भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ११] युद्धकाण्ड २८७


एकादश सर्ग

राम-रावण-संग्राम और रावणका वध ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! महाराज मन्दोदरीको प्रेमपूर्वक इस प्रकार समझा-बुझाकर रावण श्रीरामचन्द्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये रणभूमिको चला ॥ १ ॥
इत्युक्त्वा वचनं प्रेम्णा राज्ञीं मन्दोदरीं तदा।<br>रावणः प्रययौ योद्धुं रामेण सह संयुगे ॥ १ ॥वह महाभयंकर राक्षसोंसे घिरकर एक सुदृढ़ रथपर सवार हुआ । उस रथमें सोलह पहिये तथा वरूथ<sup></sup> और कूबर<sup></sup> लगे हुए थे ॥ २ ॥
दृढं स्यन्दनमास्थाय वृतो घोरैर्निशाचरैः ।<br>चक्रैः षोडशभिर्युक्तं सवरूथं सकूबरम् ॥ २ ॥वह पिशाचके समान मुखवाले गदहोंके जुते रहनेसे अति भयानक जान पड़ता था तथा सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एवं समस्त युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था ॥ ३ ॥
पिशाचवदनैर्घोरैः खरैर्युक्तं भयावहम् ।<br>सर्वास्त्रशस्त्रसहितं सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३ ॥इस प्रकार महाभयंकर राक्षसराज रावण लंकापुरीसे निकला ।
निष्क्रामाथ सहसा रावणो भीषणाकृतिः ।<br>आयान्तं रावणं दृष्ट्वा भीषणं रणकर्कशम् ॥ ४ ॥युद्धमें अत्यन्त निष्ठुर भीषणाकार रावणको आते देख भगवान् रामसे सुरक्षित वानर-सेना भयभीत हो गयी ॥ ४-५ ॥
सन्त्रस्ताऽभूत्तदा सेना वानरी रामपालिता ॥ ५ ॥तब हनुमान्‌जी रावणसे युद्ध करनेके लिये उछलकर सामने आये ।
हनूमानथ चोत्प्लुत्य रावणं योद्धुमाययौ ।<br>आगत्य हनुमान् रक्षोवक्षस्यतुलविक्रमः ॥ ६ ॥वहाँ आते ही अतुलितपराक्रमी पवनकुमारने कसकर मुट्ठी बाँध और बड़े वेगसे उस राक्षसकी छातीमें प्रहार किया ।
मुष्टिबन्धं दृढं बद्ध्वा ताडयामास वेगतः ।<br>तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्रथे ॥ ७ ॥उस घूँसेके लगते ही वह रथमें घुटनोंके बल गिर गया ॥ ६-७ ॥
मूर्च्छितोऽथ मुहूर्तेन रावणः पुनरुत्थितः ।<br>उवाच च हनूमन्तं शूरोऽसि मम सम्मतः ॥ ८ ॥एक मुहूर्त मूर्च्छित रहनेके अनन्तर रावण को फिर चेत हुआ । तब उसने हनुमान्‌जीसे कहा— "मैं मानता हूँ, तू वास्तवमें बड़ा शूरवीर है" ॥ ८ ॥
हनूमानाह तं धिङ्मां यस्त्वं जीवसि रावण ।<br>त्वं तावन्मुष्टिना वक्षो मम ताडय रावण ॥ ९ ॥हनुमान्‌जीने कहा— "अरे रावण ! मुझे धिक्कार है कि (मेरा घूँसा खाकर भी) तू जीता रह गया । अच्छा, अब तू मेरी छातीमें घूँसा मार ॥ ९ ॥
पश्चान्मया हतः प्राणान्मोक्ष्यसे नात्र संशयः ।<br>तथेति मुष्टिना वक्षो रावणेनाऽपि ताडितः ॥ १० ॥फिर मेरा घूँसा लगनेपर तू प्राण छोड़ देगा, इसमें सन्देह नहीं । तब रावणने 'अच्छा' ऐसा कहकर उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १० ॥
विघूर्णमाननयनः किञ्चित्कश्मलमाययौ ।<br>संज्ञामवाप्य कपिराट् रावणं हन्तुमुद्यतः ॥ ११ ॥उसके लगनेसे उनके नेत्र घूमने लगे और वे कुछ तिलमिला उठे फिर चेत होनेपर कपिराज हनुमान्‌जी रावणको मारनेके लिये तैयार हुए ॥ ११ ॥
ततोऽन्यत्र गतो भीत्या रावणो राक्षसाधिपः।<br>हनूमानङ्गदश्चैव नलो नीलस्तथैव च ॥ १२ ॥तब राक्षसराज रावण भयभीत होकर कहीं अन्यत्र चला गया । हनुमान्, अंगद, नल और नील इन चारोंने एकत्र होकर अपने
चत्वारः समवेत्याग्रे दृष्ट्वा राक्षसपुङ्गवान् ।<br>अग्निवर्णं तथा सर्परोमाणं खङ्गरोमकम् ॥ १३ ॥सामने अग्निवर्ण, सर्परोमा, खड्गरोमा और वृश्चिकरोमा

<sup></sup> रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहे आदिका आवरण ।
<sup></sup> रथका वह भाग जिसपर जूआ बाँधा जाता है।