भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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पृष्ठ 25

अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


तथैव देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः
कृतं परेऽध्यस्य जनो विमुह्यति ॥२२॥
किये हुए कर्मोंका आत्मामें आरोप करके मोहित हो जाते हैं ॥२२॥


नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत्
प्रकाशरूपान्यभिचारतः क्वचित् ।
ज्ञानं तथाऽज्ञानमिदं द्वयं हरौ
रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्धने ॥२३॥
प्रकाश-रूपताका कभी व्यभिचार न होनेसे जिस प्रकार सूर्यमें रात-दिनका भेद नहीं होता—वह सर्वदा एक समान प्रकाशमान रहता है—उसी प्रकार शुद्धचेतनघन भगवान् राममें ज्ञान और अज्ञान दोनों कैसे रह सकते हैं ? ॥२३॥


तस्मात्परानन्दमये रघूत्तमे
विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः ।
अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दलोचने
मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम् ॥२४॥
अतएव परानन्दस्वरूप विज्ञानघन अज्ञान-साक्षी कमलनयन भगवान् राममें अज्ञानका लेश भी नहीं है क्योंकि वे मायाके अधिष्ठान हैं इसलिये वह उन्हें मोहित नहीं कर सकती ॥२४॥


अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुर्लभम् ।
सीताराममरुत्सूनुसंवादं मोक्षसाधनम् ॥२५॥
हे पार्वति ! इस विषयमें मैं तुम्हें सीता, राम और हनुमान्‌जीका मोक्षका साधन-रूप संवाद सुनाता हूँ जो अत्यन्त गोपनीय और परम दुर्लभ है ॥२५॥


पुरा रामायणे रामो रावणं देवकण्टकम् ।
हत्वा रणे रणश्लाघी सपुत्रबलवाहनम् ॥२६॥
सीतया सह सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
अयोध्यामगमद्रामो हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ॥२७॥
पूर्वकालमें रामावतारके समय जब युद्धप्रिय श्रीरामचन्द्रजी देवताओंके कण्टकरूप रावणको संतान, सेना और वाहनोंके सहित युद्धमें मारकर सीता, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित हनुमान् आदि वानरोंसे घिरे हुए अयोध्यापुरीमें आये ॥ २६-२७ ॥


अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठाद्यैर्महात्मभिः ।
सिंहासने समासीनः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥२८॥
दृष्ट्वा तदा हनूमन्तं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम् ।
कृतकार्यं निराकाङ्क्षं ज्ञानापेक्षं महामतिम् ॥२९॥
रामः सीतामुवाचेदं ब्रूहि तत्त्वं हनूमते ।
निष्कल्मषोऽयं ज्ञानस्य पात्रं नौ नित्यभक्तिमान् ॥३०
और वहाँ आकर राज्याभिषेक होनेपर वसिष्ठ आदि महात्माओंसे घिर कर करोड़ों सूर्योंकी प्रभा धारणकर जब सिंहासनपर विराजमान हुए ॥२८॥ उस समय कृतकृत्य और भोगेच्छारहित महामति हनुमान्‌जीको ज्ञानाभिलाषासे अपने सम्मुख हाथ जोड़े खड़े देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीसे ऐसा कहा—"सीते ! यह हनुमान् हम दोनोंमें अत्यन्त भक्ति रखता है, इसलिये यह निष्पाप है और ज्ञानका सुयोग्य पात्र है। अतः तुम इसे मेरे तत्त्वका उपदेश करो" ॥ २९-३० ॥


तथेति जानकी प्राह तत्त्वं रामस्य निश्चितम् ।
हनूमते प्रपन्नाय सीता लोकविमोहिनी ॥३१॥
तब लोक-विमोहिनी जनकनन्दिनी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीसे 'बहुत अच्छा' कह शरणागत हनुमान्‌को भगवान् रामका निश्चित तत्त्व बताने लगीं।३ १


रामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ॥३२॥
आनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम् ।
सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ॥३३॥
सीताजीने कहा—"वत्स हनुमान् ! तुम रामको साक्षात् अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म समझो; ये निःसन्देह समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियोंके अविषय, आनन्दघन, निर्मल, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, सर्व-व्यापक, स्वयंप्रकाश और पापहीन परमात्मा ही हैं ॥३२-३३॥


मां विद्धि मूलप्रकृतिं सर्गस्थित्यन्तकारिणीम् ।
तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतान्द्रता ॥३४॥
और मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाली मूल-प्रकृति जानो। मैं ही निरालस्य होकर इनकी सन्निधिमात्रसे इस विश्वकी रचना किया