भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ९ ]युद्धकाण्ड२८१
अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथञ्चिद्विनिपातितः। <br> निःसपत्नः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥५७॥ <br> पुत्रशोकान्मया योद्धुं तं हनिष्यामि रावणम् ॥५८॥हमने मानो सभी कुछ जीत लिया ॥५६॥ तुमने तीन दिन और तीन रात्रितक निरन्तर संग्राम कर किसी प्रकार उस महान् योद्धाको मार डाला। इससे आज तुमने मुझे शत्रुहीन कर दिया। अब पुत्र-शोकसे व्याकुल हुआ रावण मुझसे लड़ने आयेगा, सो उसे मैं मार डालूँगा" ॥५७-५८॥
मेघनादं हतं श्रुत्वा लक्ष्मणेन महाबलम् । <br> रावणः पतितो भूमौ मूर्च्छितः पुनरुत्थितः। <br> विललापातिदीनात्मा पुत्रशोकेन रावणः ॥५९॥महाबली मेघनादको लक्ष्मणजीद्वारा मारा गया सुन रावण मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़ा और फिर मूर्च्छासे उठनेपर पुत्र-शोकसे अत्यन्त दीन होकर विलाप करने लगा ॥५९॥
पुत्रस्य गुणकर्माणि संस्मरन्पर्यदेवयत् । <br> अद्य देवगणाः सर्वे लोकपाला महर्षयः ॥६०॥ <br> हतमिन्द्रजितं ज्ञात्वा सुखं स्वप्स्यन्ति निर्भयाः। <br> इत्यादि बहुशः पुत्रलालसो विललाप ह ॥६१॥पुत्रके गुण और कर्मोंका स्मरण कर वह अत्यन्त शोक करने लगा। 'आज समस्त देवता, लोकपाल और महर्षिगण इन्द्रजित्‌को मारा गया सुनकर निर्भयतापूर्वक सुखसे सोयेंगे' इस प्रकार पुत्रकी आसक्तिवश वह भाँति-भाँतिसे विलाप करने लगा ॥६०-६१॥
ततः परमसंक्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः । <br> उवाच राक्षसान्सर्वान्त्रिनाशयिषुराहवे ॥६२॥तदनन्तर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने शत्रुओंको युद्धमें नष्ट करानेकी कामनासे समस्त राक्षसोंसे बातचीत करने लगा ॥६२॥
स पुत्रवधसन्तप्तः शूरः क्रोधवशं गतः । <br> संवीक्ष्य रावणो बुद्ध्या हन्तुं सीतां प्रदुद्रुवे ॥६३॥फिर, शूरवीर रावण पुत्र-शोकसे व्याकुल हो अपनी बुद्धिसे कुछ सोचकर क्रोधपूर्वक सीताजीको मारनेके लिये दौड़ा (अर्थात् शोक और क्रोधके कारण वह ऐसे निन्द्य कर्मको ही अपना कर्तव्य मान बैठा) ॥६३॥
खड्गपाणिमथायान्तं क्रुद्धं दृष्ट्वा दशाननम् । <br> राक्षसीमध्यगा सीता भयशोकाकुलाऽभवत् ॥६४॥रावणको हाथमें खड्ग लिये क्रोधपूर्वक अपनी ओर आता देख राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई सीताजी भयभीत हो गयीं ॥६४॥
एतस्मिन्नन्तरे तस्य सचिवो बुद्धिमान् शुचिः। <br> सुपार्श्वो नाम मेधावी रावणं वाक्यमब्रवीत् ॥६५॥इसी समय रावणके सुपार्श्व नामक मन्त्रीने, जो परमबुद्धिमान् शुद्ध-हृदय और विचारवान् था, उससे कहा-॥६५॥
ननु नाम दशग्रीव साक्षाद्वैश्रवणानुजः। <br> वेदविद्याव्रतस्नातः स्वकर्मपरिनिष्ठितः ॥६६॥"अहो दशानन ! यह क्या ? आप तो साक्षात् विश्रवानन्दन कुबेरजीके छोटे भाई हैं, वेदविद्यामें निपुण और यज्ञान्तमें स्नान करनेवाले एवं स्वधर्मपरायण हैं ॥६६॥
अनेकगुणसम्पन्नः कथं स्त्रीवधमिच्छसि । <br> अस्माभिः सहितो युद्धे हत्वा रामं च लक्ष्मणम्। <br> प्राप्स्यसे जानकीं शीघ्रमित्युक्तः स न्यवर्तत ॥६७॥इस प्रकार अनेक गुणसम्पन्न होकर भी आप स्त्री-वध करना कैसे चाहते हैं? हम सबको साथ लेकर आप राम और लक्ष्मणको युद्धमें मारकर बहुत शीघ्र जानकीको प्राप्त कर लेंगे।" सुपार्श्वके इस प्रकार समझानेपर रावण लौट आया ॥६७॥
ततो दुरात्मा सुहृदा निवेदितं <br> वचः सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावणः ।तदनन्तर दुरात्मा रावण अपने बन्धुके कहे हुए धर्मानुकूल वाक्योंको ग्रहणकर शोकसे मूढबुद्धि हो तुरन्त

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