाणी आदिसे परे हैं॥ ५९-६०॥ हे विश्वेश्वर ! हे अनन्त ! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है। हे प्रभो ! मैं आपकी शरण हूँ। आप अपने ज्ञानाग्निरूप खड्गसे मेरे पुत्र और धन आदिके स्नेह-बन्धनको काट डालिये।"<br><br>कैकेयीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराकर कहा—॥ ६१-६२॥ "हे महाभागे ! तुमने जो कुछ कहा है वह ठीक ही है, मिथ्या नहीं। मेरी प्रेरणासे ही देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये तुम्हारे मुखसे वे शब्द निकले थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अब तुम जाओ; अहर्निश निरन्तर मेरी ही भावना करनेसे तुम सर्वत्र स्नेहरहित होकर मेरी भक्तिद्वारा शीघ्र ही मुक्त हो जाओगी। मैं सर्वत्र समदर्शी हूँ, मेरा कोई भी प्रिय या अप्रिय नहीं है ॥ ६३-६५॥ मायावी पुरुष जिस प्रकार अपनी ही मायासे रचे पदार्थोंमें राग-द्वेष नहीं करता उसी प्रकार मेरा भी किसीमें राग-द्वेष नहीं है। जो पुरुष जिस प्रकार मेरा भजन करता है मैं भी वैसे ही उसका ध्यान रखता हूँ। हे मात: ! मेरी मायासे मोहित होकर लोग मुझे सुख-दुःखके वशीभूत साधारण मनुष्य जानते हैं। वे मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानते। तुम्हारा बड़ा भाग्य है जो तुम्हें संसार-भयको दूर करनेवाला मेरा तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ है॥ ६६-६७॥ तुम मेरा स्मरण करती हुई घरहीमें रहो, इससे तुम कर्म-बन्धनमें नहीं बँधोगी।"

९८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९.

इत्युक्ता सा परिक्रम्य रामं सानन्दविस्मया॥६८॥
प्रणम्य शतशो भूमौ ययौ गेहं मुदान्विता ।
भरतस्तु सहामात्यैर्मातृभिर्गुरुणा सह ॥६९॥
अयोध्यागममच्छीघ्रं राममेवानुचिन्तयन् ।
पौरजानपदान्सर्वानयोध्यायामुदारधीः ॥७०॥
स्थापयित्वा यथान्यायं नन्दिग्रामं ययौ स्वयम् ।
तत्र सिंहासने नित्यं पादुके स्थाप्य भक्तितः ॥७१॥
पूजयित्वा यथा रामं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
राजोपचारैरखिलैः प्रत्यहं नियतव्रतः ॥७२॥
फलमूलाशनो दान्तो जटावल्कलधारकः ।
अधःशायी ब्रह्मचारी शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥७३॥
राजकार्याणि सर्वाणि यावन्ति पृथिवीतले ।
तानि पादुकयोः सम्यङ्निवेदयति राघवः ॥७४॥
गणयन् दिवसानेव रामागमनकाङ्क्षया ।
स्थितो रामार्पितमनाः साक्षाद्ब्रह्ममुनिर्यथा ॥७५॥

रामस्तु चित्रकूटाद्रौ वसन्मुनिभिरादृतः ।
सीतया लक्ष्मणेनापि किञ्चित्कालमुपावसत् ॥७६॥
नागराश्च सदा यान्ति रामदर्शनलालसाः ।
चित्रकूटस्थितं ज्ञात्वा सीतया लक्ष्मणेन च ॥७७॥
दृष्ट्वा तज्जनसम्बाधं रामस्तत्याज तं गिरिम् ।
दण्डकारण्यगमने कार्यमप्यनुचिन्तयन् ॥७८॥
अन्वगात्सीतया भ्रात्रा ह्यत्रेराश्रममुत्तमम् ।
सर्वत्र सुखसंवासं जनसम्बाधवजितम् ॥७९॥
गत्वा मुनिमुपासीनं भासयन्तं तपोवनम् ।
दण्डवत्प्रणिपत्याह रामोऽहमभिवादये ॥८०॥
पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानहमागतः ।
वनवासमिषेणापि धन्योऽहं दर्शनात्तव ॥८१॥


हिन्दी अनुवाद

रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने आनन्द और विस्मयपूर्वक रामकी परिक्रमा की और पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें सैकड़ों बार प्रणाम कर प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चली तथा भरतजी मन्त्रिगण, माताओं और वसिष्ठजीके साथ श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए शीघ्रतासे अयोध्याको चले ।

उदार-बुद्धि भरतजी समस्त पुरवासी और देशवासियोंको यथायोग्य अयोध्यापुरीमें बसाकर स्वयं नन्दिग्रामको चले गये । वहाँ एक सिंहासनपर उन दोनों पादुकाओंको रखकर वे श्रीरामचन्द्रजीके समान ही उनकी नित्यप्रति भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प और अक्षतादि सम्पूर्ण राजोचित सामग्रीसे पूजा करने लगे । इस प्रकार भरतजी फल-मूल खाते, इन्द्रिय-दमन करते, जटा और वल्कल धारण किये, पृथिवीपर शयन करते और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए शत्रुघ्नके साथ रहने लगे॥ ६८-७३ ॥ पृथिवीके जितने राजकार्य होते उन सबको वे रघुश्रेष्ठ (भरतजी) पादुकाओंके सामने निवेदन कर दिया करते थे ॥ ७४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षासे अवधिके दिन-गिनते हुए वे राममें ही मन लगाकर साक्षात् ब्रह्मर्षिके समान रहने लगे ॥ ७५ ॥

इधर रामचन्द्रजीने भी मुनियोंसे घिरे रहकर सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूट-पर्वतपर कुछ दिन बिताये ॥ ७६ ॥ रामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूटपर विराजमान सुनकर आसपासके नगर-निवासी उनके दर्शनोंकी इच्छासे सदैव आया करते थे ॥ ७७ ॥ रामचन्द्रजीने उस भीड़-भाड़को देखकर और अपने दण्डकारण्यमें जानेके कार्यको भी विचारकर उस पर्वतको छोड़ दिया ॥ ७८ ॥ वहाँसे चलकर वे सीता तथा लक्ष्मणके सहित अत्रि मुनिके अति उत्तम और जन-समूह-शून्य आश्रममें आये जो सब प्रकार सुखपूर्वक रहनेयोग्य था ॥ ७९ ॥

वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने आश्रममें विराजमान और सम्पूर्ण तपोवनको प्रकाशित करते हुए मुनीश्वरके पास जा उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करके कहा—"मैं राम आपका अभिवादन करता हूँ ॥ ८० ॥ मैं पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आया हूँ । इस समय वनवासके मिससे भी आपका दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया।" ॥ ८१ ॥

सर्ग ९ ] अयोध्याकाण्ड ९९


श्रुत्वा रामस्य वचनं रामं ज्ञात्वा हरिं परम् ।
पूजयामास विधिवद्भक्त्या परमया मुनिः ॥८२॥
वन्यैः फलैः कृतातिथ्यमुपविष्टं रघूत्तमम् ।
सीतां च लक्ष्मणं चैव सन्तुष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥८३॥
भार्या मेऽतीव संवृद्धा ह्यनसूयेति विश्रुता ।
तपश्चरन्ती सुचिरं धर्मज्ञा धर्मवत्सला ॥८४॥
अन्तस्तिष्ठति तां सीता पश्यत्वरिनिपूदन ।
तथेति जानकीं प्राह रामो राजीवलोचनः ॥८५॥
गच्छ देवीं नमस्कृत्य शीघ्रमेहि पुनः शुभे ।
तथेति रामवचनं सीता चापि तथाऽकरोत् ॥८६॥
दण्डवत्पतितामग्रे सीतां दृष्ट्वाऽतिहृष्टधीः ।
अनसूयासमालिङ्ग्य वत्से सीतेति सादरम् ॥८७॥
दिव्ये ददौ कुण्डले द्वे निर्मिते विश्वकर्मणा ।
दुकूले द्वे ददौ तस्यै निर्मले भक्तिसंयुता ॥८८॥
अङ्गरागं च सीतायै ददौ दिव्यं शुभानना ।
न त्यक्ष्यतेऽङ्गरागेण शोभा त्वां कमलानने ॥८९॥
पातित्रत्यं पुरस्कृत्य राममन्वेहि जानकि ।
कुशली राघवो यातु त्वया सह पुनर्गृहम् ॥९०॥
भोजयित्वा यथान्यायं रामं सीतासमन्वितम् ।
लक्ष्मणं च तदा रामं पुनः प्राह कृताञ्जलिः ॥९१॥
राम त्वमेव भुवनानि विधाय तेषां
संरक्षणाय सुरमानुषतिर्यगादीन् ।
देहान्बिभर्षि न च देहगुणैर्विंलिप्त-
स्त्वत्तो बिभेत्यखिलमोहकरी च माया ॥९२॥


रामचन्द्रजीके ये वचन सुन मुनीश्वरने उन्हें साक्षात् परब्रह्म जान उनकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा की ॥ ८२ ॥ फिर वन्य फलोंसे उनका आतिथ्य-सत्कार कर उन्होंने आसनपर विराजमान रघुनाथजी, महारानी सीता और लक्ष्मणजीसे प्रसन्नता-पूर्वक इस प्रकार कहा—॥ ८३ ॥ "मेरी भार्या 'अनसूया' नामसे विख्यात है, वह अति वृद्धा है, बहुत दिनोंसे तपस्या करती है, धर्मको जाननेवाली है और धर्ममें प्रेम रखनेवाली है ॥ ८४ ॥ इस समय वह कुटीके भीतर है । हे शत्रुदमन राम ! सीता उससे मिल लें ।" तब कमलोचन रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह जानकीजीसे कहा—॥८५॥ "हे शुभे ! जाओ तुम शीघ्र ही देवी अनसूयाजीको प्रणाम कर आओ ।" सीताजीने 'बहुत अच्छा' कह रामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन किया ॥ ८६ ॥

अनसूयाजीने अपने सम्मुख सीताजीको दण्डके समान पड़ी देख अति हर्षित हो 'बेटी सीता !' ऐसा कहकर आदरपूर्वक आलिंगन किया और भक्तिसहित उन्हें विश्वकर्माके बनाये हुए दो दिव्य कुण्डल और दो स्वच्छ रेशमी साड़ियाँ दीं ॥ ८७-८८ ॥ सुन्दर मुखवाली अनसूयाजीने उन्हें दिव्य अंगराग भी दिया और कहा—"हे कमलमुखि ! इस अंगरागके लगानेसे तेरे शरीरकी शोभा कभी कम न होगी ॥ ८९ ॥ हे जानकि ! तुम पातिव्रत्यका पालन करती हुई सदा रामकी ही अनुगामिनी रहना । रघुनाथजी तुम्हारे साथ कुशलपूर्वक घर लौटें” ॥ ९० ॥ फिर उन्होंने विधिपूर्वक लक्ष्मण और सीताजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी-को भोजन कराया । तत्पश्चात् उन्होंने फिर श्रीरामजी-से हाथ जोड़कर कहा—॥ ९१ ॥ “हे राम ! इन सम्पूर्ण भुवनोंकी रचना करके आप ही इनकी रक्षाके लिये देवता, मनुष्य और तिर्यगादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं, तथापि देहके गुणोंसे आप लिप्त नहीं होते । सम्पूर्ण संसारको मोहित करनेवाली माया भी आपसे सदा डरती रहती है" ॥ ९२ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
समाप्तमिदमयोध्याकाण्डम्

(इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं है, केवल एक रेखाचित्र (नाव में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता/केवट प्रसंग) अंकित है।)

अरण्यकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

अरण्यकाण्ड

जटायुषो दीनदशां विलोक्य प्रियावियोगप्रभवं च शोकम् ।
यो वै विसस्मार तमार्द्रचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

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श्रीराम-जटायु

तच्छ्रुत्वा राघवो दीनं कण्ठप्रागं ददर्श ह ।
हस्ताभ्यां संस्पृशन् रामो दुःखाश्रुवृतलोचनः ॥
(अ० रा० अर० ८ । ३० )

