भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२२२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४
सञ्चोदितास्तेन महाहरीश्वरा<br>धरासुतां मार्गयितुं दिशो दश ।<br>तत्राहमेकः पवनात्मजः कपिः<br>सीतां विचिन्वञ्छनकैः समागतः ॥११॥<br>दृष्टा मया पद्मपलाशलोचना<br>सीता कपित्वाद्विपिनं विनाशितम् ।<br>दृष्ट्वा ततोऽहं रभसा समागता-<br>न्मां हन्तुकामान् धृतचापसायकान् ॥१२॥<br>मया हतास्ते परिरक्षितं वपुः<br>प्रियो हि देहोऽखिलदेहिनां प्रभो ।<br>ब्रह्मास्त्रपाशेन निबध्य मां ततः<br>समागमन्मेघनिनादनामकः ॥१३॥<br>स्पृष्ट्वैव मां ब्रह्मवरप्रभावत-<br>स्त्यक्त्वा गतं सर्वमवैमि रावण ।<br>तथाप्यहं बद्ध इवागतो हितं<br>प्रवक्तुकामः करुणार्द्रधीः ॥१४॥<br>विचार्य लोकस्य विवेकतॊ गतिं<br>न राक्षसीं बुद्धिमुपैहि रावण ।<br>दैवीं गतिं संसृतिमोक्षहेतुकीं<br>समाश्रयात्यन्तहिताय देहिनः ॥१५॥<br>त्वं ब्रह्मणो ह्युत्तमवंशसम्भवः<br>पौलस्त्यपुत्रोऽसि कुबेरबान्धवः ।<br>देहात्मबुद्ध्यापि च पश्य राक्षसो<br>नास्यात्मबुद्ध्या किमु राक्षसो नहि ॥१६॥<br>शरीरबुद्धीन्द्रियदुःखसन्तति-<br>र्न ते न च त्वं तव निर्विकारतः ।<br>अज्ञानहेतोश्च तथैव सन्तते-<br>रसत्त्वमस्याः स्वपतो हि दृश्यवत् ॥१७॥<br>इदं तु सत्यं तव नास्ति विक्रिया<br>विकारहेतुर्न च तेऽद्वयत्वतः ।<br>यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते<br>तथा भवान्देहगतोऽपि सूक्ष्मकः ।<br>देहेन्द्रियप्राणशरीरसङ्गत-<br>स्त्वात्मेति बुद्ध्वाऽखिलबन्धभागभवेत् ॥१८॥दिशाओंमें बड़े-बड़े वानरेश्वर भेजे हैं। उन्हींमेंसे एक वानर मैं वायुका पुत्र हूँ, मैं सीताजीको धीरे-धीरे ढूँढता हुआ यहाँ आया हूँ ॥ ११ ॥ मैं कमलदललोचना जानकीजीका दर्शन कर चुका हूँ, फिर अपने वानर-स्वभावसे मैंने वन उजाड़ दिया, और जब मैंने राक्षसोंको बड़े वेगसे धनुष-बाण आदि लेकर अपनेको मारनेके लिये आते देखा, तो उन्हें मारकर अपनी शरीर-रक्षा की, क्योंकि हे राजन् ! अपना शरीर तो सभी देहधारियोंको प्यारा होता है। फिर वह मेघनाद नामक राक्षस मुझे ब्रह्मपाशमें बाँधकर यहाँ ले आया ॥ १२-१३ ॥ हे रावण ! मैं यद्यपि यह जानता था कि ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे वह ब्रह्मपाश मुझे छूते ही चला गया, तथापि करुणावश तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये मैं बँधे हुएके समान यहाँ चला आया ॥ १४ ॥ हे रावण ! तुम विवेकपूर्वक संसारकी गतिका विचार करो; राक्षसी बुद्धिको अङ्गीकार मत करो और संसार-बन्धनसे छुटानेवाली प्राणियोंकी अत्यन्त हितकारिणी दैवी गतिका आश्रय लो ॥ १५ ॥ तुम ब्रह्माजीके अति उत्तम वंशमें उत्पन्न हुए हो तथा पुलस्त्यनन्दन विश्रवाके पुत्र और कुबेरके भाई हो; अतः देखो, तुम तो देहात्मबुद्धिसे भी राक्षस नहीं हो; फिर आत्मबुद्धिसे राक्षस नहीं हो—इसमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १६ ॥ (तुम वास्तवमें कौन हो सो मैं बतलाता हूँ—) तुम सर्वथा निर्विकार हो; इसलिये शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों और दुःखादि—ये न तुम्हारे (गुण) हैं और न तुम स्वयं हो। इन सबका कारण अज्ञान है और स्वप्नदृश्यके समान ये सब असत् हैं ॥ १७ ॥ यह बिलकुल सत्य है कि तुम्हारे आत्म-स्वरूपमें कोई विकार नहीं है क्योंकि अद्वितीय होनेसे उसमें कोई विकारका कारण ही नहीं है। जिस प्रकार आकाश सर्वत्र होनेसे भी (किसी पदार्थके गुण-दोषसे) लिप्त नहीं होता उसी प्रकार तुम देहमें रहते हुए भी सूक्ष्मरूप होनेसे उसके सुख-दुःखादि विकारोंसे लिप्त नहीं होते । 'आत्मा देह, इन्द्रिय, प्राण और शरीरसे मिला हुआ है' ऐसी बुद्धि ही सारे बन्धनोंका कारण होती है ॥ १८ ॥ और 'मैं चिन्मात्र अजन्मा अविनाशी