अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| सर्ग ९ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १९९ | | :--- | :--- |
| इत्युक्त्वा जाम्बवान्प्राह हनूमन्तमवस्थितम्।<br>हनूमन्किं रहस्तूष्णीं स्थीयते कार्यगौरवे ॥१६॥<br>प्राप्तेऽज्ञेनेव सांमर्थ्यं दर्शयाद्य महाबल।<br>त्वं साक्षाद्वायुतनयो वायुतुल्यपराक्रमः ॥१७॥<br>रामकार्यार्थमेव त्वं जनितोऽसि महात्मना।<br>जातमात्रेण ते पूर्वं दृष्ट्वोद्यन्तं विभावसुम् ॥१८॥<br>पक्वं फलं जिघृक्षामीत्युत्प्लुतं बालचेष्टया।<br>योजनानां पञ्चशतं पतितोऽसि ततो भुवि ॥१९॥<br>अतस्त्वद्बलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम्।<br>उत्तिष्ठ कुरु रामस्य कार्यं नः पाहि सुव्रत ॥२०॥ | यों कहकर जाम्बवान्ने वहाँ बैठे हुए हनूमान्जीसे कहा—"हे हनूमन् ! इस महान् कार्यके उपस्थित होनेपर आप इस प्रकार अनजानके समान चुपचाप एकान्तमें क्यों बैठे हैं? हे महावीर! आप साक्षात् पवनदेवके पुत्र हैं और उन्हींके समान पराक्रमी हैं, अतः आज अपनी सामर्थ्य दिखलाइये ॥१६-१७॥ महात्मा वायुने राम-कार्यके लिये ही आपको उत्पन्न किया है। जिस समय आपका जन्म हुआ था उसी समय आप सूर्यको उदय हुआ देखकर 'इस पके फलको लेना चाहिये' इस इच्छासे बाललीलासे ही पाँच सौ योजन ऊँचे उछलकर पृथिवीपर गिरे थे ॥१८-१९॥ अतः, ऐसा कौन है जो आपके बलका माहात्म्य वर्णन कर सके। हे सुव्रत! आप खड़े हो जाइये और यह राम-कार्य करके हम सबकी रक्षा कीजिये" ॥२०॥ |
| श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनूमानतिहर्षितः।<br>चकार नादं सिंहस्य ब्रह्माण्डं स्फोटयन्निव ॥२१॥<br>बभूव पर्वताकारस्त्रिविक्रम इवापरः।<br>लङ्घयित्वा जलनिधिं कृत्वा लङ्कां च भस्मसात् ॥२२॥<br>रावणं सकुलं हत्वाऽऽनेष्ये जनकनन्दिनीम्।<br>यद्वा बध्वा गले रज्ज्वा रावणं वामपाणिना ॥२३॥<br>लङ्कां सपर्वतां धृत्वा रामस्याग्रे क्षिपाम्यहम्।<br>यद्वा दृष्ट्वैव यास्यामि जानकीं शुभलक्षणाम् ॥२४॥ | जाम्बवान्के ये वचन सुनकर हनूमान्जी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त ब्रह्माण्डको मानो कम्पायमान करते हुए घोर सिंहनाद किया॥२१॥ दूसरे त्रिविक्रम भगवान्के समान वे पर्वताकार हो गये, (और कहने लगे) "हे वानरो! मैं समुद्रको लाँघकर लंकाको भस्म कर डालूँगा और रावणको उसके कुलसहित मारकर श्रीजानकीजीको ले आऊँगा; अथवा कहो तो, रावणके गलेमें रस्सी डालकर और लंकाको त्रिकूट-पर्वतसहित बायें हाथपर उठाकर भगवान् रामके आगे ले जाकर डाल दूँ, या केवल शुभलक्षणा जानकीजीको देखकर ही चला आऊँ" ॥२२-२४॥ |
| श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं जाम्बवानिदमब्रवीत्।<br>दृष्ट्वावागच्छ भद्रं ते जीवन्तीं जानकीं शुभाम्॥२५॥<br>पश्चाद्रामेण सहितो दर्शयिष्यसि पौरुषम्।<br>कल्याणं भवताद्भद्र गच्छतस्ते विहायसा ॥२६॥<br>गच्छन्तं रामकार्यार्थं वायुस्त्वामनुगच्छतु। | हनूमान्जीके ये वचन सुनकर जाम्बवान्ने कहा— "हे वीर ! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभलक्षणा जानकीजीको जीती-जागती देखकर ही चले आओ ॥२५॥ फिर रामचन्द्रजीके साथ जाकर अपना पुरुषार्थ दिखलाना। हे भद्र! आकाशमार्गसे जाते हुए तुम्हारा कल्याण हो ॥२६॥ रामकार्यके लिये जाते समय वायु तुम्हारा अनुगमन करें।" |
| इत्याशीर्भिः समामन्त्र्य विसृष्टः प्लवगाधिपैः॥२७॥<br>महेन्द्राद्रिशिरो गत्वा बभूवाद्भुतदर्शनः ॥२८॥ | इस प्रकार आशीर्वादोंसे अभिनन्दन करते हुए वानर-यूथपोंके विदा करनेपर हनुमान्जी महेन्द्रपर्वतके शिखरपर चढ़ गये। वहाँ उन्होंने अद्भुत रूप धारण |