अरण्यकाण्ड - सर्ग १: विराध-वध

अध्यात्मरामायण


अरण्यकाण्ड


प्रथम सर्ग

विराध-वध।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! उस दिन
अथ तत्र दिनं स्थित्वा प्रभाते रघुनन्दनः ।<br>स्नात्वा मुनिं समामन्त्र्य प्रयाणायोपचक्रमे ॥ १ ॥अत्रि मुनिके आश्रममें ही रहकर दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान करनेके अनन्तर श्रीरघुनाथजीने मुनिवरकी सम्मतिसे चलनेकी तैयारी की ॥ १ ॥ वे बोले—"हे
मुने गच्छामहे सर्वे मुनिमण्डलमण्डितम् ।<br>विपिनं दण्डकं यत्र त्वमाज्ञातुमिहार्हसि ॥ २ ॥मुने ! हम सब मुनिमण्डलीसे सुशोभित दण्डकारण्यको जाना चाहते हैं, अतः आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये ॥२॥ और हमें मार्ग दिखानेके लिये कुछ शिष्योंको आज्ञा
मार्गप्रदर्शनार्थाय शिष्यानाज्ञाप्तुमर्हसि ।<br>श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रहस्यात्रिर्महायशाः ।<br>प्राह तत्र रघुश्रेष्ठं राम राम सुराश्रय ॥ ३ ॥दीजिये ।" रामजीका यह कथन सुनकर महायशस्वी अत्रि मुनि श्रीरघुनाथजीसे हँसकर बोले—"हे राम ! हे देवताओंके आश्रयरूप ! सबके मार्गदर्शक तो
सर्वस्य मार्गद्रष्टा त्वं तव को मार्गदर्शकः ।<br>तथापि दर्शयिष्यन्ति तव लोकानुसारिणः ॥ ४ ॥आप हैं, फिर आपका मार्गदर्शक कौन बनेगा ? तथापि इस समय आप लोक-व्यवहारका अनुसरण कर रहे हैं अतः मेरे शिष्यगण आपको मार्ग दिखानेके लिये जायँगे" ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर शिष्योंको आज्ञा दे
इति शिष्यान्समादिश्य स्वयं किञ्चित्तमन्वगात् ।<br>रामेण वारितः प्रीत्या अत्रिः स्वभवनं ययौ ॥ ५ ॥मुनिवर अत्रि स्वयं भी कुछ दूरं रामचन्द्रजीके साथ गये और फिर उनके प्रीतिपूर्वक मना करनेपर अपने आश्रमको लौट आये ॥ ५ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददर्श महतीं नदीम् ।<br>अत्रेः शिष्यानुवाचेदं रामो राजीवलोचनः ॥ ६ ॥एक कोश जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने एक बहुत बड़ी नदी देखी । तब कमलनयन रघुनाथजीने अत्रिके शिष्योंसे इस प्रकार पूछा—॥ ६ ॥ "हे ब्रह्मचारियो !
नद्याः सन्तरणे कश्चिदुपायो विद्यते न वा ।<br>ऊचुस्ते विद्यते नौका सुदृढा रघुनन्दन ॥ ७ ॥नदीको पार करनेका कोई उपाय है या नहीं ?" तब शिष्योंने कहा—"हे रघुनन्दन ! यहाँ एक सुदृढ़ नौका है ॥ ७ ॥ हम उसमें चढ़ाकर आपको एक
१०४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

तारयिष्यामहे युष्मान्वयमेव क्षणादिह ।
ततो नावि समारोप्य सीतां राघवलक्ष्मणौ ॥ ८॥
क्षणात्सन्तारयामासुर्नदीं मुनिकुमारकाः ।
रामाभिनन्दिताः सर्वे जग्मुरत्रेर्यथाश्रमम् ॥ ९॥

तावेत्य विपिनं घोरं झिल्लीझङ्कारनादितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं सिंहव्याघ्रादिभीषणम् ॥ १०॥
राक्षसैर्घोररूपैश्च सेवितं रोमहर्षणम् ।
प्रविश्य विपिनं घोरं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ११॥

इतः परं प्रयत्नेन गन्तव्यं सहितेन मे ।
धनुर्गुणेन संयोज्य शरानपि करे दधत् ॥ १२॥
अग्रे यास्याम्यहं पश्चात्त्वमन्वेहि धनुर्धरः ।
आवयोर्मध्यगा सीता मायेवात्मपरात्मनोः ॥ १३॥
चक्षुश्चारय सर्वत्र दृष्टं रक्षोभयं महत् ।
विद्यते दण्डकारण्ये श्रुतपूर्वमरिन्दम ॥ १४॥

इत्येवं भाषमाणौ तौ जग्मतुः सार्धयोजनम् ।
तत्रैका पुष्करिण्यास्ते कल्हारकुसुमोत्पलैः ॥ १५॥
अम्बुजैः शीतलोदेन शोभमाना व्यदृश्यत ।
तत्समीपमथो गत्वा पीत्वा तत्सलिलं शुभम् ॥ १६॥
ऊषुस्ते सलिलाभ्याशे क्षणं छायामुपाश्रिताः ।
ततो ददृशुरायान्तं महासत्त्वं भयानकम् ॥ १७॥
करालदंष्ट्रवदनं भीषणन्तं स्वगर्जितैः ।
वामांशे न्यस्तशूलाग्रग्रथितानेकमानुषम् ॥ १८॥
भक्षयन्तं गजव्याघ्रमहिषं वनगोचरम् ।
ज्याऽऽरोपितं धनुर्धृत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् १९
पश्य भ्रातर्महाकायो राक्षसोऽयमुपागतः ।
आयात्यभिमुखं नोऽग्रे भीरूणां भयमावहन् ॥ २०॥
सज्जीकृतधनुस्तिष्ठ मा भैर्र्जनकनन्दिनि ।


क्षणमें ही नदीके उस पार पहुँचा देंगे ।” तब मुनि-कुमारोंने सीताके सहित राम और लक्ष्मणको नौकामें चढ़ाकर एक क्षणमात्रमें नदीके उस पार पहुँचा दिया । और फिर रामचन्द्रजी द्वारा प्रशंसित हो अत्रि मुनिके आश्रमको लौट आये ॥ ८-९ ॥

तब वे झिल्लियोंकी झनकारसे गुञ्जायमान, विविध वन्य पशुओंसे पूर्ण और सिंह-व्याघ्र आदि हिंस्र पशुओंसे भयानक एक घोर वनमें पहुँचे ॥ १० ॥ भयंकर रूपधारी राक्षसोंसे सेवित उस रोमाञ्चकारी घोर वनमें घुसकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा— ॥ ११ ॥ “यहाँसे तुम्हें बहुत सावधान होकर हमारे साथ चलना होगा । मैं धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर और हाथमें बाण लेकर आगे-आगे चलता हूँ और तुम धनुष धारण कर पीछे चलो, तथा जीव और परमात्माके बीचमें रहनेवाली मायाके समान सीता हमारे बीचमें चलें ॥ १२-१३ ॥ हे अरिन्दम ! सब ओर सावधानीसे निगाह रक्खो । हमने पहले जैसा सुना था उसीके अनुसार इस दण्डकारण्यमें राक्षसोंका अत्यन्त भय दिखायी देता है” ॥ १४ ॥

