भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२०४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

लङ्कां प्रवेष्टुं शक्तो वा न वा जानीमहे बलम् ।<br>एवं विचार्य नागानां मातरं सुरसाभिधाम् ॥१०॥<br>अब्रवीद्देवतावृन्दः कौतूहलसमन्वितः ।<br>गच्छ त्वं वानरेन्द्रस्य किञ्चिद्विघ्नं समाचर ॥११॥<br>ज्ञात्वा तस्य बलं बुद्धिं पुनरेहि त्वरान्विता ।<br>इत्युक्ता सा ययौ शीघ्रं हनुमद्विघ्नकारणात् ॥१२॥<br>आवृत्य मार्ग पुरतः स्थित्वा वानरमब्रवीत् ।<br>एहि मे वदनं शीघ्रं प्रविशस्व महामते ॥१३॥<br>देवैस्त्वं कल्पितो भक्ष्यः क्षुधासम्पीडितात्मनः ।<br>तामाह हनुमान्मातरहं रामस्य शासनात् ॥१४॥<br>गच्छामि जानकीं द्रष्टुं पुनरागम्य सत्वरः ।<br>रामाय कुशलं तस्याः कथयित्वा त्वदाननम् ॥१५॥<br>प्रवेक्ष्ये देहि मे मार्गं सुरसायै नमोऽस्तु ते ।<br>इत्युक्ता पुनरेवाह सुरसा क्षुधितास्म्यहम् ॥१६॥<br>प्रविश्य गच्छ मे वक्त्रं नो चेत्त्वां भक्षयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो हनुमानाह मुखं शीघ्रं विदारय ॥१७॥<br>प्रविश्य वदनं तेऽद्य गच्छामि त्वरान्वितः ।<br>इत्युक्त्वा योजनायामदेहो भूत्वा पुरः स्थितः ॥१८॥ | नहीं यह लंकामें घुस सकेगा या नहीं । अतः इसके बलका पता लगाना चाहिये।” परस्पर ऐसा विचारकर उन्होंने कुतूहलवश नागमाता सुरसासे कहा— “सुरसे ! तुम अभी जाकर इस वानरश्रेष्ठके मार्गमें कुछ विघ्न खड़ा करो और इसकी बल-बुद्धिका पता लगाकर तुरन्त लौट आओ ।” देवताओंके इस प्रकार कहनेपर वह तुरन्त ही हनुमान्‌जीको विघ्न उपस्थित करनेके लिये गयी ॥१०–१२॥ वह उनके मार्गको सामनेसे रोककर खड़ी हो गयी और बोली—“हे महामते ! आओ, शीघ्र ही मेरे मुखमें प्रवेश करो; मैं भूखसे अत्यन्त व्याकुल थी, अतः देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बनाया है ।” तब हनुमान्‌जीने उससे कहा—“हे मातः ! मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे जानकीजीको देखनेके लिये जा रहा हूँ । वहाँसे शीघ्र ही लौटकर श्रीरघुनाथजीको उनका कुशल-समाचार सुनाकर फिर मैं तेरे मुखमें प्रवेश करूँगा । हे सुरसे ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, तू मेरा मार्ग छोड़ दे ।” इसपर सुरसाने फिर कहा—“मुझे बड़ी भूख लगी है । अतः एक बार मेरे मुखमें प्रवेश करके फिर चले जाना, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगी ।” तब हनुमान्‌जीने कहा— “अच्छा तो शीघ्र ही अपना मुख खोल । मैं अभी तेरे मुखमें घुसकर तुरन्त ही लंकाको चला जाऊँगा ।” ऐसा कह हनुमान्‌जी अपना शरीर एक योजन लम्बा-चौड़ा बनाकर सामने खड़े हो गये ॥ १३–१८ ॥ दृष्ट्वा हनुमतो रूपं सुरसा पञ्चयोजनम् ।<br>मुखं चकार हनुमान् द्विगुणं रूपमादधत् ॥१९॥<br>ततश्चकार सुरसा योजनानां च विंशतिम् ।<br>वक्त्रं चकार हनुमान्त्रिंशद्योजनसम्मितम् ॥२०॥<br>ततश्चकार सुरसा पञ्चाशद्योजनायतम् ।<br>वक्त्रं तदा हनूमांस्तु बभूवाङ्गुष्ठसन्निभः ॥२१॥<br>प्रविश्य वदनं तस्याः पुनरेत्य पुरः स्थितः ।<br>प्रविष्टो निर्गतोऽहं ते वदनं देवि ते नमः ॥२२॥<br>एवं वदन्तं दृष्ट्वा सा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।<br>गच्छ साधय रामस्य कार्यं बुद्धिमतां वर ॥२३॥ | हनुमान्‌जीका वह रूप देखकर सुरसाने अपना मुख पाँच योजन फैलाया; तब हनुमान्‌जीने अपना शरीर उससे दूना कर लिया ॥ १९ ॥ फिर सुरसाने अपना मुख बीस योजन किया तो हनुमान्‌जीने अपना देह तीस योजनका कर लिया ॥ २० ॥ इसपर जब सुरसाने अपना मुख पचास योजन फैलाया तो हनुमान्‌जी अँगूठेके समान छोटे-से आकारके हो गये और चट उसके मुखमें जाकर बाहर निकल आये तथा उसके सामने खड़े होकर बोले—‘हे देवि ! मैं तुम्हारे मुखमें जाकर फिर निकल आया हूँ, अब तुम्हें नमस्कार है” ॥ २१-२२ ॥ हनुमान्‌जीको इस प्रकार कहते देख सुरसा बोली—“हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ! जाओ, श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करो । हे वानर ! देवता-लोग तुम्हारा बल जानना चाहते थे अतः उन्होंने मुझे