अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
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| सर्ग ९ ] | युद्धकाण्डं | २७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विभीषणश्च सचिवैः सह त्वामभियास्यति ॥ ५ ॥<br>अभिज्ञस्तस्य देशस्य जानाति विवराणि सः।<br>रामस्य वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः सविभीषणः ॥ ६ ॥<br>जग्राह कार्मुकं श्रेष्ठमन्यद्भीमपराक्रमः।<br>रामपादाम्बुजं स्पृष्ट्वा हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत् ॥ ७ ॥<br>अद्य मत्कार्मुकान्मुक्ताः शरा निर्भिद्य रावणिम्।<br>गमिष्यन्ति हि पातालं स्नातुं भोगवतीजले ॥ ८ ॥ | और मन्त्रियोंके सहित विभीषण तुम्हारे साथ जायँगे ॥ ५ ॥ ये विभीषण उससे परिचित हैं और उसके छिपनेकी समस्त कन्दराओंको जानते हैं, (अतः इनसे तुम्हें उसका पता लगानेमें बहुत सहायता मिलेगी) ।”<br>रामचन्द्रजीके वचन सुनकर महापराक्रमी लक्ष्मणजीने विभीषणको साथ ले अपना एक दूसरा उत्तम धनुष उठाया और अति प्रसन्नतापूर्वक भगवान् रामके चरण-कमलका स्पर्श कर कहा ॥६-७॥ “प्रभो ! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावण-पुत्र इन्द्रजित्के शरीरको भेदकर भोगवती (पाताल-गङ्गा) के जलमें स्नान करनेके लिये पाताललोकको चले जायँगे” ॥ ८ ॥ |
| एवमुक्त्वा स सौमित्रिः परिक्रम्य प्रणम्य तम्।<br>इन्द्रजिन्निधनाकाङ्क्षी ययौ त्वरितविक्रमः ॥ ९ ॥<br>वानरैर्बहुसाहस्रैर्हनूमान्पृष्ठतोऽन्वगात् ।<br>विभीषणश्च सहितो मन्त्रिभिस्त्वरितं ययौ ॥ १०॥<br>जाम्बवत्प्रमुखा ऋक्षाः सौमित्रिं त्वरयान्वयुः।<br>गत्वा निकुम्भिलादेशं लक्ष्मणो वानरैः सह ॥ ११ ॥<br>अपश्यद्वलसङ्घातं दूराद्राक्षससङ्कुलम्।<br>धनुरायम्य सौमित्रिर्यत्तोऽभूद्भूरिविक्रमः ॥ १२॥<br>अङ्गदेन च वीरेण जाम्बवान् राक्षसाधिपः।<br>तदा विभीषणः प्राह सौमित्रिं पश्य राक्षसान् ॥१३॥<br>यदेतद्राक्षसानीकं मेघश्यामं विलोक्यते।<br>अस्यानीकस्य महतो भेदने यत्नवान् भव ॥१४॥<br>राक्षसेन्द्रसुतोऽप्यस्मिन् भिन्ने दृश्यो भविष्यति।<br>अभिद्रवाशु यावद्वै नैतत्कर्म समाप्यते ॥१५॥<br>जहि वीर दुरात्मानं हिंसापरमधार्मिकम्।<br>विभीषणवचः श्रुत्वा लक्ष्मणः शुभलक्षणः ॥१६॥<br>ववर्ष शरवर्षाणि राक्षसेन्द्रसुतं प्रति।<br>पाषाणैः पर्वताग्रैश्च वृक्षैश्च हरियूथपाः ॥१७॥ | रघुनाथजीसे इस प्रकार कह सुमित्रानन्दन लक्ष्मणजीने उनकी परिक्रमा की और इन्द्रजित्को मारनेके लिये बड़ी तेजीसे चले ॥ ९ ॥ उनके पीछे हजारों वानरोंके साथ हनुमान्जी और मन्त्रियोंके सहित विभीषणने भी बड़ी शीघ्रतासे कूच किया ॥१०॥ तथा जाम्बवान् आदि रीछ भी तुरन्त ही श्रीलक्ष्मणजीके साथ चले। जिस समय वानरोंके सहित लक्ष्मणजी निकुम्भिलाके स्थानपर पहुँचे, उन्होंने दूरसे ही वहाँ राक्षसोंकी बड़ी भारी सेना एकत्रित देखी। तब महापराक्रमी लक्ष्मणजी धनुष चढ़ाकर सावधान हो गये ॥११-१२॥ उनके साथ ही वीरवर अंगदके सहित जाम्बवान् भी सावधान हो गये। तब राक्षसराज विभीषणने लक्ष्मणजीसे कहा— “लक्ष्मणजी ! इन राक्षसोंको देखिये ! सामने जो मेघके समान श्यामवर्ण राक्षस-सेना दिखायी दे रही है इस प्रवल अनीको नष्ट करनेका यत्न कीजिये ॥१३-१४॥ इसके नष्ट हो जानेपर राक्षसराज रावणका पुत्र इन्द्रजित् भी दिखायी देने लगेगा। इस कर्मके समाप्त होनेसे पहले ही तुरन्त धावा कर दीजिये ॥१५॥ हे वीर ! इस हिंसापरायण दुरात्मा पापीको आप शीघ्र ही मार डालिये ।”<br>विभीषणके वचन सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने राक्षस-राजकुमार मेघनादकी ओर बाण बरसाने आरम्भ किये तथा वानर-यूथपति भी सब ओरसे पत्थर, पर्वत-शिखर और वृक्षादिसे दैत्योंपर प्रहार करने लगे। इसी |