अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग १ ] बालकाण्डे ७
| तत्सान्निध्यान्मया सृष्टं तस्मिन्नारोप्यतेऽबुधैः।<br>अयोध्यानगरे जन्म रघुवंशेऽतिनिर्मले ॥३५॥<br>विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः।<br>अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः ॥३६॥<br>मत्पाणिग्रहणं पश्चाद्भार्गवस्य मदक्षयः।<br>अयोध्यानगरे वासो मया द्वादशवार्षिकः॥३७॥<br>दण्डकारण्यगमनं विराधवध एव च।<br>मायामारीचमरणं मायासीताहृतिस्तथा ॥३८॥<br>जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य तथैव च।<br>शबर्याः पूजनं पश्चात्सुग्रीवेण समागमः ॥३९॥<br>वालिनश्च वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च।<br>सेतुबन्धश्च जलधौ लंकायाश्च निरोधनम् ॥४०॥<br>रावणस्य वधो युद्धे सपुत्रस्य दुरात्मनः।<br>विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥४१॥<br>अयोध्यागमनं पश्चाद्राज्ये रामाभिषेचनम्।<br>एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि।<br>आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ४२<br>रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच-<br>त्याकाङ्क्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित्।<br>आनन्दमूर्तिरचलः परिणामहीनो<br>मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ॥४३॥<br><br>ततो रामः स्वयं प्राह हनूमन्तमुपस्थितम्।<br>शृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ४४<br>आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान्।<br>जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि।<br>प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥४५॥ | करती हूँ ॥३४॥ तो भी इनकी सन्निधिमात्रसे की हुई मेरी रचनाको बुद्धिहीन लोग इनमें आरोपित कर लेते हैं। अतएव, अयोध्यापुरीमें अत्यन्त पवित्र रघुकुलमें इनका जन्म लेना ॥ ३५ ॥ फिर विश्वामित्रजीकी सहायता करना, उनके यज्ञकी रक्षा करना, अहल्याको शाप-मुक्त करना, श्रीमहादेवजीके धनुषको तोड़ना ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् मेरा पाणिग्रहण करना, परशुरामजीका गर्व-खण्डन करना तथा बारह वर्षतक मेरे साथ अयोध्यापुरीमें रहना ॥ ३७॥ फिर दण्डकारण्यमें जाना, विराधका वध करना, माया-मृगरूप मारीचका मारा जाना, मायामयी सीताका हरा जाना ॥ ३८ ॥ तदनन्तर जटायु और कबन्धका मुक्त होना, शबरीद्वारा भगवान्का पूजित होना और सुग्रीवसे मित्रता होना ॥ ३९ ॥ फिर बालिका वध करना, सीताजीकी खोज कराना, समुद्रका पुल बँधवाना और लङ्कापुरीको घेर लेना ॥ ४० ॥ तथा पुत्रोंके सहित दुरात्मा रावणको युद्धमें मारना एवं विभीषणको लङ्काका राज्य देकर पुष्पक-विमानद्वारा मेरे साथ अयोध्या लौट आना, फिर श्रीरामजीका राज्यपदपर अभिषिक्त होना—इत्यादि समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किये हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें इन निर्विकार सर्वात्मा भगवान् राममें आरोपित करते हैं ॥ ४१-४२ ॥ ये राम तो (वास्तवमें) न चलते हैं, न ठहरते हैं, न शोक करते हैं, न इच्छा करते हैं, न त्यागते हैं और न कोई अन्य क्रिया ही करते हैं। ये आनन्दस्वरूप, अविचल और परिणामहीन हैं, केवल मायाके गुणोंसे व्याप्त होनेके कारण ही ये वैसे प्रतीत होते हैं॥ ४३ ॥<br><br>तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने सम्मुख खड़े हुए पवनपुत्र हनुमान्से स्वयं कहा—"मैं तुम्हें आत्मा, अनात्मा और परमात्माका तत्त्व बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो ॥ ४४ ॥ जलाशयमें आकाशके तीन भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं—एक महाकाश¹, दूसरा जलावच्छिन्न आकाश² और तीसरा प्रतिबिम्बाकाश³। जैसे आकाशके ये तीन बड़े-बड़े भेद दिखायी देते हैं ॥४५॥ उसी प्रकार चेतन भी तीन प्रकारका |
¹ १, जो सर्वत्र व्याप्त है। ² २, जो केवल जलाशयमें ही परिमित है। ³ ३, जो जलमें प्रतिबिम्बित है।