अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ८ ] युद्धकाण्ड २७३
| स तत्पर्वतसङ्काशं स्फुरत्कुण्डलदंष्ट्रकम् ॥२७॥<br>चकर्त रक्षोधिपतेः शिरो वृत्रमिवाशनिः ।<br>तच्छिरः पतितं लङ्काद्वारि कायो महोदधौ ॥२८॥<br>शिरोऽस्य रोधयद्द्वारं कायो नक्राद्यचूर्णयत् ।<br>ततो देवाः सऋषयो गन्धर्वाः पन्नगाः खगाः॥२९॥<br>सिद्धा यक्षा गुह्यकाश्च अप्सरोभिश्च राघवम् ।<br>ईडिरे कुसुमासारैर्वर्षन्तश्चाभिनन्दिताः ॥३०॥<br>आजगाम तदा रामं द्रष्टुं देवमुनीश्वरः ।<br>नारदो गगनात्तूर्णं स्वभासा भासयन्दिशः ॥३१॥<br>राममिन्दीवरश्याममुदाराङ्गं धनुर्धरम् ।<br>ईषत्ताम्रविशालाक्षमैन्द्रास्त्राञ्चितबाहुकम् ॥३२॥<br>दयार्द्रदृष्ट्या पश्यन्तं वानरान् शरपीडितान् ।<br>दृष्ट्वा गद्गदया वाचा भक्त्या स्तोतुं प्रचक्रमे ॥३३॥<br><br>नारद उवाच<br><br>देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन ।<br>नारायणाखिलाधार विश्वसाक्षिन्नमोऽस्तु ते ॥३४॥<br>विशुद्धज्ञानरूपोऽपि त्वं लोकानतिवञ्चयन् ।<br>मायया मनुजाकारः सुखदुःखादिमानिव ॥३५॥<br>त्वं मायया गुह्यमानः सर्वेषां हृदि संस्थितः ।<br>स्वयंज्योतिःस्वभावस्त्वं व्यक्त एवामलात्मनाम् ३६<br>उन्मीलयन् सृजस्येतन्नेत्रे राम जगत्त्रयम् ।<br>उपसंह्रियते सर्वं त्वया चक्षुर्निमीलनात् ॥३७॥<br>यस्मिन्सर्वमिदं भाति यतश्चैतच्चराचरम् ।<br>यस्मान्न किञ्चिल्लोकेऽस्मिंस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः।३८। | शिर काटा था उसी प्रकार उस बाणने उसका पर्वत-सदृश शिर, जिसमें कुण्डल और दाढ़ें चमक रही थीं, काट डाला । कुम्भकर्णका शिर लंकाके द्वारपर और उसका धड़ समुद्रमें गिरा ॥ २६-२८॥ उस मस्तकने लंकाके द्वारको रोक लिया और धड़ने बहुत-से नाके आदि जलजन्तुओंको कुचल डाला । इस प्रकार कुम्भकर्णके मारे जानेपर ऋषियोंके सहित देवगण तथा अप्सराओंके सहित गन्धर्व, नाग, पक्षी, सिद्ध, यक्ष और गुह्यक आदि अति प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजीपर पुष्पा-वली बरसाते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥२९-३०॥<br><br>इसी समय अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए देवर्षि नारद भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये तुरन्त ही आकाशसे आये ॥ ३१ ॥ जो नीलकमलके समान श्यामवर्ण, अति मनोहर-मूर्ति और धनुष धारण किये हुए हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और कुछ अरुणवर्ण हैं तथा भुजाएँ ऐन्द्रास्त्रसे सुशोभित हैं, जो अपनी दयामयी दृष्टिसे बाणों-से पीड़ित वानरोंकी ओर देख रहे हैं उन भगवान् रामका दर्शन कर श्रीनारदजी भक्तिसे गद्गदकण्ठ हो इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ ३२-३३ ॥<br><br>**नारदजी बोले—**हे देवाधिदेव ! हे जगत्पते ! हे परमात्मन् ! हे सनातन पुरुष ! हे नारायण ! हे सर्वाधार ! हे विश्वसाक्षिन् ! आपको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ आप विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हैं, तथापि लोकों-की वञ्चना करनेके लिये आप अपनी मायासे मनुष्या-कार धारण कर सुखी-दुःखी-से दिखायी देते हैं ॥ ३५ ॥ आप अपनी मायासे आच्छादित होकर ( अन्तर्यामी-रूपसे ) सबके अन्तःकरणोंमें स्थित हैं । आप स्वभाव-से ही स्वयंप्रकाश हैं और शुद्ध-चित्त व्यक्तियोंको ही आपका साक्षात्कार होता है ॥ ३६ ॥ हे राम ! आप नेत्र खोलकर ही इस सम्पूर्ण त्रिलोकीकी रचना कर देते हैं और आपके नेत्र मूँदते ही इस सबका लय हो जाता है ॥ ३७ ॥ जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भास रहा है जिससे इसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिसके अतिरिक्त संसारमें और कुछ भी नहीं है वह ब्रह्म आप ही हैं आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥ जिन्हें मुनिश्रेष्ठगण |
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