अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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[संस्कृत श्लोक]
निर्जघ्नुः सर्वतो दैत्यांस्तेऽपि वानरयूथपान् ।
परश्वधैः शितैर्बाणैरसिभिर्यष्टितोमरैः ॥१८॥
निर्जघ्नुर्वानरानीकं तदा शब्दो महानभूत् ।
स सम्प्रहारस्तुल्यः संजज्ञे हरिरक्षसाम् ॥१९॥
इन्द्रजित्स्वबलं सर्वमर्द्यमानं विलोक्य सः ।
निकुम्भिलां च होमं च त्यक्त्वा शीघ्रं विनिर्गतः २०
रथमारुह्य सधनुः क्रोधेन महताऽगमत् ।
समाह्वयन् स सौमित्रिं युद्धाय रणमूर्धनि ॥२१॥
सौमित्रे मेघनादोऽहं मया जीवन्न मोक्ष्यसे ।
तत्र दृष्ट्वा पितृव्यं स प्राह निष्ठुरमापणम् ॥२२॥
इहैव जातः संवृद्धः साक्षाद् भ्राता पितुर्मम ।
यस्त्वं स्वजनमुत्सृज्य परभृत्यत्वमागतः ॥२३॥
कथं द्रुह्यसि पुत्राय पापीयानसि दुर्मतिः ।
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं दृष्ट्वा हनूमतपृष्ठतः स्थितम्॥२४॥
उद्यदायुधनिर्ब्रिंशे रथे महति संस्थितः ।
महाप्रमाणमुद्यम्य घोरं विस्फारयन्धनुः ॥२५॥
अद्य वो मामका बाणाः प्राणान्पास्यन्ति वानराः।
ततः शरं दाशरथिः सन्दधायामित्रकर्षणः ॥२६॥
ससर्ज राक्षसेन्द्राय क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।
इन्द्रजिद्रक्तनयनो लक्ष्मणं समुदैक्षत ॥२७॥
शक्राशनिसमस्पर्शैर्लक्ष्मणेनाहतः शरैः ।
मुहूर्तमभवन्मूढः पुनः प्रत्याहृतेन्द्रियः ॥२८॥
ददर्शावस्थितं वीरं वीरो दशरथात्मजम् ।
सोऽभिचक्राम सौमित्रिं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥२९॥
शरान्धनुषि सन्धाय लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ।
यदि ते प्रथमे युद्धे न दृष्टो मे पराक्रमः ॥३०॥
[हिन्दी अनुवाद]
प्रकार राक्षसोंने भी वानरयूथपतियों और वानर-सेना-पर परशु, तीक्ष्ण बाण, खड्ग, यष्टि और तोमरादि शस्त्रोंसे आक्रमण किया। तब वहाँ बड़ा भारी कोलाहल हुआ और राक्षस तथा वानरोंमें बड़ा घमासान युद्ध छिड़ गया ॥१८-१९॥
अपनी सेनाको इस प्रकार दलित होते देख इन्द्रजित् निकुम्भिला और होमको छोड़कर बाहर आया ॥२०॥ और तुरन्त ही रथपर चढ़ अत्यन्त क्रोधसे हाथमें धनुष ले रणभूमिमें सामने आया तथा लक्ष्मणजीको युद्धके लिये ललकारते हुए बोला—॥२१॥ "लक्ष्मण ! मैं मेघनाद हूँ, अब तुम मुझसे जीवित नहीं बच सकते।" फिर वहाँ अपने चाचा विभीषणको देखकर वह कठोर शब्दोंमें कहने लगा ॥२२॥ "तुम इस लङ्कापुरीमें ही उत्पन्न हुए हो और इसीमें रहकर इतने बड़े हुए हो तथा मेरे पिताके सगे भाई हो, किन्तु अब तुमने अपने स्वजनोंको छोड़कर शत्रुओंका दासत्व स्वीकार किया है ! ॥२३॥ मैं तुम्हारे पुत्रके समान हूँ, न जाने तुम कैसे मुझसे द्रोह कर रहे हो ? अवश्य ही तुम बड़े पापी और दुरात्मा हो।" ऐसा कह उसने हनुमान्जीकी पीठपर बैठे हुए लक्ष्मणजीकी ओर देखा ॥२४॥ तथा जिसमें नाना प्रकारके तीक्ष्ण शस्त्र उपस्थित थे उस महान् रथमें बैठे हुए उस दैत्यने एक बड़ा लम्बा धनुष उठाकर उसकी भयङ्कर टंकार की ॥२५॥ और बोला "अरे वानरो ! आज मेरे बाण तुम्हारे प्राणोंको पियेंगे।" तब क्रोधसे सर्पके समान फुफकारते हुए, शत्रुको दमन करनेवाले, दशरथकुमार लक्ष्मणजीने भी अपने धनुषपर एक बाण चढ़ाकर उसे मेघनादपर छोड़ा। इधर इन्द्रजित्ने भी क्रोधसे लाल-लाल नेत्र कर लक्ष्मणजीकी ओर देखा ॥२६-२७॥
श्रीलक्ष्मणजीके छोड़े हुए इन्द्रवज्रके समान महाकठोर बाणोंके लगनेसे वह एक मुहूर्तके लिये अचेत हो गया। फिर चेत होनेपर उसने अपने सामने दशरथनन्दन वीरवर लक्ष्मणजीको खड़े देखा। उन्हें देखकर वह राक्षस क्रोधसे नेत्र लाल कर उनकी ओर दौड़ा ॥२८-२९॥ तथा अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर उनसे यों कहने लगा, "यदि