भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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  • २७६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ ---|---|---

विभीषणोऽपि तं प्राह नासावन्यैर्निहन्यते ।<br>यस्तु द्वादश वर्षाणि निद्राहारविवर्जितः ॥६४॥<br>तेनैव मृत्युर्निर्दिष्टो ब्रह्मणाऽस्य दुरात्मनः ।<br>लक्ष्मणस्तु अयोध्याया निर्गम्यायात्वया सह॥६५॥<br>तदादि निद्राहारादीन्न जानाति रघूत्तम ।<br>सेवार्थं तव राजेन्द्र ज्ञातं सर्वमिदं मया ॥६६॥<br>तदाज्ञापय देवेश लक्ष्मणं त्वरया मया ।<br>हनिष्यति न सन्देहः शेषः साक्षाद्धराधरः ॥६७॥<br>त्वमेव साक्षाज्जगतामधीशो<br>नारायणो लक्ष्मण एव शेषः ।<br>युवां धराभारनिवारणार्थं<br>जातौ जगन्नाटकसूत्रधारौ ॥६८॥ | तब विभीषणने कहा—"यह राक्षस किसी औरसे नहीं मारा जा सकता । जिसने बारह वर्षतक निद्रा और आहारको छोड़ दिया हो, ब्रह्माजीने इस दुरात्माकी मृत्यु उसीके हाथ निश्चित की है । हे रघुनाथजी ! ये लक्ष्मणजी जबसे अयोध्यासे निकलकर आपके साथ आये हैं तभीसे, आपकी सेवामें लगे रहनेके कारण, ये निद्रा और आहारादितो जानते ही नहीं । हे राजेन्द्र ! मैं ये सब बातें जानता हूँ ॥६४-६६॥ अतः हे देवेश्वर ! आप शीघ्र ही लक्ष्मणजीको मेरे साथ जानेकी आज्ञा दीजिये । ये साक्षात् धराधारी शेषनाग हैं, इसमें सन्देह नहीं उस राक्षसको ये अवश्य मार डालेंगे ॥६७॥ आप ही साक्षात् जगत्पति नारायण हैं और लक्ष्मणजी ही शेषनाग हैं । आप दोनों इस संसाररूपी नाटकके सूत्रधार हैं और पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही आपने जन्म लिया है" ॥६८॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे<br>युद्धकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवम सर्ग

मेघनाद-वध ।

श्रीमहादेव उवाच

विभीषणवचः श्रुत्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् ।<br>जानामि तस्य रौद्रस्य मायां कृत्स्नां विभीषण ॥१॥<br>स हि ब्रह्मास्त्रविच्छूरो मायावी च महाबलः ।<br>जानामि लक्ष्मणस्याऽपि स्वरूपं मम सेवनम् ॥२॥<br>ज्ञात्वैवासमहं तूष्णीं भविष्यत्कार्यगौरवात् ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह रामो ज्ञानवतां वरः ॥३॥<br>गच्छ लक्ष्मण सैन्येन महता जहि रावणिम् ।<br>हनूमत्प्रमुखैः सर्वैर्यूथपैः सह लक्ष्मण ॥४॥<br>जाम्बवानृक्षराजोऽयं सह सैन्येन संवृतः । | श्रीमहादेवजी बोले-हे पार्वति ! विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—"विभीषण ! उस महाभयङ्कर दैत्यकी मैं सारी माया जानता हूँ ॥१॥ वह ब्रह्मास्त्र-विद्याका जाननेवाला, बड़ा शूरवीर, मायावी और महाबली है । तथा लक्ष्मण मेरी जैसी सेवा करते हैं मैं उसका स्वरूप भी जानता हूँ (अर्थात् मुझे यह पता है कि मेरी सेवाके कारण उन्होंने निद्रा और आहार आदिको छोड़ रखा है) ॥२॥ किन्तु इस आगामी कार्यकी कठिनताका विचार करके ही मैंने यह सब जान-बूझकर भी अभीतक कुछ नहीं कहा।"<br>विभीषणसे इस प्रकार कह ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् रामचन्द्र लक्ष्मणजीसे बोले—॥३॥ "भैया लक्ष्मण ! तुम और हनुमान् आदि समस्त यूथपति, बहुत बड़ी सेनाके साथ जाओ और रावणके पुत्र मेघनादको मारो ॥४॥ अपनी सेनाके सहित ऋक्षराज जाम्बवान्