अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २७४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ८ |
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| प्रकृतिं पुरुषं कालं व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणम्।<br>यं जानन्ति मुनिश्रेष्ठास्तस्मै रामाय ते नमः ॥३९॥ | प्रकृति, पुरुष, काल और व्यक्ताव्यक्तस्वरूप जानते<br>हैं उन्हीं श्रीरामरूप आपको नमस्कार है ॥३९॥ श्रुतिने |
| विकाररहितं शुद्धं ज्ञानरूपं श्रुतिर्जगौ।<br>त्वां सर्वजगदाकारमूर्तिं चाप्याह सा श्रुतिः ॥४०॥ | विकाररहित, शुद्ध और ज्ञानस्वरूप कहकर आपका<br>वर्णन किया है और वही आपको सम्पूर्ण जगद्रूप भी<br>बतलाती है ॥ ४० ॥ हे देव ! इस प्रकार वेदवादियों- |
| विरोधो दृश्यते देव वैदिको वेदवादिनाम्।<br>निश्चयं नाधिगच्छन्ति त्वत्प्रसादं विना बुधाः ॥४१॥ | को यह वैदिक (वेद-वचनोंमें) विरोध दिखायी देता<br>है; किन्तु आपकी कृपाके बिना तो विज्ञजन भी किसी<br>निश्चयपर नहीं पहुँचते ॥ ४१ ॥ हे देव ! आप माया- |
| मायया क्रीडतो देव न विरोधो मनागपि।<br>रश्मिजालं रवेर्यद्वद्दृश्यते जलवद् भ्रमात् ॥४२॥ | से ही लीला कर रहे हैं, अतः इन वेदवाक्योंमें कुछ भी<br>विरोध नहीं है। जिस प्रकार सूर्यका किरणसमूह<br>भ्रमसे जलके समान प्रतीत होता है, हे राम ! उसी |
| भ्रान्तिज्ञानात्तथा राम त्वयि सर्वं प्रकल्प्यते।<br>मनसोऽविषयो देव रूपं ते निर्गुणं परम् ॥४३॥ | प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अज्ञानसे ही आपमें कल्पित<br>हुआ है; आपका वास्तविक निर्गुणरूप तो मन-<br>का अविषय है ॥ ४२-४३ ॥ हे देव ! वह किस |
| कथं दृश्यं भवेद्देव दृश्याभावे भजेत्कथम्।<br>अतस्तवावतारेषु रूपाणि निपुणा भुवि ॥४४॥ | प्रकार किसीको दिखायी दे सकता है ? और दिखायी<br>न देनेसे कोई उसका भजन भी कैसे कर सकता है ?<br>अतः संसारमें बुद्धिमान् और निपुणलोग आपके |
| भजन्ति बुद्धिसम्पन्नास्तरन्त्येव भवार्णवम्।<br>कामक्रोधादयस्तत्र बहवः परिपन्थिनः ॥४५॥ | अवतारस्वरूपोंका ही चिन्तन करते हैं और वे<br>ज्ञानसम्पन्न होकर संसार-सागरको पार कर ही लेते हैं।<br>इस भक्तिमार्गमें काम, क्रोध आदि बहुत-से विघ्न भी होते |
| भीषयन्ति सदा चेतो मांर्जारा मूषकं यथा।<br>त्वन्नाम स्मरतां नित्यं त्वद्रूपमपि मानसे ॥४६॥ | हैं ॥ ४४-४५ ॥ वे, बिल्ली जिस प्रकार चूहेको डराती<br>है उसी प्रकार चित्तको सर्वदा भयभीत करते रहते हैं, |
| त्वत्पूजानिरतानां ते कथामृतपरात्मनाम्।<br>त्वद्भक्तसङ्गिनां राम संसारो गोष्पदायते ॥४७॥ | हे राम ! जो लोग निरन्तर आपका नामस्मरण करते<br>हैं, आपके रूपका हृदयमें ध्यान करते हैं, आपकी पूजामें<br>तत्पर रहते हैं, आपके कथामृतका पान करते रहते<br>हैं तथा आपके भक्तोंका संग करते हैं उनके लिये यह |
| अतस्ते सगुणं रूपं ध्यात्वाहं सर्वदा हृदि।<br>मुक्तश्चरामि लोकेषु पूज्योऽहं सर्वदैवतैः ॥४८॥ | संसार (जो कि समुद्रके समान दुस्तर है) गोखुर-<br>के समान तुच्छ हो जाता है ॥ ४६-४७ ॥ अतः मैं<br>हृदयमें सर्वदा आपके सगुणरूपका ध्यान करता हुआ |
| राम त्वया महत्कार्यं कृतं देवहितेच्छया।<br>कुम्भकर्णवधेनाद्य भूभारोऽयं गतः प्रभो ॥४९॥ | जीवन्मुक्त होकर लोकान्तरोंमें विचरता हूँ और समस्त<br>देवताओंसे पूजित होता हूँ ॥ ४८ ॥ हे राम ! आपने<br>देवहितकी कामनासे यह बहुत बड़ा काम किया है; |
| श्वो हनिष्यति सौमित्रिरिन्द्रजेतारमाहवे।<br>हनिष्यसेऽथ राम त्वं परश्वो दशकन्धरम् ॥५०॥ | हे प्रभो ! इस कुम्भकर्णके वधसे आज पृथिवीका<br>(बहुत कुछ) भार उतर गया ॥ ४९ ॥ कल लक्ष्मण-<br>जी युद्धमें इन्द्रजित्को मारेंगे और परसों आप रावण-<br>का वध करेंगे ॥ ५० ॥ हे देवेश्वर ! मैं सिद्धोंके साथ |