अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग १०] युद्धकाण्ड २८५
| त्यज शोकं विशालाक्षि ज्ञानमालम्ब्य निश्चितम्<br>अज्ञानप्रभवः शोकः शोको ज्ञानविनाशकृत् ॥३६॥ | अतः हे विशालनयनि ! इस निश्चित ज्ञानका आश्रयकर तुम शोक छोड़ दो ॥ ३६ ॥ शोक अज्ञानसे होता है और वह ज्ञानको नष्ट कर देता है । शरीरादि |
| अज्ञानप्रभवाऽहन्धीः शरीरादिष्वनात्मसु ॥३७॥ | अनात्म-पदार्थोंमें अहं-बुद्धि भी अज्ञानसे ही होती है ॥ ३७ ॥ इस मिथ्या अहंकारके कारण ही पुत्र, स्त्री आदिका सम्बन्ध होता है और इन सम्बन्धोंमें आस्था होनेसे ही जन्म-मरणरूप संसार तथा हर्ष, शोक, भय, क्रोध, लोभ, मोह और स्पृहा आदि होते हैं ॥ ३८ ॥ ये जन्म, मृत्यु और जरा आदि अवस्थाएँ अज्ञान-जन्य ही हैं । आत्मा तो एकमात्र, शुद्ध, सबसे पृथक् और असंग है ॥ ३९ ॥ वह आनन्दस्वरूप, ज्ञानमय और समस्त भावोंसे रहित है । उस सत्स्वरूपका कभी किसीसे संयोग-वियोग नहीं होता ॥ ४० ॥ हे अनिन्दिते ! अपने आत्माका ऐसा स्वरूप जानकर तुम शोक छोड़ दो; मैं अभी जाता हूँ, और या तो लक्ष्मणसहित रामको मार कर ही आऊँगा या श्रीराम ही अपने वज्रसदृश बाणोंसे मुझे छिन्न-भिन्न कर देंगे । तब मैं उनके पदको प्राप्त होऊँगा ॥४१-४२॥ हे प्रिये ! मेरी आज्ञासे तब तुम मेरे लिये एक काम करना; तुम सीताको मारकर उसे लेकर अग्निमें प्रवेश कर जाना" ॥ ४३ ॥ |
| तन्मूलः पुत्रदारादिसम्बन्धः संसृतिस्ततः ।<br>हर्षशोकमयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ॥३८॥ | |
| अज्ञानप्रभवा होते जन्ममृत्युजरादयः ।<br>आत्मा तु केवलः शुद्धो व्यतिरिक्तो ह्यलेपकः ॥३९॥ | |
| आनन्दरूपो ज्ञातात्मा सर्वभावविवर्जितः ।<br>न संयोगो वियोगो वा विद्यते केनचित्सतः ॥४०॥ | |
| एवं ज्ञात्वा स्वमात्मानं त्यज शोकमनिन्दिते ।<br>इदानीमेव गच्छामि हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ॥४१॥ | |
| आगमिष्यामि नोचेन्मां दारयिष्यति सायकैः ।<br>श्रीरामो वज्रकल्पैश्च ततो गच्छामि तत्पदम् ॥४२॥ | |
| तदा त्वया मे कर्तव्या क्रिया मच्छासनात्प्रिये ।<br>सीतां हत्वा यया सार्धं त्वं प्रवेक्ष्यसि पावकम् ॥४३॥ | |
| एवं श्रुत्वा वचस्तस्य रावणस्यातिदुःखिता ।<br>उवाच नाथ मे वाक्यं शृणु सत्यं तथा कुरु ॥४४॥ | रावणके ये वचन सुनकर मन्दोदरीने अति दुःखित होकर कहा—"प्रभो ! मैं आपसे ठीक-ठीक बात कहती हूँ, आप उसे सुनकर वैसा ही कीजिये ॥४४। |
| शक्यो न राघवो जेतुं त्वया चान्यैः कदाचन ।<br>रामो देववरः साक्षात्प्रधानपुरुषेश्वरः ॥४५॥ | राम तुमसे अथवा और भी किसीसे कभी नहीं जीते जा सकते । देवाधिदेव भगवान् राम साक्षात् प्रकृति और पुरुषके नियामक हैं ॥४५॥ भक्तवत्सल रघुनाथजी ने ही कल्पके आरम्भमें मत्स्यरूप होकर वैवस्वतमनुकी समस्त आपत्तियोंसे रक्षा की थी ॥ ४६ ॥ भगवान् राम ही पूर्वकालमें एक लक्ष योजन विस्तारवाले कच्छप हुए थे और समुद्र-मन्थनके समय इन्हींने अपनी पीठपर सुमेरु पर्वतको धारण किया था ॥ ४७ ॥ किसी समय वराहरूप धारण कर पृथिवीका उद्धार करते समय इन्हीं महात्माने महादुराचारी हिरण्याक्ष दैत्यको मारा था ॥ ४८ ॥ इन रघुनन्दनने ही नृसिंह-शरीरसे त्रिलोकीके कण्टकरूप हिरण्यकशिपु दैत्यको मारा |
| मत्स्यो भूत्वा पुरा कल्पे मनुं चैवस्वतं प्रभुः ।<br>ररक्ष सकलापद्भ्यो राघवो भक्तवत्सलः ॥४६॥ | |
| रामः कूर्मोऽभवत्पूर्वं लक्षयोजनविस्तृतः ।<br>समुद्रमथने पृष्ठे दधार कनकाचलम् ॥४७॥ | |
| हिरण्याक्षोऽतिदुर्वृत्तो हतोऽनेन महात्मना ।<br>क्रोडरूपेण वपुषा क्षोणीमुद्धरता क्वचित् ॥४८॥ | |
| त्रिलोककण्टकं दैत्यं हिरण्यकशिपुं पुरा ।<br>हतवान्नारसिंहेन वपुषा रघुनन्दनः ॥४९॥ |