अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग ४ ] | सुन्दरकाण्ड | २२३ |
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चिन्मात्रमेवाहमजोऽहमक्षरो<br>ह्यानन्दभावोऽहमिति प्रमुच्यते ।<br>देहोऽप्यनात्मा पृथिवीविकारजो<br>न प्राण आत्माऽनिल एष एव सः ॥१९॥<br>मनोऽप्यहङ्कारविकार एव नो<br>न चापि बुद्धिः प्रकृतेर्विकारजा ।<br>आत्मा चिदानन्दमयोऽविकारवा-<br>न्देहादिसङ्घाद्व्यतिरिक्त ईश्वरः ॥२०॥<br>निरञ्जनो मुक्त उपाधितः सदा<br>ज्ञात्वैवमात्मानमितो विमुच्यते ।<br>अतोऽहमात्यन्तिकमोक्षसाधनं<br>वक्ष्ये शृणुष्वावहितो महामते ॥२१॥<br>विष्णोर्हि भक्तिः सुविशोधनं धिय-<br>स्ततो भवेज्ज्ञानमतीव निर्मलम् ।<br>विशुद्धतत्त्वानुभवो भवेत्ततः<br>सम्यग्विदित्वा परमं पदं व्रजेत् ॥२२॥<br>अतो भजस्वाद्य हरिं रमापतिं<br>रामं पुराणं प्रकृतेः परं विभुम् ।<br>विसृज्य मौर्ख्यं हृदि शत्रुभावनां<br>भजस्व रामं शरणागतप्रियम् ।<br>सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रबान्धवो<br>रामं नमस्कृत्य विमुच्यसे भयात् ॥२३॥<br>रामं परात्मानमभावयन् जनो<br>भक्त्या हृदिस्थं सुखरूपमद्वयम् ।<br>कथं परं तीरमवाप्नुयाज्जनो<br>भवाम्बुधेर्दुःखतरङ्गमालिनः ॥२४॥<br>नो चेत्त्वमज्ञानमयेन वह्निना<br>ज्वलन्तमात्मानमरक्षिताऽरिवत् ।<br>नयस्यधोऽधः स्वकृतैश्च पातकै-<br>र्विमोक्षशङ्का न च ते भविष्यति ॥२५॥<br>श्रुत्वाऽमृतास्वादसमानभाषितं<br>तद्वायुसूनोर्दशकन्धरोऽसुरः ।<br>अमृष्यमाणोऽतिरुषा कपीश्वरं<br>जगाद रक्तान्तविलोचनो ज्वलन् ॥२६॥ | तथा आनन्दस्वरूप ही हूँ' इस बुद्धिसे जीव मुक्त हो जाता है। पृथिवीका विकार होनेसे देह भी अनात्मा है और प्राण वायुरूप ही है, अतः यह भी आत्मा नहीं है ॥ १९ ॥ अहंकारका कार्य मन अथवा प्रकृतिके विकारसे उत्पन्न हुई बुद्धि भी आत्मा नहीं है। आत्मा तो चिदानन्दस्वरूप, अविकारी तथा देहादि संघातसे पृथक् और उसका स्वामी है ॥२०॥ वह निर्मल और सर्वदा उपाधिरहित है; उसका इस प्रकार ज्ञान होते ही मनुष्य संसारसे मुक्त हो जाता है। अतः हे महामते ! मैं तुम्हें आत्यन्तिक मोक्षका साधन बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २१ ॥ भगवान् विष्णुकी भक्ति, बुद्धिको अत्यन्त शुद्ध करनेवाली है, उसीसे अत्यन्त निर्मल आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञानसे शुद्ध आत्मतत्त्वका अनुभव होता है और उससे दृढबोध हो जानेसे मनुष्य परमपद प्राप्त करता है ॥ २२ ॥ इसलिये तुम प्रकृतिसे परे, पुराणपुरुष, सर्वव्यापक आदि-नारायण, लक्ष्मीपति, हरि भगवान् रामका भजन करो। अपने हृदयमें स्थित शत्रुभावरूप मूर्खताको छोड़ दो, और शरणागतवत्सल रामका भजन करो। सीताजीको आगेकर अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित भगवान् रामकी शरण जाकर उन्हें नमस्कार करो। इससे तुम भयसे छूट जाओगे ॥ २३ ॥ जो पुरुष अपने हृदयमें स्थित अद्वितीय सुखरूप परमात्मा रामका भक्तिपूर्वक ध्यान नहीं करता वह दुःख-तरङ्गावलिसे पूर्ण इस संसार-समुद्रका पार कैसे पा सकता है ? ॥ २४ ॥ यदि तुम भगवान् रामका भजन न करोगे तो अज्ञानरूपी अग्निसे जलते हुए अपने-आपको शत्रुके समान सुरक्षित नहीं रख सकोगे और उसे अपने किये हुए पापोंसे उत्तरोत्तर नीचेकी ओर ही ले जाओगे; फिर तुम्हारे मोक्षकी कोई सम्भावना न रहेगी" ॥ २५ ॥<br>पवनसुतके इस अमृतसदृश मधुर भाषणको सुनकर राक्षसराज रावण उसे सहन न कर सका और अत्यन्त क्रोधसे नेत्र लाल कर मन-ही-मन जलता हुआ हनुमान्जी-से बोला—॥२६॥ "अरे दुष्टबुद्धे ! तू वानरोंमें अधम है। मेरे सामने इस प्रकार निर्भयके समान कैसे प्रलाप कर