भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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२२४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

मूल श्लोक (संस्कृत):

कथं ममाग्रे विलपस्यभीतवत्
प्लवङ्गमानामधमोऽसि दुष्टधीः ।
क एष रामः कतमो वनेचरो
निहन्मि सुग्रीवयुतं नराधमम् ॥२७॥

त्वां चाद्य हत्वा जनकात्मजां ततो
निहन्मि रामं सहलक्ष्मणं ततः ।
सुग्रीवमग्रे बलिनं कपीश्वरं
सवानरं हन्म्यचिरेण वानर ।
श्रुत्वा दशग्रीववचः स मारुति-
श्चिंवृद्धकोपेन दहन्निवासुरम् ॥२८॥

न मे समा रावणकोटयोऽधम
रामस्य दासोऽहमपारविक्रमः ।
श्रुत्वाऽतिकोपेन हनूमतो वचो
दशाननो राक्षसमेवमब्रवीत् ॥२९॥

पार्श्वे स्थितं मारय खण्डशः कपिं
पश्यन्तु सर्वेऽसुरमित्रबान्धवाः ।
निवारयामास ततो विभीषणो
महासुरं सायुधमुद्यतं वधे ।
राजन्यधार्हो न भवेत्कथञ्चन
प्रतापयुक्तैः परराजवानरः ॥३०॥

हतेऽस्मिन्वानरे दूते वार्तां को वा निवेदयेत् ।
रामाय त्वं यमुद्दिश्य वधाय समुपस्थितः ॥३१॥

अतो वधसमं किञ्चिदन्यच्चिन्तय वानरे ।
सचिह्नो गच्छतु हरिर्यं दृष्ट्वाऽऽस्यास्यति द्रुतम् ॥३२॥

रामः सुग्रीवसहितस्ततो युद्धं भवेत्तव ।
विभीषणवचः श्रुत्वा रावणोऽप्येतदब्रवीत् ॥३३॥

वानराणां हि लाङ्गले महामानो भवेत्किल ।
अतो वस्त्रादिभिः पुच्छं वेष्टयित्वा प्रयत्नतः ॥३४॥

वह्निना योजयित्वैनं भ्रामयित्वा पुरेऽभितः ।
विसर्जयत पश्यन्तु सर्वे वानरयूथपाः ॥३५॥

तथेति शणपट्टैश्च वस्त्रैरन्यैरनेकंशः ।
तैलाक्तैर्वेष्टयामासुर्लाङ्गूलं मारुतेर्दृढम् ॥३६॥

पुच्छाग्रे किञ्चिदनलं दीपयित्वाऽथ राक्षसाः ।
रज्जुभिः सुदृढं बद्ध्वा धृत्वा तं बलिनोऽसुराः ॥३७॥
समन्ताद् भ्रामयामासुश्चोरोऽयमिति वादिनः ।


हिन्दी अनुवाद:

रहा है ? यह राम और वनचर सुग्रीव हैं क्या चीज़ ! उस नराधमको तो सुग्रीवके सहित मैं ही मार डालूँगा ॥ २७ ॥ ऐ वानर ! पहले तो आज तुझे ही मारूँगा, फिर जानकीका वध करूँगा, तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामको मारूँगा और उनसे पहले उस बड़े बली वानरराज सुग्रीवको उसकी वानरसेनाके सहित कुछ ही देरमें मार डालूँगा ।” रावणके ये वचन सुनकर हनुमान्जी अपने बढ़े हुए क्रोधसे उसे जलाते हुए-से बोले—॥२८॥ “अरे अधम ! मेरी समानता तो करोड़ रावण भी नहीं कर सकते; जानता नहीं, मैं भगवान् रामका दास हूँ, मेरे पराक्रमका कोई ठिकाना नहीं है ।” हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रावणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक अपनी बगलमें खड़े हुए एक राक्षससे कहा— “अरे ! इस वानरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाल, जिससे सब राक्षस, मित्र तथा बन्धुगण इस कौतुकको देखें ।” तब विभीषणने, हथियार लेकर मारनेके लिये तैयार हुए उस प्रचण्ड राक्षसको रोककर कहा— “राजन् ! प्रतापी पुरुषोंको अन्य राज्यके वानर-दूतको किसी प्रकार भी न मारना चाहिये ॥ २९-३० ॥ यदि यह वानर-दूत मारा गया तो जिनका वध करनेके लिये आप उद्यत हुए हैं उन रामको यह समाचार कौन सुनावेगा ? ॥ ३१ ॥ अतः, इस वानरके लिये वधके समान ही कोई और दण्ड निश्चय कीजिये, जिसका चिह्न लेकर यह वानर जाय और उसे देखकर सुग्रीवके सहित राम तुरन्त ही आयें और फिर उनसे आपका युद्ध हो ।” विभीषणका कथन सुनकर रावण भी यों बोला—॥३२-३३॥ “वानरोंको पूँछपर बड़ी ममता होती है । अतः इसकी पूँछको वस्त्रादिसे खूब लपेट दो और फिर उसमें आग लगाकर इसे नगरमें चारों ओर घुमाकर छोड़ दो, जिससे समस्त वानरयूथपति इसकी वह दुर्दशा देखें” ॥ ३४-३५ ॥

तब राक्षसोंने 'बहुत अच्छा' कह हनुमान्जीकी पूँछ सनके पट्टोंसे और तेलमें भीगे हुए नाना प्रकारके चिथड़ोंसे बड़ी दृढ़तासे लपेटी; और पूँछके सिरेपर थोड़ी-सी आग लगाकर उन्हें दृढ़तापूर्वक रस्सीसे बाँधकर कुछ बलवान् राक्षस उन्हें मारते और बारम्बार तुरही

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