भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२८० अध्यात्मरामायण [सर्ग ९


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि ।<br>त्रिलोक्यामप्रतिद्वन्द्वस्तदेनं जहि रावणिम् ॥४५॥<br>इत्युक्त्वा बाणमाकर्णाद्विकृष्य तमजिह्मगम् ।<br>लक्ष्मणः समरे वीरः ससर्जेन्द्रजितं प्रति ॥४६॥<br>स शरः सशिरस्त्राणं श्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।<br>प्रमथ्येन्द्रजितः कायात्पातयामास भूतले ॥४७॥४४॥ "यदि दशरथनन्दन भगवान् राम परम धार्मिक, सत्यकी मर्यादा रखनेवाले और त्रिलोकीमें प्रतिद्वन्द्वी (मुकाबिला करनेवाले) से रहित हैं तो हे बाण ! तू इस मेघनादको मार डाल"॥४५॥ वीरवर लक्ष्मणजीने रणभूमिमें ऐसा कह उस सीधे जानेवाले बाणको कानतक खींचकर इन्द्रजित्‌की ओर छोड़ दिया ॥४६॥ उस बाणने शीर्षत्राणके सहित इन्द्रजित्‌के कान्तिमान् मस्तकको, जिसमें अति उज्ज्वल कुण्डल झिलमिला रहे थे, काटकर धड़से पृथ्वीपर गिरा दिया ॥४७॥
ततः प्रमुदिता देवाः कीर्तयन्तो रघूत्तमम् ।<br>ववर्षुः पुष्पवर्षाणि स्तुवन्तश्च मुहुर्मुहुः ॥४८॥<br>जहर्ष शक्रो भगवान्सह देवैर्महर्षिभिः ।<br>आकाशेऽपि च देवानां शुश्रुवे दुन्दुभिस्वनः ॥४९॥<br>विमलं गगनं चासीत्स्थिराभूद्विश्वधारिणी ।<br>निहतं रावणिं दृष्ट्वा जयजल्पसमन्वितः ॥५०॥<br>गतश्रमः स सौमित्रिः शङ्खमापूरयद्रणे ।<br>सिंहनादं ततः कृत्वा ज्याशब्दमकरोद्विभुः ॥५१॥<br>तेन नादेन संहृष्टा वानराश्च गतश्रमाः ।<br>वानरेन्द्रैश्च सहितः स्तूयद्भिर्हृष्टमानसैः ॥५२॥<br>लक्ष्मणः परितुष्टात्मा ददर्शाभ्येत्य राघवम् ।<br>हनूमद्राक्षसाभ्यां च सहितो विनयान्वितः ॥५३॥<br>ववन्दे भ्रातरं रामं ज्येष्ठं नारायणं विभुम् ।<br>त्वत्प्रसादाद्रघुश्रेष्ठ हतो रावणिरहवे ॥५४॥इस प्रकार मेघनादके मारे जानेपर देवगण प्रसन्न होकर रघुश्रेष्ठ लक्ष्मणजीका गुण गाने और उनकी बारम्बार प्रशंसा कर पुष्प बरसाने लगे ॥४८॥ देवता और महर्षियोंके सहित भगवान् इन्द्र अति हर्षित हुए। उस समय आकाशमण्डलमें भी देवताओंके नगाड़ोंका शब्द सुनायी देने लगा ॥४९॥ रावणके पुत्र मेघनादको मारा गया देख सर्वत्र जयजयकार शब्द भर गया। आकाश निर्मल हो गया और जगद्धात्री धरणी स्थिर हो गयी ॥५०॥ जब लक्ष्मणजीकी थकान उतर गयी तो उन्होंने शङ्ख बजाकर रणभूमिको गुञ्जायमान कर दिया और फिर भयङ्कर सिंहनाद कर अपने धनुषकी टङ्कार की ॥ ५१॥ उस सिंहनादसे समस्त वानरगण अति आनन्दित और श्रमहीन हो गये। फिर प्रसन्नचित्त वानर वीरोंसे प्रशंसित होते हुए श्रीलक्ष्मणजीने उन सबके साथ प्रसन्न-मनसे श्रीरघुनाथजीके पास आ उनका दर्शन किया। श्रीलक्ष्मणजीने हनुमान् और विभीषणके सहित अति विनयपूर्वक अपने ज्येष्ठ भ्राता साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् रामको प्रणाम कर कहा—"हे रघुश्रेष्ठ! आपकी कृपासे इन्द्रजित् युद्धमें मारा गया" ॥५२–५४॥
श्रुत्वा तल्लक्ष्मणोक्त्या तमालिङ्ग्य रघूत्तमः ।<br>मूर्धन्यवघ्राय मुदितः सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥५५॥<br>साधु लक्ष्मण तुष्टोऽस्मि कर्म ते दुष्करं कृतम् ।<br>मेघनादस्य निधने जितं सर्वमरिन्दम ॥५६॥लक्ष्मणजीके ये भक्तिमय वचन सुनकर श्रीरघुनाथजीने अति प्रसन्न होकर उनका आलिङ्गन किया और फिर प्रेमपूर्वक सिर सूँघकर कहा—॥५५॥ "लक्ष्मण ! तुम धन्य हो ! मैं तुम्हारे इस कार्यसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, आज तुमने बड़ा ही कठिन कार्य किया है। हे शत्रुदमन ! इस मेघनादके मारे जानेसे