भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग २ ] बालकाण्ड


योऽतिभ्रष्टोऽतिपापी परधनपरदा-<br>    रेषु नित्योद्यतो वा<br>स्तेयी ब्रह्मघ्नमातापितृवधनिरतो<br>    योगिवृन्दोपकारी।<br>यः संपूज्याभिरामं पठति च हृदयं<br>    रामचन्द्रस्य भक्त्या<br>योगीन्द्रैरप्यलभ्यं पदमिह लभते<br>  सर्वदेवैः स पूज्यम् ॥ ५६॥ऐसे ही हैं ॥ ५५ ॥ जो कोई अत्यन्त भ्रष्ट, अतिशय पापी, परधन और परस्त्रियोंमें सदा प्रवृत्त रहनेवाला, चोर, ब्रह्म-हत्यारा, माता-पिताका वध करनेमें लगा हुआ और योगिजनोंका अहित करनेवाला मनुष्य भी श्रीरामचन्द्रजीका पूजनकर इस रामहृदयका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह समस्त देवताओंके पूज्य उस परमपदको प्राप्त होता है जो योगिराजोंको भी परम दुर्लभ है ॥५६॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे<br>श्रीरामहृदयं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्‌का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना।

पार्वत्युवाच<br>धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो।<br>विच्छिन्नो मेऽतिसन्देहग्रन्थिर्भवदनुग्रहात् ॥ १ ॥<br>त्वन्मुखाद्गलितं रामतत्त्वामृतरसायनम्।<br>पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहम् ॥ २ ॥<br>श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता संक्षेपतो मया।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम् ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेव उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्।<br>अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम ॥ ४ ॥<br>तदद्य कथयिष्यामि शृणु तापत्रयापहम्।<br>यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुरज्ञानोत्थमहाभयात्।<br>प्राप्नोति परमासृद्धिं दीर्घायुः पुत्रसन्ततिम् ॥ ५ ॥<br>भूमिर्भारेण मग्ना दशवदनमुखा-<br>    शेषरक्षोगणानां<br>धृत्वा गोरूपमादौ दिविजमुनिजनैः<br>    साकमब्जासनस्य।पार्वतीजी बोलीं— हे जगत्प्रभो ! आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर मैं धन्य और कृतकृत्य हो गयी तथा मेरी कठिन सन्देहग्रन्थि टूट गयी ॥ १ ॥ हे देव ! आपके मुखसे चूते हुए भवभयहारी रामतत्त्वरूप अमृतमय रसायनका पान करते-करते मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥ २ ॥ मैंने आपके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी कथा संक्षेपसे सुनी। अब मैं उसे स्पष्ट शब्दोंमें विस्तारपूर्वक सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेवजी बोले— हे देवि ! सुनो, मैं तुम्हें गुह्यसे भी गुह्य महान् अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ जो पहले मुझे श्रीरामचन्द्रजीने ही सुनायी थी ॥ ४ ॥ अब मैं तुम्हें वह तापत्रयहारिणी अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। इसके सुननेसे जीव अज्ञानजन्य महाभयसे छूट जाता है और परम ऐश्वर्य, दीर्घ आयु तथा पुत्र-पौत्रादि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥<br>एक बार रावण आदि राक्षसोंके भारसे व्यथित हो पृथिवी गौका रूप धारणकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीब्रह्माजीके लोकको गयी। वहाँ पहुँचकर उसने रोते हुए, अपनेपर पड़ा हुआ सारा दुःख