अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
पृष्ठ 22, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 22
ॐ
अध्यात्मरामायण
बालकाण्ड
प्रथम सर्ग
रामहृदय
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यः पृथ्वीभरवारणाय दिविजैः<br> संप्रार्थितश्चिन्मयः<br>संजातः पृथिवीतले रविकुले<br> मायामनुष्योऽव्ययः ।<br>निश्चक्रं हतराक्षसः पुनरगाद्<br> ब्रह्मत्वमाद्यं स्थिरां<br>कीर्तिं पापहरां विधाय जगतां<br> तं जानकीशं भजे ॥ १ ॥ | जिन चिन्मय अविनाशी प्रभुने पृथिवीका भार उतारनेके लिये देवताओंकी प्रार्थनासे पृथिवीतलपर सूर्यवंशमें माया-मानवरूपसे अवतार लिया और जो राक्षसोंके समूहको मारकर तथा संसारमें अपनी पापविनाशिनी अविचल कीर्ति स्थापितकर पुनः अपने आद्य ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये उन श्रीजानकीवल्लभका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं<br> मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूर्तिम् ।<br>आनन्दसान्द्रममलं निजबोधरूपं<br> सीतापतिं विदिततत्त्वमहं नमामि ॥ २ ॥ | जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, मायाके आश्रय होकर भी मायातीत हैं, अचिन्त्यस्वरूप हैं, आनन्दघन हैं, उपाधिकृत दोषोंसे रहित हैं, तथा स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं उन तत्त्ववेत्ता श्रीसीतापतिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ |
| पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः<br> शृण्वन्ति चाध्यात्मिकसंज्ञितं शुभम् ।<br>रामायणं सर्वपुराणसंमतं<br> निर्धूतपापा हरिमेव यान्ति ते ॥ ३ ॥ | जो लोग इस सर्व-पुराण-सम्मत पवित्र अध्यात्मरामायणका एकाग्र-चित्तसे नित्य पाठ करते हैं और जो इसे सुनते हैं वे पापरहित होकर श्रीहरिको ही प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ |
| अध्यात्मरामायणमेव नित्यं<br> पठेद्यदीच्छेद्भवबन्धमुक्तिम् ।<br>गवां सहस्रायुतकोटिदानात्<br> फलं लभेद्यः शृणुयात्स नित्यम् ॥ ४ ॥ | यदि कोई संसार-बन्धनसे मुक्त होना चाहता हो तो वह अध्यात्मरामायणका ही नित्य पाठ करे। जो कोई मनुष्य इसका नित्य श्रवण करता है वह लाखों करोड़ गो-दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ |
| पुरारिगिरिसंभूता श्रीरामार्णवसंगता ।<br>अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ५ ॥ | श्रीशंकररूप पर्वतसे निकली हुई रामरूप समुद्रमें मिलनेवाली यह अध्यात्मरामायणरूपिणी गंगा त्रिलोकीको पवित्र कर रही है ॥ ५ ॥ |