भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ]सुन्दरकाण्ड२२१

ब्रह्मास्त्रमेनं क्षणमात्रसङ्गमं<br>कृत्वा गतं ब्रह्मवरेण सत्वरम् ।<br>ज्ञात्वा हनूमानपि फल्गुरज्जुभि-<br>र्धृतो ययौ कार्यविशेषगौरवात् ॥ २ ॥<br>सभान्तरस्थस्य च रावणस्य तं<br>पुरो निधायाह बलारिजित्तदा ।<br>बद्धो मया ब्रह्मवरेण वानरः<br>समागतोऽनेन हता महासुराः ॥ ३ ॥<br>यद्युक्तमत्रार्य विचार्य मन्त्रिभि-<br>र्विधीयतामेष न लौकिको हरिः ।<br>ततो विलोक्याह स राक्षसेश्वरः<br>प्रहस्तमग्रे स्थितमञ्जनाद्रिभम् ॥ ४ ॥<br>प्रहस्त पृच्छैनमसौ किमागतः<br>किमत्र कार्यं कुत एव वानरः ।<br>वनं किमर्थं सकलं विनाशितं<br>हताः किमर्थं मम राक्षसा बलात् ॥ ५ ॥<br>ततः प्रहस्तो हनुमन्तमादरा-<br>त्पप्रच्छ केन प्रहितोऽसि वानर ।<br>भयं च ते माऽस्तु विमोक्ष्यसे मया<br>सत्यं वदस्वाखिलराजसन्निधौ ॥ ६ ॥ | वरके प्रभावसे ब्रह्मास्त्र हनुमान्जीके शरीरका क्षण-भरके लिये स्पर्श कर तुरन्त चला गया । यह बात जानकर भी श्रीहनुमान्जी विशेष कार्य सम्पादन करनेके लिये तुच्छ रस्सियोंसे ही बँधे हुए रावणके पास चले गये ॥ २ ॥ तब इन्द्रजित् उन्हें सभामें स्थित रावणके सामने ले गया और बोला—"मैं इस वानरको ब्रह्माके वरके प्रभावसे बाँध लाया हूँ; इसीने हमारे बड़े-बड़े वीर राक्षस मारे हैं ॥ ३ ॥ महाराज ! मन्त्रियोंके साथ विचारकर इसके लिये जैसा उचित समझें वैसा विधान करें। यह कोई साधारण वानर नहीं है।" तब राक्षसराज रावणने सामने बैठे हुए कज्जलगिरिके समान कृष्णवर्ण प्रहस्तसे कहा—॥ ४ ॥ "प्रहस्त ! इस बन्दरसे पूछो तो सही, यह यहाँ क्यों आया है ? इसका क्या कार्य है ? यह कहाँसे आया है ? इसने मेरा सारा वन क्यों उजाड़ डाला ? और मेरे राक्षस वीरोंको बलात्कारसे क्यों मारा ?" ॥ ५॥ तब प्रहस्तने हनुमान्जीसे आदरपूर्वक पूछा—"वानर ! तुम्हें किसने भेजा है ? तुम डरो मत; राजराजेश्वरके सामने सब बात सच-सच बतला दो; फिर मैं तुम्हें छुड़ा दूँगा ॥ ६ ॥ ततोऽतिहर्षात्पवनात्मजो रिपुं<br>निरीक्ष्य लोकत्रयकण्टकासुरम् ।<br>वक्तुं प्रचक्रे रघुनाथसत्कथां<br>क्रमेण रामं मनसा स्मरन्मुहुः ॥ ७ ॥<br>शृणु स्फुटं देवगणाद्यमित्र हे<br>रामस्य दूतोऽहमशेषहृत्स्थितेः ।<br>यस्याखिलेशस्य हृताऽधुना त्वया<br>भार्या स्वनाशाय शुनेव सद्गविः ॥ ८ ॥<br>स राघवोऽभ्येत्य मतङ्गपर्वतं<br>सुग्रीवमैत्रीमनलस्य सन्निधौ ।<br>कृत्वैकवाणेन निहत्य वालिनं<br>सुग्रीवमेवाधिपतिं चकार तम् ॥ ९ ॥<br>स वानराणामधिपो महाबली<br>महाबलैर्वानरयूथकोटिभिः ।<br>रामेण सार्धं सह लक्ष्मणेन भो<br>प्रवर्षणेऽमर्षयुतोऽवतिष्ठते ॥१०॥ | तब अपने शत्रु त्रिलोकीके कण्टकरूप राक्षसराज रावणको देखकर पवननन्दन हनुमान्जीने हृदयमें बार-म्बार श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण कर अति हर्षित हो क्रमसे रघुनाथजीकी सुन्दर कथा कहनी आरम्भ की ॥७॥ वे कहने लगे—"हे देवादिंके शत्रु रावण ! तुम साफ-साफ सुनो; कुत्ता जिसप्रकार हविको चुरा ले जाता है उसी प्रकार तुमने अपना नाश करानेके लिये जिन अखिलेश्वरकी साध्वी भार्याको हर लिया है मैं उन्हीं सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका दूत हूँ ॥ ८ ॥ उन श्रीरघुनाथजीने मतङ्गपर्वतपर आकर अग्निके साक्ष्यमें सुग्रीवसे मित्रता की और एक ही बाणसे वालीको मारकर सुग्रीवको वानरोंका राजा बना दिया ॥ ९॥ हे रावण ! इस समय वे महाबली वानरराज और भी करोड़ों महाशूरवीर वानरयूथोंके साथ राम और लक्ष्मणके सहित अति क्रोधयुक्त हो प्रवर्षण पर्वतपर विराजमान हैं ॥ १० ॥ उन्होंने श्रीजानकीजीको ढूँढनेके लिये दशों