अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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बुद्धयवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम्।
आभासस्त्वपरं विम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः॥४६॥
साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि।
साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः॥४७
आभासस्तु मृषा बुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते।
अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पतः ४८
अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा॥४९॥
ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः।
तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः॥५०॥
एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते।
मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।
न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि॥५१॥
इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो
मयैव साक्षात्कथितं तवानघ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया
दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम्॥५२॥
श्रीमहादेव उवाच
एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया।
अतिगुह्यतमं हृद्यं पवित्रं पापशोधनम्॥५३॥
साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसंग्रहम्।
यः पठेत्सततं भक्त्या स मुक्तो नात्र संशयः॥५४॥
ब्रह्महत्यादिपापानि बहुजन्मार्जितान्यपि।
नश्यन्त्येव न सन्देहो रामस्य वचनं यथा॥५५॥
है—एक तो बुद्धयवच्छिन्न चेतन (जो बुद्धिमें व्याप्त है), दूसरा जो सर्वत्र परिपूर्ण है और तीसरा जो बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होता है—जिसको आभासचेतन कहते हैं॥४६॥ इनमेंसे केवल आभास-चेतनके सहित बुद्धिमें ही कर्तृत्व है अर्थात् चिदाभासके सहित बुद्धि ही सब कार्य करती है। किन्तु अज्ञजन भ्रान्तिवश निरवच्छिन्न, निर्विकार, साक्षी आत्मामें कर्तृत्व और जीवत्वका आरोप करते हैं अर्थात् उसे ही कर्त्ता-भोक्ता मान लेते हैं॥४७॥ (हमने जिसे जीव कहा है, उसमें) आभास-चेतन तो मिथ्या है (क्योंकि सभी आभास मिथ्या ही हुआ करते हैं)। बुद्धि अविद्याका कार्य है और परब्रह्म परमात्मा वास्तवमें विच्छेदरहित है अतः उसका विच्छेद भी विकल्पसे ही माना हुआ है॥४८॥ (इसी प्रकार उपाधियोंका बाध करते हुए) साभास अहंकरूप अवच्छिन्न चेतन (जीव) की 'तत्त्वमसि' (त. वह है) आदि महावाक्योंद्वारा पूर्ण चेतन (ब्रह्म) के साथ एकता बतलायी जाती है॥४९॥ जब महावाक्यद्वारा (इस-प्रकार) जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है उस समय अपने कार्योंसहित अविद्या नष्ट हो ही जाती है—इसमें कोई सन्देह नहीं॥५०॥ मेरा भक्त इस उपर्युक्त तत्त्वको समझ-कर मेरे स्वरूपको प्राप्त होनेका पात्र हो जाता है; पर जो लोग मेरी भक्तिको छोड़कर शास्त्ररूप गढ़ेमें पड़े भटकते रहते हैं उन्हें सौ जन्मतक भी न तो ज्ञान होता है और न मोक्ष ही प्राप्त होता है॥५१॥ हे अनघ! यह परम रहस्य मुझ आत्मस्वरूप रामका हृदय है; और साक्षात् मैंने ही तुम्हें सुनाया है। यदि तुम्हें इन्द्रलोकके राज्यसे भी अधिक सम्पत्ति मिले तो भी तुम इसे मेरी भक्तिसे हीन किसी दुष्ट पुरुषको मत सुनाना"॥५२॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि! मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय, हृदयहारी, परम पवित्र और पापनाशक 'श्रीरामहृदय' सुनाया है॥५३॥ यह समस्त वेदान्तका सार-संग्रह साक्षात् श्रीरामचन्द्रजीका कहा हुआ है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता है॥५४॥ इसके पठन-मात्रसे अनेक जन्मोंके सञ्चित ब्रह्महत्यादि समस्त पाप निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि श्रीरामके वचन