अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १०
प्रविश्यान्तःपुरे वेश्मन्यङ्गदो वेगवत्तरः । समानयत्केशबन्धे धृत्वा मन्दोदरीं शुभाम् ॥ २४ ॥ रावणस्यैव पुरतो विलपन्तीमनाथवत् । विद्ददाराङ्गदस्तस्याः कञ्चुकं रत्नभूषितम् ॥ २५ ॥ मुक्ता विमुक्ताः पतिताः समन्ताद्रत्नसञ्चयैः । श्रोणिसूत्रं निपतितं त्रुटितं रत्नचित्रितम् ॥ २६ ॥ कटिप्रदेशाद्विस्रस्ता नीवी तस्यैव पश्यतः । भूषणानि च सर्वाणि पतितानि समन्ततः ॥ २७ ॥ देवगन्धर्वकन्याश्च नीता हृष्टैः प्लवङ्गमैः । मन्दोदरी रुरोदाथ रावणस्याग्रतो भृशम् ॥ २८ ॥ क्रोशन्ती करुणं दीना जगाद दशकन्धरम् । निर्लज्जोऽसि परैरेवं केशपाशे विकृष्यते ॥ २९ ॥ भार्या तवैव पुरतः किं जुहोषि न लज्जसे । हन्यते पश्यतो यस्य भार्या पापैश्च शत्रुभिः ॥ ३० ॥ मर्त्तव्यं तेन तत्रैव जीवितान्मरणं वरम् । हा मेघनाद ते माता क्लिश्यते बत वानरैः ॥ ३१ ॥ त्वयि जीवति मे दुःखमीदृशं च कथं भवेत् । भार्या लज्जा च सन्त्यक्ता भर्त्रा मे जीविताशया॥ ३२ ॥ श्रुत्वा तद्देवितं राजा मन्दोदर्या दशाननः । उत्तस्थौ खड्गमादाय त्यज देवीमिति ब्रुवन् ॥ ३३ ॥ जघानाङ्कदमव्यग्रः कटिदेशे दशाननः । तदोत्सृज्य ययुः सर्वे विध्वंस्य हवनं महत् ॥ ३४ ॥ रामपार्श्वमुपागम्य तस्थुः सर्वे प्रहर्षिताः ॥ ३५ ॥ रावणस्तु ततो भार्यामुवाच परिसान्त्वयन् । दैवाधीनमिदं भद्रे जीवता किं न दृश्यते ।
तत्र अत्यन्त वेगवान् अंगदजी अन्तःपुरमें जाकर तुरन्त ही शुभलक्षणा मन्दोदरीको चोटी पकड़कर ले आये ॥ २४ ॥ और रावणके सामने ही उन्होंने अनाथके समान विलाप करती हुई मन्दोदरीकी रत्न-जटित कञ्चुकी (चोली) फाड़ डाली ॥ २५॥ उसके मोती टूट-टूटकर रत्नसमूहके सहित सब ओर बिखर गये, (इसी प्रकार) मन्दोदरीकी रत्नजटित करधनी भी टूटकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥ रावणके देखते-देखते ही उसके अधोवस्त्रका बन्धन ढीला पड़कर कटि-प्रदेशसे खिसक गया और समस्त आभूषण जहाँ-तहाँ गिर गये ॥ २७ ॥ ऐसे ही अन्यान्य वानरगण भी कुतूहलवश देव और गन्धर्व आदिकी कन्याओंको (जो रावणकी पत्नियाँ थीं) पकड़ लाये । तब मन्दोदरी रावणके सामने अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ २८ ॥ और करुणावश अति दीन होकर रावणसे कहने लगी, "अहो! तुम बड़े निर्लज्ज हो । तुम्हारे सामने ही शत्रुगण तुम्हारी भार्याको चोटी पकड़कर खींच रहे हैं, और फिर भी तुम हवन कर रहे हो ! क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती ? जिसकी भार्याको उसीके सामने पापी शत्रुगण मारते हों उसे तो वहीं मर जाना चाहिये । उसके जीनेसे तो मरना ही अच्छा है । हा मेघनाद ! आज तेरी माता वानरोंके हाथोंमें पड़कर क्लेश पा रही है ? ॥ २९-३१ ॥ बेटा ! तेरे जीते रहनेपर मुझे यह दुःख क्यों देखना पड़ता ? मेरे पतिने तो अपना जीवन बचानेके लिये अपनी स्त्री और लज्जासे भी मुँह मोड़ लिया है !" ॥ ३२ ॥
मन्दोदरीका यह विलाप सुनकर राक्षसराज रावण हाथमें खड्ग लेकर 'अरे देवीको छोड़ो' यों कहता हुआ उठा ॥ ३३ ॥ रावणने उठते ही अंगदजीकी कमरमें प्रहार किया । तब समस्त वानरगण उसका महायज्ञ विध्वंस कर वहाँसे चल दिये ॥ ३४॥ और सबके सब अति प्रसन्न हो रघुनाथजीके पास आ उपस्थित हुए ॥ ३५॥
तब रावण अपनी भार्या मन्दोदरीको ढाँढस बँधाते हुए बोला—"हे कल्याणि ! ये सुख-दुःखादि दैवके अधीन हैं—जीता हुआ प्राणी क्या नहीं देखता ?