भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ८ ]युद्धकाण्ड२७५
पश्यामि सर्वं देवेश सिद्धैः सह नभोगतः ।<br>अनुगृह्णीष्व मां देव गमिष्यामि सुरालयम् ॥५१॥आकाशमें स्थित होकर यह सब चरित्र देखूँगा । हे देव ! आप मुझपर दयादृष्टि रखें, अब मैं स्वर्गलोक को जाता हूँ ॥ ५१ ॥
इत्युक्त्वा राममामन्त्र्य नारदो भगवानृषिः ।<br>ययौ देवैः पूज्यमानो ब्रह्मलोकमकल्मषम् ॥५२॥ऐसा कह मुनिवर भगवान् नारदजी श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पा देवताओंसे पूजित हो पापहीन ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ५२ ॥
भ्रातरं निहतं श्रुत्वा कुम्भकर्णं महाबलम् ।<br>रावणः शोकसन्तप्तो रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥५३॥बिना प्रयास ही अद्भुत कर्म करनेवाले भगवान् रामद्वारा महाबली भाई कुम्भकर्णको मारा गया सुन रावण अत्यन्त शोकाकुल हुआ और
मूर्च्छितः पतितो भूमावुत्थाय विललाप ह ।<br>पितृव्यं निहतं श्रुत्वा पितरं चातिविह्वलम् ॥५४॥मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़ा तथा (मूर्च्छा निवृत्त होनेपर) उठकर विलाप करने लगा । तब इन्द्रजित्ने अपने चाचाको मारा गया और पिताको अति विह्वल सुन अपने शोकाकुल पितासे कहा-
इन्द्रजित्प्राह शोकार्तं त्यज शोकं महामते ।<br>मयि जीवति राजेन्द्र मेघनादे महाबले ॥५५॥"हे महामते ! शोक दूर कीजिये । हे राजेन्द्र ! मुझ महाबली मेघनादके जीते हुए आपके दुःखका कारण ही कहाँ है ?
दुःखस्यावसरः कुत्र देवान्तक महामते ।<br>व्येतु ते दुःखमखिलं स्वस्थो भव महीपते ॥५६॥हे देवताओंके कालस्वरूप 'महाबुद्धिमान् पृथिवीपते ! अपना समस्त दुःख छोड़कर आप शान्त होइये ॥५३-५६॥
सर्वं समीकरिष्यामि हनिष्यामि च वै रिपून् ।<br>गत्वा निकुम्भिलां सद्यस्तर्पयित्वा हुताशनम् ॥५७॥मैं अभी सब कुछ ठीक किये देता हूँ, इन शत्रुओंको मैं अवश्य मार डालूँगा । इस समय मैं निकुम्भिला गुफामें जाता हूँ, वहाँ अग्निको तृप्तकर
लब्ध्वा रथादिकं तस्मादजेयोऽहं भवाम्यरैः ।<br>इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा निर्दिष्टं हवनस्थलम् ॥५८॥रथ आदि प्राप्त करूँगा; इससे मैं शत्रुओंके लिये अजेय हो जाऊँगा।" ऐसा कह वह निर्दिष्ट यज्ञ-शालामें गया ॥ ५७-५८ ॥
रक्तमाल्याम्बरधरो रक्तगन्धानुलेपनः ।<br>निकुम्भिलास्थले मौनी हवनायोपचक्रमे ॥५९॥उस निकुम्भिला (नामकी देवी) के स्थानमें उसने रक्तवर्ण वस्त्र, रक्त पुष्पोंकी माला और रक्तचन्दनका लेप धारण कर हवन करना आरम्भ किया ॥ ५९ ॥
विभीषणोऽथ तच्छ्रुत्वा मेघनादस्य चेष्टितम् ।<br>प्राह रामाय सकलं होमारम्भं दुरात्मनः ॥६०॥जब विभीषणको मेघनादके इस कार्यका पता लगा तो उन्होंने उस दुरात्माके होमारम्भका सारा समाचार श्रीरामचन्द्रजीको सुनाया ॥ ६० ॥
समाप्यते चेद्धोमोऽयं मेघनादस्य दुर्मतेः ।<br>तदाऽजेयो भवेद्राम मेघनादः सुरासुरैः ॥६१॥(और कहा—)<br>"हे राम ! यदि दुरात्मा मेघनादका यह होम निर्विघ्न समाप्त हो गया तो वह देवता या असुर किसीसे भी नहीं जीता जा सकेगा ॥ ६१॥
अतः शीघ्रं लक्ष्मणेन घातयिष्यामि रावणिम् ।<br>आज्ञापय मया सार्धं लक्ष्मणं बलिनां वरम् ।<br>हनिष्यति न सन्देहो मेघनादं तवानुजः ॥६२॥अतः मैं शीघ्र ही लक्ष्मणजीके द्वारा उस रावण-कुमारका वध कराये देता हूँ, आप बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीलक्ष्मणजीको मेरे साथ जानेकी आज्ञा दीजिये । इसमें सन्देह नहीं, आपके छोटे भाई लक्ष्मणजी मेघनादको अवश्य मार डालेंगे" ॥ ६२ ॥
श्रीरामचन्द्र उवाच<br>अहमेवागमिष्यामि हन्तुमिन्द्रजितं रिपुम् ।<br>आग्नेयेन महास्त्रेण सर्वराक्षसघातिना ॥६३॥श्रीरामचन्द्रजी बोले—समस्त राक्षसोंको मारनेवाले महान् आग्नेय अस्त्रसे अपने शत्रु इन्द्रजित्‌को मारनेके लिये मैं स्वयं ही आऊँगा ॥ ६३ ॥