इस प्रकार आपसमें बातचीत करते वे डेढ़ योजन (छः कोश) निकल गये । वहाँ कुमुद, कल्हार और कमलादिसे सुशोभित एक पुष्करिणी (तलाई) थी ॥ १५॥ वह कमलवन और शीतल जलसे अति सुन्दर दीख पड़ती थी । उन्होंने उसके निकट जाकर उसका शीतल जल पान किया ॥ १६ ॥ और कुछ देरकेलिये जलके किनारे वृक्षकी छायामें बैठ गये । उसी समय उन्होंने एक महा बलवान् और भयानक राक्षस आता देखा ॥ १७ ॥ उसका मुख तीक्ष्ण दाढ़ोंसे पूर्ण था, वह अपनी गर्जनासे अत्यन्त भय उत्पन्न करता था और उसके बाँयें कन्धेपर एक त्रिशूल रखा था जिसमें बहुत-से मनुष्य बिंधे हुए थे ॥ १८ ॥ वह बहुत-से जंगली हाथी, सिंह और भैंसोंको खाता हुआ आ रहा था । उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रत्यञ्चा चढ़ाये हुए अपने धनुषको उठाकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥ १९ ॥ “भाई ! देखो, हमारे सामने यह भीरु पुरुषोंको डरानेवाला उग्ररूप महाकाय राक्षस आ रहा है ॥ २० ॥ तुम धनुषपर बाण चढ़ाकर सावधान हो जाओ; जानकि ! तुम डरना मत !” ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी धनुषपर

सर्ग १ ] अरण्यकाण्ड १०५


इत्युक्त्वा बाणमादाय स्थितो राम इवाचलः ॥२१॥

स तु दृष्ट्वा रमानाथं लक्ष्मणं जानकीं तदा ।
अट्टहासं ततः कृत्वा भीषणमिदमब्रवीत् ॥२२॥
कौ युवां बाणतूणीरजटावल्कलधारिणौ ।
मुनिवेषधरौ बालौ स्त्रीसहायौ सुदुर्मदौ ॥२३॥
सुन्दरौ बत मे वक्त्रप्रविष्टकवलोपमौ ।
किमर्थमागतौ घोरं वनं व्यालनिषेवितम् ॥२४॥

श्रुत्वा रक्षोवचो रामः स्मयमान उवाच तम् ।
अहं रामस्त्वयं भ्राता लक्ष्मणो मम सम्मतः ॥२५॥
एषा सीता मम प्राणवल्लभा वयमागताः ।
पितृवाक्यं पुरस्कृत्य शिक्षणार्थं भवादृशाम् ॥२६॥

श्रुत्वा तद्रामवचनमट्टहासमथाकरोत् ।
व्यादाय वक्त्रं बाहुभ्यां शूलमादाय सत्वरः ॥२७॥
मां न जानासि राम त्वं विराधं लोकविश्रुतम् ।
मद्भयान्मुनयः सर्वे त्यक्त्वा वनमितो गताः ॥२८॥
यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति त्यक्त्वा सीतां निरायुधौ ।
पलायतं न चेच्छीघ्रं भक्षयामि युवामहम् ॥२९॥

इत्युक्त्वा राक्षसः सीतामादातुमभिदुद्रुवे ।
रामश्चिच्छेद तद्बाहू शरेण प्रहसन्निव ॥३०॥
ततः क्रोधपरीतात्मा व्यादाय विकटं मुखम् ।
राममभ्यद्रवद्रामश्चिच्छेद परिधावतः ॥३१॥
पदद्वयं विराधस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥३२॥
ततः सर्प इवास्येन ग्रसितुं राममापतत् ।
ततोऽर्धचन्द्राकारेण बाणेनास्य महच्छिरः ॥३३॥
चिच्छेद रुधिरौघेण पपात धरणीतले ।


बाण चढ़ा पर्वतके समान निश्चल होकर खड़े हो गये ॥ २१ ॥

तदनन्तर उस राक्षसने राम, लक्ष्मण और जानकीजी-को देखकर बड़ा अट्टहास किया और सबको भयभीत करते हुए इस प्रकार कहा—॥ २२ ॥ “अरे बालको ! बाण, तूणीर और जटा-वल्कल आदि मुनिवेष धारण किये तुम कौन हो ? तुम्हारे साथमें एक स्त्री है और तुम बड़े मदोन्मत्त दिखायी देते हो ॥ २३ ॥ तुम बड़े सुन्दर हो और मेरे मुखमें जानेवाले ग्रासके समान हो । हाय ! सर्पादिकोंसे पूर्ण इस घोर वनमें तुम किसलिये आये हो ?” ॥ २४ ॥

राक्षसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे मुसकाकर कहा—“मेरा नाम राम है और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ २५ ॥ तथा यह रमणी मेरी प्राणप्रिया सीता है । हम पिताकी आज्ञासे तुम-जैसोंको शिक्षा देनेके लिये इस वनमें आये हैं” ॥ २६ ॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर वह ठट्ठा मारकर हँसने लगा और उसने मुँह फैलाकर तुरन्त ही अपने हाथोंमें त्रिशूल उठा लिया ॥ २७ ॥ और बोला—“राम ! क्या तुम मुझे नहीं जानते ? मैं जगत्प्रसिद्ध विराध नामक राक्षस हूँ । मेरे ही भयसे समस्त मुनिजन इस वनको छोड़कर चले गये हैं ॥ २८ ॥ यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो सीताको छोड़कर बिना अस्त्र-शस्त्रोंके भाग जाओ, नहीं तो मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा” ॥ २९ ॥

ऐसा कह वह राक्षस सीताजीको पकड़नेके लिये उनकी ओर दौड़ा । तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए अपने बाणसे उसकी भुजाएँ काट डालीं ॥ ३० ॥ इसपर वह अत्यन्त क्रोधसे सन्तप्त हो अपना विकराल मुख फाड़कर रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । तब श्रीरघुनाथजीने अपनी ओर आते हुए विराधके दोनों पैर काट डाले। यह बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर, सर्पके समान अपने मुखसे ही रामजीको निगल जानेके लिये वह उनकी ओर बढ़ा । तब भगवान् रामने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका महान् शिर काट डाला । तब वह रुधिरसे लथपथ होकर तत्काल पृथिवीपर गिर पड़ा । इस प्रकार


१४

१०६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

[संस्कृत श्लोक]

ततः सीता समालिङ्ग्य प्रशशंस रघूत्तमम् ॥३४॥

ततो दुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवगणैरिताः । ननृतुश्चाप्सरा हृष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥३५॥

