अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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· १० अध्यात्मरामायण [ सर्ग २
| · गत्वा लोकं रुदन्ती व्यसनमुपगतं<br> ब्रह्मणे प्राह सर्वं<br>ब्रह्मा ध्यात्वा मुहूर्तं सकलमपि हृदा-<br> ऽवेदशेषामकत्वात् ॥ ६ ॥ | ब्रह्माजीसे कहा। तब ब्रह्माजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ हो अपने मनमें उसकी दुःख-निवृत्तिका सम्पूर्ण उपाय जान लिया क्योंकि वे सर्वान्तर्यामी हैं॥ ६ ॥ तत्पश्चात् |
| तस्मात्क्षीरसमुद्रतीरमगमद्<br> ब्रह्माथ देवैर्वृतो<br>देव्या चाखिललोकहृत्स्थमजरं<br> सर्वज्ञमीशं हरिम् ।<br>अस्तौषीच्छ्रुतिसिद्धनिर्मलपदैः<br> स्तोत्रैः पुराणोद्भवै-<br>र्भक्त्या गद्गदया गिरातिविमलै-<br> रानन्दवाष्पैर्वृतः ॥ ७ ॥ | वहाँसे समस्त देवताओंके सहित श्रीब्रह्माजी पृथिवीको साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त निर्मल आनन्दाश्रुओंसे परिप्लुत हो अखिल-लोकान्तर्यामी, अजर, सर्वज्ञ, भगवान् हरिकी अति निर्मल भक्तियुक्त गद्गद-वाणीसे श्रुतिसिद्ध विमल पदों और पुराणोक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की ॥ ७ ॥ तब सहस्रों |
| ततः स्फुरत्सहस्रांशुसहस्रसदृशप्रभः ।<br>आविरासीद्धरिः प्राच्यां दिशं व्यपनयंस्तमः ॥८॥ | देदीप्यमान सूर्योंके समान प्रभावान् भगवान् हरि (अपने तेजसे) सब दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए पूर्व-दिशामें प्रकट हुए ॥ ८ ॥ पुण्य- |
| कथंचिद्ददृशूवान्ब्रह्मा दुर्दर्शमकृतात्मनाम् ।<br>इन्द्रनीलप्रतीकाशं सितास्यं पद्मलोचनम् ॥ ९ ॥ | हीन पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुर्दर्शनीय भगवान् हरिको (उनके अमित तेजके कारण) ब्रह्माजीने भी बड़ी कठिनतासे देख पाया। इन्द्रनीलमणिके समान उनका तेजोमय श्याम वर्ण था, मुखपर मधुर मुसकान थी और कमलके समान विशाल और मनोहर नेत्र थे ॥ ९ ॥ |
| किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ।<br>विभ्राजमानं श्रीवत्सकौस्तुभप्रभयान्वितम् ॥१०॥ | वे किरीट, हार, केयूर, कुण्डल और कटक आदि आभूषणोंसे सुशोभित तथा श्रीवत्स और कौस्तुभमणिकी प्रभासे युक्त थे॥ १० ॥ |
| स्तुवद्भिः सनकाद्यैश्च पार्षदैः परिवेष्टितम् । ·<br>शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविरोजितम् ॥११॥ | उन्हें स्तुति करते हुए सनकादि पार्षद चारों ओरसे घेरे हुए थे और उनकी शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ११ ॥ |
| स्वर्णयज्ञोपवीतेन स्वर्णवर्णाम्बरेण च ।<br>श्रिया भूम्या च सहितं गरुडोपरि संस्थितम् ॥१२॥ | वे सुनहरे यज्ञोपवीत और पीताम्बरसे सुशोभित एवं लक्ष्मी और भूमिके सहित गरुडपर विराजमान थे। |
| हर्षगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१३॥ | (उनकी ऐसी दिव्य छविको देखकर) पितामह ब्रह्माजी हर्षसे गद्गदकण्ठ हो स्तुति करने लगे ॥ १२-१३ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नतोऽस्मि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्द्रियात्मभिः ।<br>यच्चिन्त्यते कर्मपाशाद्दृष्टदि नित्यं मुमुक्षुभिः॥१४॥ | **ब्रह्माजी बोले—**हे देव ! कर्म-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षुजन अपने प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे जिनका नित्य चिन्तन करते हैं आपके उन चरणारविन्दों-को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥ |
| मायया गुणमय्या त्वं सृजस्यवसि लुम्पसि ।<br>जगत्वेन न ते लेप आनन्दानुभवात्मनः ॥१५॥ | आप अपनी त्रिगुणमयी मायाका आश्रय करके ही इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और लय करते हैं; किन्तु ज्ञानानन्दस्वरूप आप इससे लिप्त नहीं होते ॥ १५ ॥ |
| तथा शुद्धिर्न दुष्टानां दानाध्ययनकर्मभिः ।<br>शुद्धात्मता ते यशसि सदा भक्तिमतां यथा ॥१६॥ | हे भगवन् ! आपके विमल यशमें सदा प्रेम रखनेवाले भक्तोंका अन्तःकरण जैसा शुद्ध होता है वैसी शुद्धि मलिन अन्तःकरणवाले पुरुष दान और अध्ययन आदि शुभ कर्मोंसे नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १६ ॥ अतः भक्त मुनि- |