अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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कैलासाग्रे कदाचिद्रविशतविमले मन्दिरे रत्नपीठे
संविष्टं ध्याननिष्ठं त्रिनयनमभयं सेवितं सिद्धसंघैः ।
देवी वामाङ्कसंस्था गिरिवरतनया पार्वती भक्तिनम्रा
प्राहैदं देवमीशं सकलमलहरं वाक्यमानन्दकन्दम् ॥ ६ ॥
पार्वत्युवाच
नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास सर्वात्मदृक् त्वं परमेश्वरोऽसि ।
पृच्छामि तत्त्वं पुरुषोत्तमस्य सनातनं त्वं च सनातनोऽसि ॥ ७ ॥
गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः ।
तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता प्रियोऽसि मे त्वं वद यत्तु पृष्टम् ॥ ८ ॥
ज्ञानं सविज्ञानमथाशुभक्ति-वैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत् ।
जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन ॥ ९ ॥
पृच्छामि चान्यच्च परं रहस्यं तदेव चाग्रे वद वारिजाक्ष ।
श्रीरामचन्द्रेऽखिललोकसारे भक्तिर्दृढा नौर्भवति प्रसिद्धा ॥ १० ॥
भक्तिः प्रसिद्धा भवमोक्षणाय नान्यत्ततः साधनमस्ति किञ्चित् ।
तथापि हृत्संशयबन्धनं मे विभेत्तुमर्हस्यमलोक्तिभिस्त्वम् ॥ ११ ॥
वदन्ति रामं परमेकमाद्यं निरस्तमायागुणसंप्रवाहम् ।
भजन्ति चाहर्निशमप्रमत्ताः परं पदं यान्ति तथैव सिद्धाः ॥ १२ ॥
वदन्ति केचित्परमोऽपि रामः स्वाविद्यया संवृतमात्मसंज्ञम् ।
जानाति नात्मानमतः परेण सम्बोधितो वेद परात्मतत्त्वम् ॥ १३ ॥
हिन्दी-अनुवाद
एक समय कैलाशपर्वतके शिखरपर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान शुभ्र भवनमें रत्नसिंहासनपर ध्यानावस्थित बैठे हुए, सिद्ध-समूह-सेवित, नित्यनिर्भय, सर्वपापपहारी आनन्दकन्द देवदेव भगवान् त्रिनयनसे उनके वामाङ्कमें विराजमान श्रीगिरिराजकुमारी पार्वती ने भक्तिभावसे नम्रतापूर्वक ये वाक्य कहे ॥ ६ ॥
श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे देव! हे जगन्निवास! आपको नमस्कार है; आप सबके अन्तःकरणोंके साक्षी और परमेश्वर हैं। मैं आपसे श्रीपुरुषोत्तम भगवान्का सनातन-तत्त्व पूछना चाहती हूँ, क्योंकि आप भी सनातन हैं ॥ ७ ॥ महानुभावलोग जो अत्यन्त गोपनीय विषय होता है तथा अन्य किसीसे कहने योग्य नहीं होता उसे भी अपने भक्तजनोंसे कह देते हैं। हे देव! मैं भी आपकी भक्त हूँ, मुझे आप अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये मैंने जो कुछ पूछा है वह वर्णन कीजिये ॥ ८ ॥ जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य संसार-समुद्रसे पार हो जाते हैं उस भक्ति और वैराग्यसे परिपूर्ण प्रकाशमय आत्मज्ञानका वर्णन आप विज्ञानसहित इस प्रकार स्वल्प शब्दोंमें कीजिये जिससे मैं स्त्री होनेपर भी आपके वचनोंको (सहज ही) समझ सकूँ ॥ ९ ॥ हे कमलनयन! मैं एक परम गुह्य रहस्य आपसे और पूछती हूँ, कृपया आप पहले उसे ही वर्णन करें। यह तो प्रसिद्ध ही है कि अखिल-लोक-सार श्रीरामचन्द्रजीकी विशुद्ध भक्ति संसार-सागरको तरनेके लिये सुदृढ़ नौका है ॥ १० ॥ संसारसे मुक्त होनेके लिये भक्ति ही प्रसिद्ध उपाय है उससे श्रेष्ठ और कोई भी साधन नहीं है; तथापि आप अपने विशुद्ध वचनोंसे मेरे हृदयकी संशय-ग्रन्थिका छेदन कीजिये ॥ ११ ॥ प्रमादरहित सिद्धगण श्रीरामचन्द्रजीको परम अद्वितीय, सबके आदिकारण और प्रकृतिके गुण-प्रवाहसे परे बतलाते हैं तथा वे अहर्निश उनका भजन करके परमपद भी प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ परन्तु कोई-कोई कहते हैं कि राम परब्रह्म होनेपर भी अपनी मायासे आवृत्त हो जानेके कारण अपने आत्मस्वरूपको नहीं जानते थे। इसलिये अन्य (वशिष्ठादि) के उपदेशसे उन्होंने आत्मतत्त्वको जाना ॥ १३ ॥ (अतः मैं पूछती