भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग १० ]युद्धकाण्ड२८३
लङ्काद्वारकपाटादि बद्ध्वा सर्वत्र यत्नतः ॥११॥<br><br>होमद्रव्याणि सम्पाद्य यान्युक्तान्याभिचारिके।<br>गुहां प्रविश्य चैकान्ते मौनी होमं प्रचक्रमे ॥१२॥समान गम्भीर गुहा तैयार करायी और बड़ी सावधानीसे लङ्काके सब द्वारोंके फाटक आदि बन्द करा दिये १०-११ तथा शास्त्रोंमें अभिचार कर्मोंकी जो-जो हवन-सामग्रियाँ बतायी गयी हैं वे सब एकत्रित कीं और गुहामें घुसकर एकान्तमें मौनावलम्बनपूर्वक होम करने लगा ॥ १२ ॥
उत्थितं धूममालोक्य महान्तं रावणानुजः ।<br>रामाय दर्शयामास होमधूमं भयाकुलः ॥१३॥<br><br>पश्य राम दशग्रीवो होमं कर्तुं समारभत् ।<br>यदि होमः समाप्तः स्यात्तदाऽजेयो भविष्यति ॥१४॥<br><br>अतो विघ्नाय होमस्य प्रेष्याशु हरीश्वरान् ।<br>तथेति रामः सुग्रीवसम्मतेनाङ्गदं कपिम् ॥१५॥<br><br>हनूमत्प्रमुखान्वीरानादिदेश महाबलान् ।<br>प्राकारं लङ्घयित्वा ते गत्वा रावणमन्दिरम् ॥१६॥<br><br>दशकोटयः प्लवङ्गानां गत्वा मन्दिररक्षकान् ।<br>चूर्णयामासुरश्वांश्च गजांश्च न्यहनन् क्षणात् ॥१७॥तब रावणके छोटे भाई विभीषणने बड़ा भारी धुआँ उठते देख अति भयभीत हो उसे श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया ॥१३॥ (और कहा—)"हे राम ! देखिये, दशशीशने हवन करना आरम्भ किया है; यदि यह हवन (निर्विघ्न) समाप्त हो गया तो वह अजेय हो जायगा ॥१४॥ अतः इसमें विघ्न डालनेके लिये शीघ्र ही वानर-सेनापतियोंको भेजिये ।" तब रघुनाथजीने 'अच्छा' कहकर सुग्रीवकी सम्मतिसे कपिवर अंगद और हनुमान् आदि महाबलवान् वानर-वीरोंको आज्ञा दी। वे सब नगरके परकोटेको लाँघकर रावणके महलपर पहुँचे ॥ १५-१६ ॥ इन दश करोड़ वानरोंने वहाँ पहुँचकर महलके द्वारपालोंको चूर्ण कर डाला और एक क्षणमें ही बहुत-से घोड़ों तथा हाथियोंका संहार कर दिया ॥ १७॥
ततश्च सरमा नाम प्रभाते हस्तसंज्ञया ।<br>विभीषणस्य भार्या सा होमस्थानमसूचयत् ॥१८॥<br><br>गुहापिधानपाषाणमङ्गदः पादघट्टनैः ।<br>चूर्णयित्वा महासत्त्वः प्रविवेश महागुहाम् ॥१९॥<br><br>दृष्ट्वा दशाननं तत्र मीलिताक्षं दृढासनम् ।<br>ततोऽङ्गदाज्ञया सर्वे वानरा विविशुर्द्रुतम् ॥२०॥<br><br>तत्र कोलाहलं चक्रुस्ताडयन्तश्च सेवकान् ।<br>सम्भारांश्चिक्षिपुस्तस्य होमकुण्डे समन्ततः ॥२१॥<br><br>स्रुवमाच्छिद्य हस्ताच्च रावणस्य वलाद्रुषा ।<br>तेनैव सञ्जघानाशु हनूमान् प्लवगाग्रणीः ॥२२॥<br><br>घ्नन्ति दन्तैश्च काष्ठैश्च वानरास्तमितस्ततः ।<br>न जहौ रावणो ध्यानं हतोऽपि विजिगीषया ॥२३॥(इस प्रकार लङ्कामें रातभर बड़ा भारी कोलाहल मचा रहा)। प्रातःकाल होते ही विभीषणकी भार्या सरमाने हाथके संकेतसे होमस्थान बतला दिया ॥१८॥ गुहाको ढँकनेके लिये उसके मुखपर रखे हुए पत्थरको महापराक्रमी अंगद पैरकी ठोकरसे चूर-चूरकर उस महाकन्दरामें घुस गये ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने रावणको नेत्र मूँदे, दृढ़ आसन लगाये बैठे देखा। तदनन्तर अंगदजीकी आज्ञासे समस्त वानरगण तुरन्त उस गुहामें घुस गये ॥ २० ॥ गुहामें घुसकर वे सेवकोंको पीटने और बड़ा भारी कोलाहल करने लगे, तथा जहाँ-तहाँ रखी हुई यज्ञ-सामग्रीको उन्होंने हवनकुण्डमें डाल दिया ॥ २१ ॥ वानराग्रणी हनुमान्‌जीने अति रोषपूर्वक बलात्कारसे रावणके हाथसे स्रुवा छीनकर उसीसे उसपर आघात किया ॥ २२ ॥ वानरगण रावणपर इधर-उधरसे दाँतों और लकड़ियोंसे प्रहार कर रहे थे; किन्तु उसने विजयकी कामनासे इस प्रकार आहत होनेपर भी अपना ध्यान नहीं छोड़ा ॥ २३ ॥
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