अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
पृष्ठ 316, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 316
सर्ग ११] युद्धकाण्ड २८७
एकादश सर्ग
राम-रावण-संग्राम और रावणका वध ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! महाराज मन्दोदरीको प्रेमपूर्वक इस प्रकार समझा-बुझाकर रावण श्रीरामचन्द्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये रणभूमिको चला ॥ १ ॥ |
|---|---|
| इत्युक्त्वा वचनं प्रेम्णा राज्ञीं मन्दोदरीं तदा।<br>रावणः प्रययौ योद्धुं रामेण सह संयुगे ॥ १ ॥ | वह महाभयंकर राक्षसोंसे घिरकर एक सुदृढ़ रथपर सवार हुआ । उस रथमें सोलह पहिये तथा वरूथ<sup>१</sup> और कूबर<sup>२</sup> लगे हुए थे ॥ २ ॥ |
| दृढं स्यन्दनमास्थाय वृतो घोरैर्निशाचरैः ।<br>चक्रैः षोडशभिर्युक्तं सवरूथं सकूबरम् ॥ २ ॥ | वह पिशाचके समान मुखवाले गदहोंके जुते रहनेसे अति भयानक जान पड़ता था तथा सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एवं समस्त युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था ॥ ३ ॥ |
| पिशाचवदनैर्घोरैः खरैर्युक्तं भयावहम् ।<br>सर्वास्त्रशस्त्रसहितं सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार महाभयंकर राक्षसराज रावण लंकापुरीसे निकला । |
| निष्क्रामाथ सहसा रावणो भीषणाकृतिः ।<br>आयान्तं रावणं दृष्ट्वा भीषणं रणकर्कशम् ॥ ४ ॥ | युद्धमें अत्यन्त निष्ठुर भीषणाकार रावणको आते देख भगवान् रामसे सुरक्षित वानर-सेना भयभीत हो गयी ॥ ४-५ ॥ |
| सन्त्रस्ताऽभूत्तदा सेना वानरी रामपालिता ॥ ५ ॥ | तब हनुमान्जी रावणसे युद्ध करनेके लिये उछलकर सामने आये । |
| हनूमानथ चोत्प्लुत्य रावणं योद्धुमाययौ ।<br>आगत्य हनुमान् रक्षोवक्षस्यतुलविक्रमः ॥ ६ ॥ | वहाँ आते ही अतुलितपराक्रमी पवनकुमारने कसकर मुट्ठी बाँध और बड़े वेगसे उस राक्षसकी छातीमें प्रहार किया । |
| मुष्टिबन्धं दृढं बद्ध्वा ताडयामास वेगतः ।<br>तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्रथे ॥ ७ ॥ | उस घूँसेके लगते ही वह रथमें घुटनोंके बल गिर गया ॥ ६-७ ॥ |
| मूर्च्छितोऽथ मुहूर्तेन रावणः पुनरुत्थितः ।<br>उवाच च हनूमन्तं शूरोऽसि मम सम्मतः ॥ ८ ॥ | एक मुहूर्त मूर्च्छित रहनेके अनन्तर रावण को फिर चेत हुआ । तब उसने हनुमान्जीसे कहा— "मैं मानता हूँ, तू वास्तवमें बड़ा शूरवीर है" ॥ ८ ॥ |
| हनूमानाह तं धिङ्मां यस्त्वं जीवसि रावण ।<br>त्वं तावन्मुष्टिना वक्षो मम ताडय रावण ॥ ९ ॥ | हनुमान्जीने कहा— "अरे रावण ! मुझे धिक्कार है कि (मेरा घूँसा खाकर भी) तू जीता रह गया । अच्छा, अब तू मेरी छातीमें घूँसा मार ॥ ९ ॥ |
| पश्चान्मया हतः प्राणान्मोक्ष्यसे नात्र संशयः ।<br>तथेति मुष्टिना वक्षो रावणेनाऽपि ताडितः ॥ १० ॥ | फिर मेरा घूँसा लगनेपर तू प्राण छोड़ देगा, इसमें सन्देह नहीं । तब रावणने 'अच्छा' ऐसा कहकर उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १० ॥ |
| विघूर्णमाननयनः किञ्चित्कश्मलमाययौ ।<br>संज्ञामवाप्य कपिराट् रावणं हन्तुमुद्यतः ॥ ११ ॥ | उसके लगनेसे उनके नेत्र घूमने लगे और वे कुछ तिलमिला उठे फिर चेत होनेपर कपिराज हनुमान्जी रावणको मारनेके लिये तैयार हुए ॥ ११ ॥ |
| ततोऽन्यत्र गतो भीत्या रावणो राक्षसाधिपः।<br>हनूमानङ्गदश्चैव नलो नीलस्तथैव च ॥ १२ ॥ | तब राक्षसराज रावण भयभीत होकर कहीं अन्यत्र चला गया । हनुमान्, अंगद, नल और नील इन चारोंने एकत्र होकर अपने |
| चत्वारः समवेत्याग्रे दृष्ट्वा राक्षसपुङ्गवान् ।<br>अग्निवर्णं तथा सर्परोमाणं खङ्गरोमकम् ॥ १३ ॥ | सामने अग्निवर्ण, सर्परोमा, खड्गरोमा और वृश्चिकरोमा |
<sup>१</sup> रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहे आदिका आवरण ।
<sup>२</sup> रथका वह भाग जिसपर जूआ बाँधा जाता है।