अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
|---|
को वाऽत्र वारिधिं तीर्त्वा राजकार्यं करिष्यति ॥४॥
एतेषां वानराणां स प्राणदाता न संशयः ।
तदुत्तिष्ठतु मे शीघ्रं पुरतो यो महाबलः ॥५॥
वानराणां च सर्वेषां रामसुग्रीवयोरपि ।
स एव पालको भूयान्नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
इत्युक्ते युवराजेन तूष्णीं वानरसैनिकाः ।
आसन्नोचुः किञ्चिदपि परस्परविलोकिनः ॥७॥
अङ्गद उवाच
उच्यतां वै बलं सर्वैः प्रत्येकं कार्यसिद्धये ।
केन वा साध्यते कार्यं जानीमस्तदनन्तरम् ॥८॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रोचुर्वीरा बलं पृथक् ।
योजनानां दशारभ्य दशोत्तरगुणं जगुः ॥९॥
शतादर्वाग्जाम्बवांस्तु प्राह मध्ये वनौकसाम् ।
पुरा त्रिविक्रमे देवे पादं भूमानलक्षणम् ॥१०॥
त्रिःसप्तकृत्वोऽहमगां प्रदक्षिणविधानतः ।
इदानीं वार्धकग्रस्तो न शक्नोमि विलङ्घितुम् ॥११॥
अङ्गदोऽप्याह मे गन्तुं शक्यं पारं महोदधेः ।
पुनर्लङ्घनसामर्थ्यं न जानाम्यस्ति वा न वा ॥१२॥
तमाह जाम्बवान्वीरस्त्वं राजा नो नियामकः ।
न युक्तं त्वां नियोक्तुं मे त्वं समर्थोऽसि यद्यपि ॥१३॥
अङ्गद उवाच
एवं चेत्पूर्ववत्सर्वे स्वप्स्यामो दर्भविष्टरे ।
केनापि न कृतं कार्यं जीवितुं च न शक्यते ॥१४॥
तमाह जाम्बवान्वीरो दर्शयिष्यामि ते सुत ।
येनासाकं कार्यसिद्धिर्भविष्यत्यचिरेण च ॥१५॥
| राजकार्य सम्पन्न करे ॥४॥ वह निःसन्देह इन समस्त वानरोंको प्राण-दान करनेवाला होगा । अतः जो महाबलवान् वीर ऐसा हो वह शीघ्र ही मेरे सामने आवे ॥५॥ इसमें कोई सन्देह नहीं, वही सम्पूर्ण वानरोंकी, सुग्रीवकी और स्वयं भगवान् रामकी भी रक्षा करनेवाला होगा" ॥६॥
<br>युवराज अंगदके इस प्रकार कहनेपर समस्त वानर-सेनापति चुपचाप बैठे रहे, किसीके मुखसे एक शब्द भी न निकला, परस्पर एक-दूसरेका मुख ताकते रह गये ॥७॥
<br>अंगद बोले—अच्छा, इस कार्यको सिद्ध करनेके लिये सब लोग अपनी शक्तिका वर्णन करो। तब इस बातका पता चल जायगा कि इसे कौन साध सकेगा ॥८॥
<br>अंगदजीकी यह बात सुनकर सब वानर-वीर पृथक्-पृथक् अपना बल बतलाने लगे । उनमेंसे एक-एकने दश योजनसे लेकर क्रमशः दश-दश योजन अधिक जानेतककी अपनी सामर्थ्य बतायी ॥९॥ अन्तमें, उन सब वनचरोंमेंसे जाम्बवान्ने अपनी शक्ति सौ योजनके भीतरतक जानेकी बतायी। वे बोले—"पूर्वकालमें जब भगवान्ने त्रिविक्रम अवतार लिया था तो मैं, उनके पृथिवीके बराबर परिमाणवाले चरणके चारों ओर परिक्रमा करनेके लिये, इक्कीस बार फिरा था। किन्तु अब मुझे वृद्धावस्थाने दबा लिया है इसलिये मैं समुद्रको नहीं लाँघ सकता" ॥१०-११॥
<br>अंगदजीने भी कहा—"मैं इस महासागरके पार तो जा सकता हूँ, किन्तु फिर लौटनेकी सामर्थ्य है या नहीं यह नहीं जानता" ॥१२॥ तब वीरवर जाम्बवान्ने उनसे कहा—"अंगदजी ! इस कार्यके करनेमें यद्यपि आप सर्वथा समर्थ हैं तथापि आपको इस कार्यमें नियुक्त करना हमें ठीक नहीं जँचता, क्योंकि आप हमारे नायक और नियामक हैं" ॥१३॥
<br>अंगद बोले—"यदि ऐसी बात है, तो हम सबको (प्रायोपवेशनका संकल्प करके) फिर पूर्ववत् कुशासनों पर ही पड़ रहना चाहिये; क्योंकि यह काम तो किसीसे हुआ नहीं, फिर जीवन भी कैसे रह सकता है ?"॥१४॥
<br>तब वीरवर जाम्बवान्ने कहा—"बेटा ! जिसके हाथसे हमारा यह कार्य बहुत शीघ्र ही सिद्ध होगा उस वीरको मैं तुझे दिखलाता हूँ" ॥१५॥