विराधकायादतिसुन्दराकृति- र्विभ्राजमानो विमलाम्बरावृतः । प्रतप्तचामीकरचारुभूषणो व्यदृश्यताग्रे गगने रवैर्यथा ॥३६॥

प्रणम्य शमं प्रणतार्तिहारिणं भवप्रवाहोपरमं घृणाकरम् । प्रणम्य भूयः प्रणनाम दण्डवत्- प्रपन्नसर्वार्तिहरं प्रसन्नधीः ॥३७॥

विराध उवाच

श्रीराम राजीवदलायताक्ष विद्याधरोऽहं विमलप्रकाशः । दुर्वाससाऽकारणकोपमूर्त्तिना शप्तः पुरा सोऽद्य विमोचितस्त्वया ॥३८॥

इतः परं त्वच्चरणारविन्दयोः स्मृतिः सदा मेऽस्तु भवोपशान्तये । त्वन्नामसङ्कीर्तनमेव वाणी करोतु मे कर्णपुटं त्वदीयम् ॥३९॥

कथामृतं पातु करद्वयं ते पादारविन्दार्चनमेव कुर्यात् । शिरश्च ते पादयुगप्रणामं करोतु नित्यं भवदीयमेवम् ॥४०॥

नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये । आत्मारामय रामाय सीतारामाय वेधसे ॥४१॥

प्रपन्नं पाहि मां राम यास्यामि त्वदनुज्ञया । देवलोकं रघुश्रेष्ठ माया मां मावृणोतु ते ॥४२॥

इति विज्ञापितस्तेन प्रसन्नो रघुनन्दनः । ददौ वरं तदा प्रीतो विराघाय महामतिः ॥४३॥


[हिन्दी अनुवाद]

उसे मरा देख श्रीसीताजीने रघुश्रेष्ठ भगवान् रामका आलिंगनकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥३३-३४॥

उस समय आकाशमें देवगण दुन्दुभी बजाने लगे, अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक नाचने लगीं और गन्धर्व तथा किन्नरगण गाने लगे ॥ ३५॥

इसी समय विराधके मृत शरीरसे आकाशस्थित सूर्यदेवके समान एक सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित और तपाये हुए सुवर्णालंकारोंसे सुसज्जित अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥३६॥ उस पुरुषने शरणागत जनोंका दुःख दूर करनेवाले, संसार-सागरसे पार करनेवाले, दयामय श्रीरामचन्द्रजीको प्रसन्नचित्तसे प्रणाम कर उन प्रसन्नचित्त और शरणागतोंके सकल दुःख दूर करनेवाले प्रभुको फिर भी दण्डके समान पृथिवीपर लोटकर बारम्बार प्रणाम किया ॥ ३७ ॥

विराध बोला—हे कमलदललोचन श्रीराम ! मैं विमलतेजोमय विद्याधर हूँ । मुझे पूर्वकालमें बिना कारण ही क्रोध करनेवाले श्रीदुर्वासाजीने शाप दिया था सो आज आपने मुझे शाप-मुक्त कर दिया ॥ ३८ ॥

अब आप ऐसी कृपा करें जिससे भविष्यमें मुझे संसार-बन्धनको दूर करनेवाली आपके चरणारविन्दोंकी स्मृति सर्वदा बनी रहे, मेरी वाणी सर्वदा आपका नामसंकीर्तन करती रहे, कान आपका कथामृत पान करते रहें, हाथ आपके चरणकमलोंका पूजन करते रहें और इसी प्रकार शिर आपके चरणयुगलोंमें प्रणाम करता रहे॥ ३९-४० ॥ हे विशुद्धज्ञानस्वरूप भगवन् ! आपको नमस्कार है । आप आत्मारूपसे सबमें रमण करनेवाले होनेसे राम हैं, (अपनी मायाके सहित विराजमान होनेसे युगलमूर्ति) श्रीसीता-राम हैं और संसारके रचनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥

हे राम ! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये । हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञासे मैं देवलोकको जा रहा हूँ; आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आपकी माया मुझे आच्छादित न करे ॥ ४२ ॥

विराधके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महामति श्रीरघुनाथजीने उसे प्रसन्न होकर यह वर दिया-॥ ४३ ॥

अरण्यकाण्ड - सर्ग २: शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट

सर्ग २ ]अरण्यकाण्ड१०७

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
गच्छ विद्याधराशेषमायादोषगुणा जिताः।<br>त्वया मदर्शनात्सद्यो मुक्तो ज्ञानवतां वरः ॥४४॥<br>मद्भक्तिर्दुर्लभा लोके जाता चेन्मुक्तिदा यतः।<br>अतस्त्वं भक्तिसम्पन्नः परं याहि ममाज्ञया ॥४५॥"हे विद्याधर ! अब तू जा । तूने मायाके सम्पूर्ण गुण-दोषोंको जीत लिया है। तू ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ है और मेरे दर्शनके प्रभावसे तुरन्त मुक्त हो गया है ॥ ४४ ॥ संसारमें मेरी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि वह उत्पन्न होती है तो अवश्य मुक्ति देनेवाली होती है। तू मेरी भक्तिसे सम्पन्न है, इसलिये मेरी आज्ञासे तू परमधामको जा" ॥ ४५ ॥
रामेण रक्षोनिधनं सुघोरं<br>शापाद्विमुक्तिर्वरदानमेवम् ।<br>विद्याधरत्वं पुनरेव लब्धं<br>रामं गृणन्नेति नरोऽखिलार्थान् ॥४६॥इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीद्वारा किये हुए इस भयंकर राक्षसके वध, उसके शापसे मुक्त होने, वरदान पाने और पुनः विद्याधरत्व प्राप्त करनेके वृत्तान्तको जो पुरुष श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए पढ़ता या सुनता है वह अवश्य सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंको पाता है ॥ ४६ ॥
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इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे<br> अरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥१॥


