अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग १ ] | बालकाण्ड | ५ |
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यदि स्म जानाति कुतो विलापः सीताकृतेऽनेन कृतः परेण। जानाति नैवं यदि केन सेव्यः समो हि सर्वैरपि जीवजातैः ॥१४॥ अत्रोत्तरं किं विदितं भवद्भि- स्तद्ब्रूत मे संशयभेदि वाक्यम् ॥१५॥
श्रीमहादेव उवाच
धन्यासि भक्तासि परात्मनस्त्वं यज्ज्ञातुमिच्छा तव रामतत्त्वम्। पुरा न केनाप्यभिचोदितोऽहं वक्तुं रहस्यं परमं निगूढम् ॥१६॥ त्वयाद्य भक्त्या परिनोदितोऽहं वक्ष्ये नमस्कृत्य रघूत्तमं ते। रामः परात्मा प्रकृतेरनादि- रानन्द एकः पुरुषोत्तमो हि ॥१७॥ स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा नभोवदन्तर्बहिरस्थितो यः। सर्वान्तरस्थोऽपि निगूढ आत्मा स्वमायया सृष्टमिदं विचेष्टे ॥१८॥ जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि। एतन्न जानन्ति विमूढचित्ताः स्वाविद्यया संवृतमानसा ये ॥१९॥ स्वाज्ञानमप्यात्मनि शुद्धबुद्धे- स्वारोपयन्तीह निरस्तमाये। संसारमेवानुसरन्ति ते वै पुत्रादिसक्ताः पुरुकर्मयुक्ताः ॥२०॥ जानन्ति नैवं हृदये स्थितं वै चामीकरं कण्ठगतं यथाऽज्ञाः। यथाऽन्धकारो न तु विद्यते रवौ ज्योतिःस्वभावे परमेश्वरे तथा। विशुद्धविज्ञानघने रघूत्तमे- ऽविद्या कथं स्यात्परतः परात्मनि ॥२१॥ यथा हि चाक्ष्णा भ्रमता गृहादिकं विनष्टदृष्टेर्भमतीव दृश्यते।
हूँ कि) यदि वे आत्मतत्त्वको जानते थे, तो उन परमात्माने सीताके लिये इतना विलाप क्यों किया? और यदि उन्हें आत्मज्ञान नहीं था, तो वे अन्य सामान्य जीवोंके समान ही हुए; फिर उनका भजन क्यों किया जाना चाहिये? इस विषयमें आपका क्या विचार है सो ऐसे वाक्योंमें कहिये जिससे मेरा सन्देह निवृत्त हो जाय ॥१४-१५॥
श्रीमहादेवजी बोले—देवि! तुम धन्य हो, तुम परमात्माकी परम भक्त हो, जो तुम्हें रामका तत्त्व जाननेकी इच्छा हुई है। इससे पूर्व, इस परमगूढ़ रहस्यका वर्णन करनेके लिये मुझसे और किसीने नहीं कहा ॥१६॥ आज तुमने मुझसे भक्तिपूर्वक प्रश्न किया है इसलिये मैं श्रीरघुनाथजीकी वन्दनाकर तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। श्रीरामचन्द्रजी निःसन्देह प्रकृतिसे परे, परमात्मा, अनादि, आनन्दघन, अद्वितीय और पुरुषोत्तम हैं ॥१७॥ जो अपनी मायासे ही इस सम्पूर्ण जगतको रचकर इसके बाहर-भीतर सब ओर आकाशके समान व्याप्त हैं तथा जो आत्मारूपसे सबके अन्तःकरणमें स्थित हुए अपनी मायासे इस विश्वको परिचालित कर रहे हैं ॥१८॥ चुम्बकके निकट होनेसे जिसप्रकार जड लोहेमें गति उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जिनकी सन्निधिमात्रसे यह विश्व सदा सब ओर भ्रमता रहता है उन परमात्मा रामको, जिनका हृदय आत्माके अज्ञानसे ढँका हुआ है वे मूढ़जन नहीं जान सकते ॥१९॥ वे मूढ़ उन मायातीत शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें भी अपने अज्ञानको आरोपित करते हैं अर्थात् उन्हें भी अपने समान ही अज्ञानी मानते हैं, तथा वे सर्वदा स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त रहनेवाले पामर जीव बहुत-से कर्मोंमें लगे रहकर संसार-चक्रमें ही पड़े रहते हैं ॥२०॥ वे अज्ञान अपने गलेमें पड़े हुए कण्ठेको न जाननेके समान अपने ही हृदयमें स्थित परमात्मा रामको नहीं जानते (इसीलिये उनमें अज्ञानादिका आरोप करते हैं)। वास्तवमें तो जिस प्रकार सूर्यमें कभी अन्धकार नहीं रहता उसी प्रकार प्रकृत्यादिसे अतीत, विशुद्ध-विज्ञानघन, ज्योतिःस्वरूप, परमेश्वर परमात्मा राममें भी अविद्या नहीं रह सकती ॥२१॥ और जिस प्रकार चक्कर लगाते समय मनुष्यको नेत्रोंके घूमनेसे गृह आदि भी घूमते हुए प्रतीत होते हैं उसी प्रकार लोग अपने देह और इन्द्रियरूप कतकि