अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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गृहं जगामाशु शुचा विमूढधीः<br>पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥६८॥ | अपने घर गया और फिर दूसरे दिन अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ सभामें आया ॥६८॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
दशम सर्ग
रावणका यज्ञ-विध्वंस तथा उसका मन्दोदरीको समझाना।
श्रीमहादेव उवाच
स विचार्य सभामध्ये राक्षसैः सह मन्त्रिभिः।
निर्ययौ येऽवशिष्टास्तै राक्षसैः सह राघवम् ॥ १ ॥
शलभः शलमैर्युक्तः प्रज्वलन्तमिवानलम् ।
ततो रामेण निहताः सर्वे ते राक्षसा युधि ॥ २ ॥
स्वयं रामेण निहतस्तीक्ष्णबाणेन वक्षसि ।
व्यथितस्त्वरितं लङ्कां प्रविवेश दशाननः ॥ ३ ॥
दृष्ट्वा रामस्य बहुशः पौरुषं चाप्यमानुषम् ।
रावणो मारुतेश्चैव शीघ्रं शुक्रान्तिकं ययौ ॥ ४ ॥
नमस्कृत्य दशग्रीवः शुक्रं प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
भगवन् राघवेणैवं लङ्का राक्षसयूथपैः ॥ ५ ॥
विनाशिता महादैत्या निहताः पुत्रबान्धवाः ।
कथं मे दुःखसन्दोहस्त्वयि तिष्ठति सद्गुरौ ॥ ६ ॥
इति विज्ञापितो दैत्यगुरुः प्राह दशाननम् ।
होमं कुरु प्रयत्नेन रहसि त्वं दशानन ॥ ७ ॥
यदि विघ्नो न चेद्धोमे तर्हि होमानलोत्थितः ॥ ८ ॥
महान् रथश्च वाहाश्च चापतूणीरसायकाः ।
सम्भविष्यन्ति तैर्युक्तस्त्वमजेयो भविष्यसि ॥ ९ ॥
गृहाण मन्त्रान्मद्दत्तान् गच्छ होमं कुरु द्रुतम् ।
इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा रावणो राक्षसाधिपः ॥१०॥
गुहां पातालसदृशीं मन्दिरे स्वे चकार ह ।
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! फिर रावण सभा-में अपने राक्षस-मन्त्रियोंके साथ विचार कर पतङ्ग जिस प्रकार अन्यान्य पतङ्गोंके साथ प्रज्वलित अग्निपर गिरता है उसी प्रकार बचे-खुचे राक्षसोंको लेकर रघुनाथजीके पास चला; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त राक्षसोंको युद्धमें मार डाला ॥१-२॥ और स्वयं रावण भी हृदयमें भगवान् रामका तीक्ष्ण बाण लगनेसे व्याकुल हो तुरन्त लङ्कामें लौट आया ॥३॥
भगवान् राम और हनुमान्जीके बहुत-से अतिमानुष पौरुष देखकर रावण अतिशीघ्रतासे शुक्राचार्यजीके पास गया ॥४॥ और उन्हें नमस्कार कर वह हाथ जोड़कर कहने लगा—"भगवन् ! रामने समस्त राक्षस-यूथपोंके सहित लङ्कापुरी नष्ट कर दी और जितने बड़े-बड़े दैत्य और मेरे बन्धु-बान्धव थे वे सभी मार डाले ! आप-जैसे सद्गुरुके रहते हमें यह महान् दुःख क्यों देखना पड़ा ?" ॥५-६॥ रावणके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दैत्यगुरु शुक्राचार्यजीने उससे कहा— "हे दशानन ! तुम जैसे होसके वैसे किसी एकान्त देशमें हवन करो ॥७॥ यदि तुम्हारे हवनमें कोई विघ्न न हुआ तो उस होमाग्निसे एक बहुत बड़ा रथ, घोड़े, धनुष, तरकश और बाण उत्पन्न होंगे । उन्हें पाकर तुम अजेय हो जाओगे ॥८-९॥ मेरे दिये हुए मन्त्रोंको ग्रहण करो और इनसे तुरन्त जाकर हवन करो।"
शुक्राचार्यजीके इस प्रकार कहनेपर राक्षसराज रावणने तुरन्त ही जाकर अपने महलमें एक पातालके