द्वितीय सर्ग

शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट।

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संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रीमहादेव उवाच<br>विराधे स्वर्गते रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।<br>जगाम शरभङ्गस्य वनं सर्वसुखावहम् ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! विराधके स्वर्ग सिधारनेपर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ शरभंग मुनिके सर्वसुखदायक तपोवनको गये ॥ १ ॥
शरभङ्गस्ततो दृष्ट्वा रामं सौमित्रिणा सह ।<br>आयान्तं सीतया सार्धं सम्भ्रमादुत्थितः सुधीः ॥२॥मतिमान् शरभंग श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित आते देख सहसा उठ खड़े हुए ॥ २ ॥
अभिगम्य सुसम्पूज्य विष्टरेषूपवेशयत् ।<br>आतिथ्यमकरोत्तेषां कन्दमूलफलादिभिः ॥ ३ ॥और आगे बढ़कर उनकी भली प्रकार पूजाकर उनको आसनपर बैठाया तथा कन्द-मूल-फलादिसे उनका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ ३ ॥
प्रीत्याऽऽह शरभङ्गोऽपि रामं भक्तपरायणम् ।<br>बहुकालमिहैवासं तपसे कृतनिश्चयः ॥ ४ ॥तदनन्तर मुनिवर शरभंगने भक्तवत्सल भगवान् रामसे प्रीतिपूर्वक कहा— "मैं बहुत कालसे आपके दर्शनोंकी आकांक्षासे तपस्याका निश्चयकर यहीं रहता हूँ ॥ ४ ॥
तव सन्दर्शनाकाङ्क्षी राम त्वं परमेश्वरः ।<br>अद्य मत्तपसा सिद्धं यत्पुण्यं बहु विद्यते ।<br>तत्सर्वं तव दास्यामि ततो मुक्तिं व्रजाम्यहम् ॥ ५ ॥हे राम ! आप साक्षात् परमात्मा हैं। मुझे तपस्याके द्वारा जो बहुत-सा पुण्य प्राप्त हुआ है वह सब आज आपको देकर मैं मोक्षपद प्राप्त करूँगा" ॥ ५ ॥
समर्प्य रामस्य महत्सुपुण्य-<br>फलं विरक्तः शरभङ्गयोगी ।ऐसा कह महाविरक्त मुनिवर शरभंग अपना महान् पुण्य-फल श्रीरामचन्द्रजीको समर्पण कर सीताके सहित
१०८अध्यात्मरामायण[ सर्ग २

चितिं समारोहयदप्रमेयं<br>रामं ससीतं सहसा प्रणम्य ॥ ६ ॥<br>ध्यायंश्चिरं राममशेषहृत्स्थं<br>दूर्वादलश्यामलमम्बुजाक्षम् ।<br>चीराम्बरं स्निग्धजटाकलापं<br>सीतासहायं सहलक्ष्मणं तम् ॥ ७ ॥<br>को वा दयालुः स्मृतकामधेनु-<br>रन्यो जगत्त्यां रघुनायकादहो ।<br>स्मृतो मया नित्यमनन्यभाजा<br>ज्ञात्वा स्मृतिं मे स्वयमेव यातः ॥ ८ ॥<br>पश्यत्विदानीं देवेशो रामो दाशरथिः प्रभुः ।<br>दग्ध्वा स्वदेहं गच्छामि ब्रह्मलोकमकल्मषः ॥ ९ ॥<br>अयोध्यापतिर्मेऽस्तु हृदये राघवः सदा ।<br>यद्वामाङ्के स्थिता सीता मेघस्येव तडिल्लता ॥ १० ॥ | अप्रमेय भगवान् रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ गये ॥ ६ ॥ उस समय वे मन-ही-मन सर्वान्तर्यामी, दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, चीराम्बरधारी, स्निग्ध जटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका सीता और लक्ष्मणके सहित बहुत देरतक ध्यान करते रहे ॥ ७ ॥ (फिर मन-ही-मन कहने लगे—) "अहो ! इस संसारमें श्रीरघुनाथजीको छोड़कर स्मरण करनेवालेकी कामनाओं-को इस प्रकार पूर्ण करनेवाला और कौन दयालु है ? मैं अनन्य भावसे उनका नित्य स्मरण करता था । अतः मेरे स्मरणको जानकर वे स्वयं ही चले आये ॥ ८ ॥ दशरथनन्दन भगवान् राम ! मेरी ओर देखते रहिये, मैं अपना शरीर जलाकर अब निष्पाप होकर ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ ॥ ९ ॥ मेरे हृदयमें सर्वदा अयोध्यापति श्रीरामचन्द्रजी विराजमान रहें, जिनके वामांकमें मेघमें बिजलीके समान श्रीसीताजी विराजमान हैं" ॥ १० ॥

इति रामं चिरं ध्यात्वा दृष्ट्वा च पुरतः स्थितम् ।<br>प्रज्वाल्य सहसा वह्निं दग्ध्वा पञ्चात्मकं वपुः ॥ ११ ॥<br>दिव्यदेहधरः साक्षाद्ययौ लोकपतेः पदम् । | इस प्रकार रामचन्द्रजीका बहुत देरतक ध्यान करते हुए तथा अपने सम्मुख विराजमान उनके दिव्य स्वरूपको देखते हुए मुनिवर शरभंगने अग्नि प्रज्वलित-कर अपना पाञ्चभौतिक शरीर जला डाला ॥ ११ ॥ नया दिव्य देह धारणकर साक्षात् ब्रह्मलोकको चले गये ।

ततो मुनिगणाः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः ।<br>आजग्मू राघवं द्रष्टुं शरभङ्गनिवेशनम् ॥ १२ ॥<br>दृष्ट्वा मुनिसमूहं तं जानकीरामलक्ष्मणाः ।<br>प्रणेमुः सहसा भूमौ मायामानुषरूपिणः ॥ १३ ॥<br>आशीर्भरभिनन्द्याथ रामं सर्वहृदि स्थितम् ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे धनुर्बाणधरं हरिम् ॥ १४ ॥<br>भूमेर्भारावताराय जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः ।<br>जानीमस्त्वां हरिं लक्ष्मीं जानकीं लक्ष्मणं तथा ॥ १५ ॥<br>शेषांशं शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजं तथा ।<br>अतश्चादौ ऋषीणां त्वं दुःखं मोक्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥<br>आगच्छ यामो मुनिसेवितानि<br>वनानि सर्वाणि रघूत्तम क्रमात् । | तदनन्तर दण्डकारण्यवासी समस्त मुनिगण श्री-रघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये शरभंग मुनिके आश्रमपर आये ॥ १२ ॥ मुनि-समाजको देखकर माया-मानव-रूप श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने सहसा पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥ उन मुनीश्वरोंने सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका आशीर्वाद-द्वारा अभिनन्दन किया और फिर वे धनुर्बाणधारी श्रीहरिसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १४ ॥ "आपने ब्रह्माकी प्रार्थनासे पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतार लिया है । हम यह जानते हैं कि आप साक्षात् श्रीहरि, जानकीजी लक्ष्मी, लक्ष्मणजी शेषनाग और भरत-शत्रुघ्न भगवान्‌के शंख और चक्र हैं । इसलिये आप यहाँ सबसे पहले ऋषियोंका दुःख दूर करें ॥ १५-१६ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आइये, सीता और लक्ष्मण-सहित आप हमारे साथ क्रमशः मुनीश्वरोंके समस्त

