भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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पृष्ठ 308

सर्ग ९० ] युद्धकाण्ड २७९


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अद्य त्वां दर्शयिष्यामि तिष्ठेदानीं व्यवस्थितः ।<br>इत्युक्त्वा सप्तभिर्बाणैरभिविव्याध लक्ष्मणम् ॥३१॥<br>दशभिश्च हनूमन्तं तीक्ष्णधारैः शरोत्तमैः ।<br>ततः शरशतेनैव सम्प्रयुक्तेन वीर्यवान् ॥३२॥<br>क्रोधद्विगुणसंरब्धो निर्विभेद विभीषणम् ।<br>लक्ष्मणोऽपि तथा शत्रुं शरवर्षैरवाकिरत् ॥३३॥<br>तस्य बाणैः सुसंविद्धं कवचं काञ्चनप्रभम् ।<br>व्यशीर्यत रथोपेस्थे तिलशः पतितं भुवि ॥३४॥<br>ततः शरसहस्रेण सङ्क्रुद्धो रावणात्मजः ।<br>बिभेद समरे वीरं लक्ष्मणं भीमविक्रमम् ॥३५॥<br>व्यशीर्यतापतद्दिव्यं कवचं लक्ष्मणस्य च ।<br>कृतप्रतिकृतान्योन्यं बभूवतुराभिद्रुतौ ॥३६॥<br>अभीक्ष्णं निःश्वसन्तौ तौ युध्येतां तुमुलं पुनः ।<br>शरसंनतसर्वाङ्गौ सर्वतो रुधिरोक्षितौ ॥३७॥<br>सुदीर्घकालं तौ वीरावन्योन्यं निशितैः शरैः ।<br>अयुध्येतां महासत्त्वौ जयाजयविवर्जितौ ॥३८॥<br>एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः पञ्चभिः शरैः ।<br>रावणेः सारथिं साश्वं रथं च समचूर्णयत् ॥३९॥<br>चिच्छेद कार्मुकं तस्य दर्शयन्हस्तलाघवम् ।<br>सोऽन्यत्तु कार्मुकं भद्रं सज्यं चक्रे त्वरान्वितः॥४०॥<br>तच्चापमपि चिच्छेद लक्ष्मणस्त्रिभिराशुगैः ।<br>तमेव छिन्नधन्वानं विव्याधानेकसायकैः ॥४१॥<br>पुनरन्यत्समादाय कार्मुकं भीमविक्रमः ।<br>इन्द्रजिल्लक्ष्मणं बाणैः शितैरादित्यसन्निभैः ॥४२॥<br>विभेद वानरान्सर्वांन्बाणैरापूरयन्दिशः ।<br>तत ऐन्द्रं समादाय लक्ष्मणो रावणिं प्रति ॥४३॥<br>सन्धायाकृष्य कर्णान्तं कार्मुकं दृढनिष्ठुरम् ।<br>उवाच लक्ष्मणो वीरः स्मरन् रामपदाम्बुजम् ॥४४॥तूने पहले युद्धमें मेरा पराक्रम न देखा हो तो मैं तुझे अभी दिखाये देता हूँ; तू जरा स्थिरतापूर्वक खड़ा रह।" ऐसा कह उस महावीर्यवान्ने सात बाणोंसे लक्ष्मणजीको, बड़ी पैनी धारवाले दश बाणोंसे हनुमान्जीको और क्रोधसे दूने उत्साहके साथ भली प्रकार छोड़े हुए सौ बाणोंसे विभीषणको वेध डाला । इधर लक्ष्मणजी भी शत्रुपर बाणोंकी वर्षा-सी करने लगे ॥३०-३३॥<br>उनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर मेघनादका सुवर्णकी-सी आभावाला कवच तिल-तिल होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़ा और फिर वहाँसे पृथिवीपर जा गिरा ॥३४॥ तब रावणकुमार मेघनादने संग्राममें अत्यन्त क्रोधित हो महापराक्रमी लक्ष्मणजीको हजारों बाणोंसे वींध डाला ॥३५॥ इससे लक्ष्मणजीका दिव्य कवच भी छिन्न-भिन्न होकर गिर पड़ा। इस प्रकार वे दोनों ही एक दूसरेकी क्रियाका प्रतिकार करते हुए आपसमें लड़ने लगे ॥३६॥ वे दोनों ही बारम्बार दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए बड़ा घोर युद्ध करने लगे । उनके शरीरोंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब ओरसे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर लोहू-लुहान हो गये ॥३७॥ वे दोनों महापराक्रमी वीर बड़ी देरतक एक दूसरेपर तीखे-तीखे बाण छोड़कर लड़ते रहे । उनमेंसे किसीकी भी जय अथवा पराजय न हुई ॥ ३८ ॥<br><br>इतनेहीमें वीरवर लक्ष्मणने पाँच बाण छोड़कर मेघनादके सारथि और घोड़ोंके सहित रथको चूर्ण कर डाला ॥३९॥ और अपने हाथकी सफाई दिखलाते हुए उसका धनुष भी काट डाला । तब मेघनादने तुरन्त ही दूसरा उत्तम धनुष चढ़ाया ॥४०॥ लक्ष्मणजीने तीन बाणोंसे उसे भी काट डाला, और धनुष-हीन हुए उस राक्षसको भी अनेक बाणोंसे बींध दिया ॥४१॥ फिर भीमविक्रम इन्द्रजित्ने एक और धनुष लेकर सूर्यके समान चमकीले और पैने बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त करते हुए लक्ष्मणजी तथा समस्त वानरोंको वेध डाला । तब लक्ष्मणजीने ऐन्द्र बाण निकालकर उसे मेघनादकी ओर लक्ष्य बाँधकर धनुषपर चढ़ाया और उस कठोर धनुषको कर्णपर्यन्त खींचकर वीरवर लक्ष्मणजी हृदयमें भगवान् रामके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए बोले— ॥४२-