अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग १ ] | सुन्दरकाण्ड | २०५
देवैः सम्प्रेषिताऽहं ते बलं जिज्ञासुभिः कपे ।
दृष्ट्वा सीतां पुनर्गत्वा रामं द्रक्ष्यसि गच्छ भोः ॥२४॥
इत्युक्त्वा सा ययौ देवलोकं वायुसुतः पुनः ।
जगाम वायुमार्गेण गरुत्मानिव पक्षिराट् ॥२५॥
समुद्रोऽप्याह मैनाकं मणिकाञ्चनपर्वतम् ।
गच्छत्येष महासत्त्वो हनूमान्मारुतात्मजः ॥२६॥
रामस्य कार्यसिद्ध्यर्थं तस्य त्वं सचिवो भव ।
सगरैर्वर्धितो यस्मात्पुराऽहं सागरोऽभवम् ॥२७॥
तस्यान्वये बभूवासौ रामो दाशरथिः प्रभुः ।
तस्य कार्यार्थसिद्ध्यर्थं गच्छत्येष महाकपिः ॥२८॥
त्वमुत्तिष्ठ जलात्तूर्णं त्वयि विश्रम्य गच्छतु ।
स तथेति प्रादुरभूज्जलमध्यान्महोन्नतः ॥२९॥
नानामणिमयैः शृङ्गैस्तस्योपरि नराकृतिः ।
प्राह यान्तं हनूमन्तं मैनाकोऽहं महाकपे ॥३०॥
समुद्रेण समादिष्टस्त्वद्विश्रामाय मारुते ।
आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि मे ॥३१॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् ।
एवमुक्तोऽथ तं प्राह हनूमान्मारुतात्मजः ॥३२॥
गच्छतो रामकार्यार्थं भक्षणं मे कथं भवेत् ।
विश्रामो वा कथं मे स्याद्गन्तव्यं त्वरितं मया ॥३३॥
इत्युक्त्वा स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः ।
किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥३४॥
सिंहिका नाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता सदा ।
आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षयेत् ॥३५॥
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् ।
केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ॥३६॥
तुम्हारे पास भेजा था । मुझे निश्चय है कि तुम सीताजीको देखकर फिर शीघ्र ही रघुनाथजीसे मिलोगे । अब तुम जाओ” ॥ २३-२४ ॥
ऐसा कहकर सुरसा देवलोकको चली गयी और श्रीहनुमान्जी फिर आकाश-मार्गसे पक्षिराज गरुड़के समान चलने लगे ॥ २५ ॥ इसी समय समुद्रने भी सुवर्ण और मणियोंसे युक्त मैनाक पर्वतसे कहा— “देखो, ये महाशक्तिशाली पवनपुत्र हनुमान्जी राम-कार्यके लिये जा रहे हैं; तुम उनकी सहायता करो । पूर्वकालमें मुझे सगर-पुत्रोंने बढ़ाया था, इसीसे मैं सागर कहलाता हूँ ॥ २६-२७ ॥ ये दशरथनन्दन भगवान् राम उन्हींके वंशमें प्रकट हुए हैं और ये कपिराज उन्हींका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ २८ ॥ तुम तुरन्त ही जलसे ऊपर उठ जाओ, जिससे ये तुम्हारे ऊपर कुछ देर विश्राम लेकर आगे जायँ ।” तब मैनाक पर्वत ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त अपने अनेक मणिमय शिखरोंसे पानीसे ऊपर बहुत ऊँचा निकल आया । और उन शृङ्गोंके ऊपर मनुष्याकारसे स्थित होकर उसने जाते हुए हनुमान्जीसे कहा— “हे महाकपे ! मैं मैनाक हूँ । हे मारुते ! समुद्रने मुझे तुम्हें विश्राम देनेके लिये आज्ञा दी है । आओ, मेरे ये अमृत-तुल्य फल खाओ ॥ २९-३१ ॥ कुछ देर यहाँ विश्राम करके फिर आनन्दपूर्वक चले जाना ।” मैनाकके इस प्रकार कहनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी बोले—॥ ३२ ॥ “राम-कार्यके लिये जाते हुए मैं भोजनादि कैसे कर सकता हूँ ? और मुझे जल्दी ही जाना है, अतः विश्रामका अवकाश भी कहाँ है ?”॥ ३३॥
ऐसा कह कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी (मैनाकका मान रखनेके लिये) उसके शिखरको केवल अँगुल़ीसे छूकर आगे चल दिये । वे कुछ ही आगे बढ़े थे कि उनकी छायाको एक छायाग्रहने पकड़ लिया ॥ ३४ ॥ वह सिंहिका नामकी एक घोर राक्षसी थी जो सदा जलमें रहकर आकाशमें जाते हुए जीवोंकी छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी और खा जाया करती थी ॥ ३५ ॥ उससे पकड़े जानेपर महापराक्रमी श्रीहनुमान्जी सोचने लगे—‘यह ऐसा कौन विघ्न-कारक है जिसने मेरा वेग रोक लिया ? दिखायी