सर्ग २ ] अरण्यकाण्ड १०९


द्रष्टुं सुमित्रासुतजानकीभ्यां<br>तदा दयाऽस्मासु दृढा भविष्यति ॥१७॥आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे आपको हमपर बड़ी दया आयेगी" ॥१७॥
इति विज्ञापितो रामः कृताञ्जलिपुटैर्विभुः ।<br>जगाम मुनिभिः सार्धं द्रष्टुं मुनिवनानि सः ॥१८॥इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर भगवान् राम मुनियोंके साथ उनके तपोवनोंको देखने-के लिये चले ॥ १८ ॥
ददर्श तत्र पतितान्यनेकानि शिरांसि सः ।<br>अस्थिभूतानि सर्वत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥१९॥वहाँ उन्होंने सब ओर बहुत-सी खोपड़ियाँ पड़ी देखीं। उन्हें देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे पूछा-॥ १९ ॥
अस्थीनि केषामेतानि किमर्थं पतितानि वै ।<br>तमूचुर्मुनयो राम ऋषीणां मस्तकानि हि ॥२०॥"ये हड्डियाँ किनकी हैं और इस तपोभूमिमें कैसे पड़ी हैं?" तब मुनीश्वरोंने कहा-"हे राम ! ये ऋषियोंके मस्तक हैं ॥ २०॥
राक्षसैर्भक्षितानीश प्रमत्तानां समाधितः ।<br>अन्तरायं मुनीनां ते पश्यन्तोऽनुचरन्ति हि ॥२१॥हे समर्थ ! इन्हें राक्षसोंके खा लिया है, वे राक्षस समाधिसे विरत हुए मुनीश्वरोंको भक्षण करनेके लिये मौका देखते हुए जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं" ॥ २१ ॥
श्रुत्वा वाक्यं मुनीनां स भयदैन्यसमन्वितम् ।<br>प्रतिज्ञामकरोद्रामो वधायाशेषरक्षसाम् ॥२२॥मुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीराम-चन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की ॥ २२ ॥
पूज्यमानः सदा तत्र मुनिभिर्वनवासिभिः ।<br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ॥२३॥<br>उवास कतिचित्तत्र वर्षाणि रघुनन्दनः ।<br>एवं क्रमेण संपश्यन्नृषीणामाश्रमान्विभुः ॥२४॥इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोंके आश्रम देखते हुए श्रीरघुनाथजी वनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित हुए सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे ॥ २३-२४॥
सुतीक्ष्णस्याश्रमं प्रागात्प्रख्यातमृषिसङ्कुलम् ।<br>सर्वर्तुगुणसम्पन्नं सर्वकालसुखावहम् ॥२५॥तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये जो ऋषियोंसे घिरा हुआ समस्त ऋतुओंके गुणोंसे युक्त और सब समय सुखदायक था ॥ २५॥
राममागतमाकर्ण्य सुतीक्ष्णः स्वयमागतः ।<br>अगस्त्यशिष्यो रामस्य मन्त्रोपासनतत्परः ।<br>विधिवत्पूजयामास भक्त्युत्कण्ठितलोचनः ॥२६॥रामका आगमन सुन राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें लेनेके लिये स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत् पूजा की । उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगव-द्दर्शनके लिये अति उतावले हो रहे थे ॥ २६ ॥
सुतीक्ष्ण उवाच<br>त्वन्मन्त्रजाप्यहमनन्तगुणाममेय<br>सीतापते शिवविरिञ्चिसमाश्रिताङ्घ्रे ।<br>संसारसिन्धुतरणामलपोतपाद<br>रामाभिराम सततं तव दासदासः ॥२७॥**सुतीक्ष्ण बोले—**हे अनन्त-गुण अप्रमेय सीता-पते ! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ । हे अभिराम राम ! आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सुदृढ पोत (जहाज) स्वरूप हैं; शिव और ब्रह्मा सर्वदा उनकी सेवा करते हैं। हे नाथ ! मैं सर्वदा आपके दासोंका दास हूँ ॥ २७ ॥
मामद्य सर्वजगतामविगोचरस्त्वं<br>त्वन्मायया सुतकलत्रगृहान्धकूपे ।<br>मग्नं निरीक्ष्य मलपुद्गलपिण्डमोह-<br>पाशानुबद्धहृदयं स्वयमागतोऽसि ॥२८॥आप समस्त संसार-की इन्द्रियोंके अविषय हैं, तथापि इस मल-मूत्रके पुतले शरीरके मोह-पाशमें जिसका हृदय बँधा हुआ है ऐसे मुझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र-कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप स्वयं ही मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये पधारे हैं ! ॥ २८ ॥ आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराज-
११०अध्यात्मरामायण[ सर्ग २
त्वं सर्वभूतहृदयेषु कृतालयोऽपि<br>त्वन्मन्त्रजाप्यविमुखेषु तनोषि मायाम्<br>त्वन्मन्त्रसाधनपरेष्वपयाति माया<br>सेवानुरूपफलदोऽसि यथा महीपः ॥ २९ ॥मान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे विमुख हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं और जो उस मन्त्रके जापमें तत्पर हैं उनकी माया दूर हो जाती है। इस प्रकार राजाके समान आप सबको उनकी सेवाके अनुसार फल देनेवाले हैं ॥ २९ ॥ हे ईश ! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं; तथापि मुग्धचित्त पुरुषोंको त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आदि विविध रूपोंमें भासते हैं; जिस प्रकार जलके पात्रोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य अनेक होकर भासता है ॥ ३० ॥ हे राम ! आप अज्ञान-से सर्वथा परे हैं। तथापि आपके चरणकमलोंको आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। (इससे विदित होता है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोंको अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे शुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आप रूपरहित हैं, तथापि अपने ही माया-विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुष्य-वेष-धारी स्वरूपको मैं देख रहा हूँ। आपका यह रूप करोड़ों कामदेवोंके समान कान्तिमान् है और कमनीय धनुर्बाण धारण किये है। आपका हृदय दयार्द्र तथा मुख मनोहर मुसकानयुक्त है ॥ ३२ ॥ जो सीताजीसे युक्त हैं, कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं, सर्वथा अजेय हैं, जिनके चरणकमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित हैं और जिनकी नीलकमलके समान आभा है उन अनन्तगुणसम्पन्न शान्तमूर्ति सौभाग्यस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥ हे राम ! जो लोग आपके स्वरूपको देश-काल आदि समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशस्वरूप जानते हैं, वे भले ही वैसा ही जानें; किन्तु मेरे हृदयमें तो, आज जो प्रत्यक्षरूपसे मुझे दिखायी दे रहा है, यही रूप भासमान होता रहे। इसके अतिरिक्त मुझे और किसी रूप की इच्छा नहीं है ॥ ३४ ॥
विश्वस्य सृष्टिलयसंस्थितिहेतुरेक-<br>स्त्वं मायया त्रिगुणया विधिरीशविष्णू<br>भासीश मोहितधियां विविधाकृतिस्त्वं<br>यद्वद्रविः सलिलपात्रगतो ह्यनेकः ॥ ३० ॥
प्रत्यक्षतोऽद्य भवतश्चरणारविन्दं<br>पश्यामि राम तमसः परतः स्थितस्य ।<br>दृक्प्रत्यस्त्वमसतामविगोचरोऽपि<br>त्वन्मन्त्रपूतहृदयेषु सदा प्रसन्नः ॥ ३१ ॥
पश्यामि राम तव रूपमरूपिणोऽपि<br>मायाविडम्बनकृतं सुमनुष्यवेषम् ।<br>कन्दर्पकोटिसुभगं कमनीयचाप-<br>बाणं दयार्द्रहृदयं स्मितचारुवक्त्रम् ॥ ३२ ॥
सीतासमेतमजिनाम्बरमप्रधृष्यं<br>सौमित्रिणा नियतसेवितपादपद्मम् ।<br>नीलोत्पलद्युतिमनन्तगुणं प्रशान्तं<br>तद्भागधेयमनिशं प्रणमामि रामम् ॥ ३३ ॥
जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश-<br>कालाद्युपाधिरहितं घनचित्रप्रकाशम् ।<br>प्रत्यक्षतोऽद्य मम गोचरमेतदेव<br>रूपं विभातु हृदये न परं विकाङ्क्षे ॥ ३४ ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य रामः सस्मितमब्रवीत् ।<br>मुने जानामि ते चित्तं निर्मलं मदुपासनात् ॥ ३५ ॥<br>अतोऽहमागतो द्रष्टुं मदृते नान्यसाधनम् ।<br>मन्मन्त्रोपासका लोके मामेव शरणं गताः ॥ ३६ ॥सुतीक्ष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे मुसकाकर कहा—"हे मुने ! मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया है ॥ ३५ ॥ और तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है, इसीलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया हूँ। संसारमें जो लोग मेरे मन्त्रकी उपासना करते हैं और

