अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २२० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| बद्ध्वाऽऽनेष्ये द्रुतं तात वानरं ब्रह्मपाशतः ।<br>इत्युक्त्वा रथमारुह्य राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥९२॥<br>जगाम वायुपुत्रस्य समीपं वीरविक्रमः ।<br>ततोऽतिगर्जितं श्रुत्वा स्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९३॥<br>उत्पपात नभोदेशं गरुत्मानिव मारुतिः ।<br>ततो भ्रमन्तं नभसि हनूमन्तं शिलीमुखैः ॥९४॥<br>विद्ध्वा तस्य शिरोभागमिषुभिश्चाष्टभिः पुनः ।<br>हृदयं पादयुगलं पद्भिरेकेन वालधिम् ॥९५॥<br>भेदयित्वा ततो घोरं सिंहनादमथाकरोत् ।<br>ततोऽतिहर्षाद्धनुमांस्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९६॥<br>जघान सारथिं सार्धं रथं चाचूर्णयत्क्षणात् ।<br>ततोऽन्यं रथमादाय मेघनादो महाबलः ॥९७॥<br>शीघ्रं ब्रह्मास्त्रमादाय बद्ध्वा वानरपुङ्गवम् ।<br>निनाय निकटं राज्ञो रावणस्य महाबलः ॥९८॥ | वानरको शीघ्र ही ब्रह्मपाशमें बाँधकर लिये आता हूँ।”<br>ऐसा कह वह महापराक्रमी वीर रथपर चढ़ा और<br>बहुत-से राक्षसोंके साथ पवनपुत्र हनुमान्के पास पहुँचा।<br>तब, वीर्यवान् हनुमान्जी भयङ्कर सिंहनाद सुन हाथमें<br>स्तम्भ लिये गरुड़के समान आकाशमें उड़ गये।<br>उन्हें आकाशमें उड़ते देख इन्द्रजित्ने आठ<br>बाणोंसे उनके शिरको बींधा, फिर छः बाणोंसे<br>उनके हृदय और दोनों चरणोंको तथा एकसे उनकी<br>पूँछको बींधकर वह घोर सिंहनाद करने लगा। तब महा-<br>बलवान् हनुमान्जीने भी अति प्रसन्नतासे स्तम्भ उठाकर<br>एक क्षणमें ही उसके सारथीको मार डाला और घोड़ोंके<br>सहित उसके रथको चूर्ण कर दिया। तब महाबली<br>मेघनाद (इन्द्रजित्) ने दूसरे रथपर चढ़कर तुरन्त<br>ही वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको ब्रह्मपाशसे बाँध लिया और<br>उन्हें राक्षसराज रावणके पास ले गया ॥९२-९८॥ |
| यस्य नाम सततं जपन्ति ये-<br> ऽज्ञानकर्मकृतबन्धनं क्षणात् ।<br>सद्य एव परिमुच्य तत्पदं<br> यान्ति कोटिरविभासुरं शिवम् ॥९९॥<br>तस्यैव रामस्य पदाम्बुजं सदा<br> हृत्पद्ममध्ये सुनिधाय मारुतिः ।<br>सदैव निर्मुक्तसमस्तबन्धनः<br> किं तस्य पाशैरितरैश्च बन्धनैः ॥१००॥ | जिनके नामका निरन्तर जप करनेवाले भक्तजन<br>एक क्षणमें ही अज्ञानकृत बन्धनको काटकर करोड़ों<br>सूर्योंके समान प्रकाशमान उनके परम कल्याणमय<br>पदको तत्काल प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं भगवान् रामके<br>चरणकमलोंको सदा अपने हृदयकमलमें धारण करनेसे<br>हनुमान्जी सदा ही समस्त बन्धनोंसे छूटे हुए हैं।<br>उनका ब्रह्मपाश अथवा और किसी बन्धनसे क्या<br>हो सकता है ? ॥९९-१००॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थ सर्ग
हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन ।
</div>| श्रीमहादेव उवाच<br>यान्तं कपीन्द्रं धृतपाशबन्धनं<br> विलोकयन्तं नगरं बिभीतवत् ।<br>अताडयन्मुष्टितलैः सुकोपन्नाः<br> पौराः समन्तादनुयान्त ईक्षितुम् ॥ १ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! ब्रह्मपाशसे बँधे<br>हुए श्रीहनुमान्जी जब डरे हुएके समान नगर देखते जा<br>रहे थे, उस समय उन्हें देखनेके लिये इधर-उधरसे<br>इकट्ठे हुए पुरवासी उनके पीछे-पीछे चलते हुए<br>उन्हें क्रोधपूर्वक घूँसोंसे मारने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्माजीके |