अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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विक्रमैस्त्रिभिरेवासौ बलिं बद्ध्वा जगत्त्रयम् ।<br>आक्रम्यादात्सुरेन्द्राय भृत्याय रघूत्तमः ॥५०॥<br>राक्षसाः क्षत्रियाकारा जाता भूमेर्भरावहाः ।<br>तान्हत्वा बहुशो रामो भुवं जित्वा ह्यदान्मुनेः॥५१॥<br>स एव साम्प्रतं जातो रघुवंशे परात्परः ।<br>भवदर्थे रघुश्रेष्ठो मानुषत्वमुपागतः ॥५२॥<br>तस्य भार्या किमर्थं वा हृता सीता वनाद्वलात् ।<br>मम पुत्रविनाशार्थं स्वस्याऽपि निधनाय च ॥५३॥<br>इतः परं वा वैदेहीं प्रेषयस्व रघूत्तमे ।<br>विभीषणाय राज्यं तु दत्त्वा गच्छामहे वनम् ॥५४॥<br>मन्दोदरीवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।<br>कथं भद्रे रणे पुत्रान् भ्रातृन् राक्षसमण्डलम् ॥५५॥<br>घातयित्वा राघवेण जीवामि वनगोचरः ।<br>रामेण सह योत्स्यामि रामबाणैः सुशीघ्रगैः ॥५६॥<br>विदार्यमाणो यास्यामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।<br>जानामि राघवं विष्णुं लक्ष्मीं जानामि जानकीम् ।<br>ज्ञात्वैव जानकी सीता मयाऽऽनीता वनाद्वलात् ५७<br>रामेण निधनं प्राप्य यास्यामीति परं पदम् ।<br>विमुच्य त्वां तु संसाराद्गमिष्यामि सह प्रिये ॥५८॥<br>परानन्दमयी शुद्धा सेव्यते या मुमुक्षुभिः ।<br>तां गतिं तु गमिष्यामि हतो रामेण संयुगे ॥५९॥<br>प्रक्षाल्य कल्मषाणीह मुक्तिं यास्यामि दुर्लभाम् ६०<br>क्लेशादिपञ्चकतरङ्गयुतं भ्रमाढ्यं<br>दारात्मजाप्तधनबन्धुझषाभियुक्तम् ।<br>और्वानलाभनिजरोषमनङ्गजातं<br>संसारसागरमतीत्य हरिं व्रजामि ॥६१॥ | था ॥ ४९ ॥ और इन्हीं रघुश्रेष्ठने ( वामन अवतारमें ) बलिको बाँधकर सम्पूर्ण त्रिलोकीको तीन ही पगोंसे नापकर अपने सेवक इन्द्रको दे दिया था ॥ ५० ॥ जिस समय राक्षसगण क्षत्रियरूपसे उत्पन्न होकर पृथिवीके भाररूप हुए, तब इन्हींने परशुरामरूपसे उन्हें कई बार संग्राममें मारा और पृथिवीको जीत-कर उसे कश्यप मुनिको दे दिया ॥ ५१ ॥ इस समय वे ही परात्पर प्रभु रघुवंशमें रामरूपसे अवतीर्ण होकर आपके लिये मनुष्यरूप हुए हैं ॥ ५२ ॥ आपने उनकी स्त्री सीताको मेरे पुत्रके नाशके लिये और अपनी भी मौत बुलानेके लिये भला, बलात्कारसे तपोवनसे क्यों चुरा लिया ? ॥ ५३ ॥ आप अब भी जानकीको रघुनाथजीके पास भेज दीजिये; फिर विभीषणको राज्य देकर हम वनको चलेंगे" ॥ ५४ ॥<br><br>मन्दोदरीके वचन सुनकर रावण बोला—"अयि भद्रे ! युद्धमें रघुनाथजीसे अपने पुत्र, भ्राता और राक्षस-समूहका नाश कराकर भला मैं वनवासी होकर कैसे जीवन काट सकता हूँ ? अब तो मैं भी रामके साथ युद्ध करूँगा और उनके शीघ्रगामी बाणोंसे विद्ध होकर उन विष्णुभगवान्के परमधामको जाऊँगा । मैं रामको साक्षात् विष्णु और जानकीको भगवती लक्ष्मी जानता हूँ । और यह जानकर ही कि 'रामके हाथसे मरकर उनका परमपद प्राप्त करूँगा' मैं जनकनन्दिनी सीताको बलात्कारसे तपोवनसे ले आया था । हे प्रिये ! अब मैं तुम्हें छोड़कर अपने अन्यान्य राक्षस वीरोंके साथ संसारसे कूच करूँगा ॥ ५५—५८ ॥ और मुमुक्षुगण जिस परमानन्दमयी विशुद्ध गतिका सेवन करते हैं, संग्राममें भगवान् रामके हाथसे मरकर मैं उसी गतिको प्राप्त करूँगा ॥ ५९ ॥ इस प्रकार अपने समस्त पाप-पुञ्जका प्रक्षालन कर मैं दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त करूँगा ॥ ६० ॥ जिसमें ( अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक ) पाँच क्लेश ही तरंगें हैं, भ्रमरूप भँवरें हैं, स्त्री पुत्र स्वजन विभव और बन्धु आदि मत्स्य हैं, अपना क्रोधरूपी बड़वानल है तथा कामरूपी जाल फैलाया हुआ है उस संसार-सागरको पारकर अब मैं श्रीहरिके निकट जाऊँगा" ॥ ६१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