अरण्यकाण्ड - सर्ग ३: मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट

सर्ग ३ ] अरण्यकाण्डे १११


| निरपेक्षा नान्यगतास्तेषां दृश्योऽहमन्वहम् ।<br>स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु त्वत्कृतं मत्प्रियं सदा ॥३७॥<br>सद्भक्तिर्मे भवेत्तस्य ज्ञानं च विमलं भवेत् ।<br>त्वं ममोपासनादेव विमुक्तोऽसीह सर्वतः ॥३८॥<br>देहान्ते मम सायुज्यं लप्स्यसे नात्र संशयः ।<br>गुरुं ते द्रष्टुमिच्छामि ह्यगस्त्यं मुनिनायकम् ।<br>किञ्चित्कालं तत्र वस्तुं मनो मे त्वरयत्यलम् ॥३९॥<br><br>सुतीक्ष्णोऽपि तथेत्याह श्वो गमिष्यसि राघव ।<br>अहमप्यागमिष्यामि चिराद्दृष्टो महामुनिः ॥४०॥<br>अथ प्रभाते मुनिना समेतो<br>रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन ।<br>अगस्त्यसम्भाषणलोलमानसः<br>शनैरगस्त्यानुजमन्दिरं ययौ ॥४१॥ | मेरी ही शरणमें रहते हैं ॥ ३६ ॥ तथा नित्य निरपेक्ष और अनन्यगति रहते हैं, उन्हें मैं नित्यप्रति दर्शन देता हूँ। जो व्यक्ति तुम्हारे किये हुए इस मेरे प्रिय स्तोत्रका पाठ करता है ॥ ३७॥ उसे मेरी शुद्ध भक्ति और निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है, तुम केवल मेरी उपासनासे इस जीवितावस्थामें ही सब प्रकार मुक्त हो गये हो ॥ ३८ ॥ शरीर छूटनेपर तुम निस्सन्देह मेरा सायुज्यपद प्राप्त करोगे। अब मैं तुम्हारे गुरु मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे मिलना चाहता हूँ; मेरा चित्त उनके पास कुछ दिन रहनेके लिये उतावला हो रहा है” ॥ ३९ ॥<br><br>सुतीक्ष्णने कहा, “बहुत अच्छा, वहाँ कल चलिये । मैने भी मुनीश्वरको बहुत दिन हुए तब देखा था । अतः हे राघव ! मैं भी आपके साथ ही वहाँ चलूँगा” ॥ ४० ॥ प्रातःकाल होनेपर सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण मुनिको लेकर अगस्त्यजीसे वार्तालाप करनेके लिये उत्कण्ठित हो शनैः-शनैः उनके छोटे भाई ( अग्निजिह्व मुनि ) के आश्रमकी ओर चले ॥ ४१ ॥ |


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीय सर्ग

मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट ।

| श्रीमहादेव उवाच<br>अथ रामः सुतीक्ष्णेन जानक्या लक्ष्मणेन च ।<br>अगस्त्यस्यानुजस्थानं मध्याह्ने समपद्यत ॥ १ ॥<br>तेन सम्पूजितः सम्यग्भुक्त्वा मूलफलादिकम् ।<br>परेद्युः प्रातरुत्थाय जग्मुस्तेऽगस्त्यमण्डलम् ॥ २ ॥<br>सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं नानामृगगणैर्युतम् ।<br>पक्षिसङ्घैश्च विविधैर्नादितं नन्दनोपमम् ॥ ३ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! उस दिन मध्याह्नके समय श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण, सीता और लक्ष्मणके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई अग्निजिह्व मुनिके आश्रममें पहुँचे ॥ १ ॥ उन्होंने उनकी भली प्रकार पूजा की फिर उनके दिये हुए कन्द-मूल-फल आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य मुनिके आश्रमको चले ॥ २ ॥<br><br>वह आश्रम समस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोंसे परिपूर्ण, विविध वन्य पशुओंसे सेवित तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे गुञ्जायमान नन्दनवनके समान सुशोभित |