अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंtext २०६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
दृश्यते नैव कोऽप्यत्र विस्मयो मे प्रजायते । तो यहाँ कोई देता नहीं, इससे मुझे बड़ा आश्चर्य एवं विचिन्त्य हनूमानधो दृष्टिं प्रसारयत् ॥३७॥ हो रहा है।' ऐसे सोचते-सोचते उन्होंने अपनी दृष्टि नीचेकी ओर की तो उन्हें वहाँ बड़े विकराल रूप और तत्र दृष्ट्वा महाकायां सिंहिकां घोररूपिणीम् । स्थूल शरीरवाली सिंहिका राक्षसी दिखलायी दी । उसे पपात सलिले तूर्णं पद्भ्यामेवाहनद्रुषा ॥३८॥ देखते ही वे तुरन्त जलमें कूद पड़े और बड़े क्रोधसे उसे लातोंसे ही मार डाला ॥३६-३८॥ इसके पश्चात् पुनरुत्प्लुत्य हनुमान्दक्षिणाभिमुखो ययौ । हनुमान्जी फिर उछलकर दक्षिणकी ओर चलने लगे, ततो दक्षिणमासाद्य कूलं नानाफलद्रुमम् ॥३९॥ और समुद्रके दक्षिण-तटपर पहुँच गये, जहाँ नाना प्रकारके फलवाले वृक्ष लगे हुए थे ॥३९॥ और तरह- नानापक्षिमृगाकीर्णं नानापुष्पलतावृतम् । तरहके पक्षियों और मृगोंसे पूर्ण तथा विविध भाँतिकी ततो ददर्श नगरं त्रिकूटाचलमूर्धनि ॥४०॥ पुष्पलताओंस आवृत था । वहाँ पहुँचकर उन्होंने त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बसी हुई लंकापुरी देखी प्राकारैर्बहुभिर्युक्तं परिखाभिश्च सर्वतः । जो सब ओरसे अनेकों परकोटों और खाइयोंसे प्रवेक्ष्यामि कथं लङ्कामिति चिन्तापरोऽभवत्॥४१॥ घिरी हुई थी। उसे देखकर वे सोचने लगे कि मुझे किस प्रकार इस नगरमें जाना चाहिये ॥४०-४१॥ फिर निश्चय रात्रौ वेक्ष्यामि सूक्ष्मोऽहं लङ्कां रावणपालिताम् । किया कि मैं रात्रिके समय सूक्ष्म शरीर धारणकर इस एवं विचिन्त्य तत्रैव स्थित्वा लङ्कां जगाम सः॥४२॥ रावणप्रतिपालित लंकापुरीमें प्रवेश करूँगा । यह विचारकर वे वहीं ठहर गये और फिर (रात्रि होनेपर) लंकाकी ओर चले ॥ ४२ ॥
धृत्वा सूक्ष्मं वपुर्द्वारं प्रविवेश प्रतापवान् । जिस समय महाप्रतापी श्रीहनुमान्जीने सूक्ष्म शरीर तत्र लङ्कापुरी साक्षाद्राक्षसीवेषधारिणी ॥४३॥ धारण कर नगरके द्वारमें प्रवेश किया उस समय वहाँ साक्षात् लंकापुरी राक्षसीका रूप धारण किये खड़ी थी प्रविशन्तं हनूमन्तं दृष्ट्वा लङ्का न्यतर्जयत् । ॥ ४३ ॥ उसने हनुमान्जीको नगरमें जाते देख डाँटा कस्त्वं वानररूपेण मामनादृत्य लङ्किनीम् ॥४४॥ और पूछा—"तू कौन है जो इस रात्रिके समय मुझ लंकिनीका अनादर कर चोरके समान वानररूपसे प्रविश्य चोरवद्रात्रौ किं भवान्कर्तुमिच्छति । नगरमें जा रहा है ? और (यहाँ) तू क्या करना इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षी पादेनाभिजघान तम्॥४५॥ चाहता है ?" ऐसा कह उसने क्रोधसे आँखें लाल कर उनके लात मारी ॥ ४४-४५ ॥ तब हनुमान्जीने हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽवज्ञयाऽहनत् । उसकी अवज्ञा करते हुए उसे बायें हाथका घूँसा मारा, तदैव पतिता भूमौ रक्तमुद्वमती भृशम् ॥४६॥ जिससे वह बहुत-सा रुधिर वमन करती हुई पृथिवी- पर गिर पड़ी ॥ ४६ ॥ फिर कुछ देर पीछे लंकिनीने उत्थाय प्राह सा लङ्का हनूमन्तं महाबलम् । उठकर महाबली हनुमान्जीसे कहा—"हे हनुमन् ! हनूमन् गच्छ भद्रं ते जिता लङ्का त्वयाऽनघ ॥४७॥ जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; हे अनघ ! तुम लंकापुरी- को जीत चुके ॥ ४७ ॥ पूर्वकालमें मुझसे श्रीब्रह्माजीने पुराऽहं ब्रह्मणा प्रोक्ता ह्यष्टाविंशतिपर्यये । कहा था कि 'अट्ठाईसवें चतुर्युगके त्रेतायुगमें त्रेतायुगे दाशरथी रामो नारायणोऽव्ययः ॥४८॥ अविनाशी नारायणदेव दशरथकुमार रामरूपसे अवतीर्ण होंगे और उनकी योगमाया महाराज जनकके घरमें जनिष्यते योगमाया सीता जनकवेश्मनि । सीताजी होकर प्रकट होंगी, क्योंकि मैंने पहले कभी भूभारहरणार्थाय प्रार्थितोऽयं मया क्वचित् ॥४९॥ उनसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी