अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८८ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग ११ |
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तथा वृश्चिकरोमाणं निर्जघ्नुः क्रमशोऽसुरान् ।<br>चत्वारश्चतुरो हत्वा राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>सिंहनादं पृथक् कृत्वा रामपार्श्वमुपागताः ॥१४॥<br><br>ततः क्रुद्धो दशग्रीवः सन्दश्य दशनच्छदम् ॥१५॥<br>विवृत्य नयने क्रूरे राममेवान्वधावत ।<br>दशग्रीवो रथस्थस्तु रामं वज्रोपमैः शरैः ॥१६॥<br>आजघान महाघोरैर्धाराभिरिव तोयदः ।<br>रामस्य पुरतः सर्वांन्वानरानपि विव्यथे ॥१७॥<br>ततः पावकसङ्काशैः शरैः काञ्चनभूषणैः ।<br>अभ्यवर्षद्रणे रामो दशग्रीवं समाहितः ॥१८॥<br>रथस्थं रावणं दृष्ट्वा भूमिष्ठं रघुनन्दनम् ।<br>आहूय मातलिं शक्रो वचनं चेदमब्रवीत् ॥१९॥<br>रथेन मम भूमिष्ठं शीघ्रं याहि रघूत्तमम् ।<br>त्वरितं भूतलं गत्वा कुरु कार्यं ममानघ ॥२०॥<br><br>एवमुक्तोऽथ तं नत्वा मातलिर्देवसारथिः ।<br>ततो हयैश्च संयोज्य हरितैः स्यन्दनोत्तमम् ॥२१॥<br>स्वर्गाज्जयार्थं रामस्य ह्युपचक्राम मातलिः ।<br>प्राञ्जलिर्देवराजेन प्रेषितोऽस्मि रघूत्तम ॥२२॥<br>रथोऽयं देवराजस्य विजयाय तव प्रभो ।<br>प्रेषितश्च महाराज धनुरैन्द्रं च भूषितम् ॥२३॥<br>अभेद्यं कवचं खड्गं दिव्यतूणीयुगं तथा ।<br>आरुह्य च रथं राम रावणं जहि राक्षसम् ॥२४॥<br>मया सारथिना देव वृत्रं देवपतिर्यथा ।<br><br>इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य रथोत्तमम् ॥२५॥<br>आरुरोह रथं रामो लोकाँल्लक्ष्म्या नियोजयन् । | नामक चार राक्षसोंको खड़े देखा। तब उन चारोंने क्रमशः इन चारों महापराक्रमी राक्षसोंको मार डाला और फिर पृथक्-पृथक् गरजते हुए श्रीरघुनाथजीके पास आ खड़े हुए ॥ १२-१४ ॥<br><br>तदनन्तर अत्यन्त क्रूर दशग्रीव (रावण) क्रुद्ध होकर दाँतोंसे ओठ चबाता हुआ आँखें फाड़कर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर ही दौड़ा। रावण रथमें चढ़ा हुआ था (और श्रीरघुनाथजी रथहीन थे तो भी) वह, मेघ जिस प्रकार जलकी धाराएँ बरसाता है वैसे ही महाभयंकर वज्र-सदृश बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करने लगा और भगवान् रामके सामने ही उसने समस्त वानरोंको भी व्यथित कर दिया ॥ १५-१७ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजी भी सावधान होकर रणभूमिमें रावणपर अग्निके समान तेजस्वी सुवर्ण-भूषित बाणोंकी वर्षा करने लगे। इन्द्रने जब देखा कि रावण रथपर चढ़ा हुआ है और श्रीरघुनाथजी पृथिवीपर ही खड़े हैं तो उसने अपने सारथि मातलिको बुलाकर कहा—॥१८-१९॥ "हे अनघ ! देखो रघुनाथजी पृथिवीपर खड़े हैं, तुम तुरन्त मेरा रथ लेकर भूलोकमें उनके पास जाओ और मेरा कार्य करो" ॥ २०॥<br><br>इन्द्रकी यह आज्ञा पाकर देवसारथि मातलिने उन्हें नमस्कार किया और उनके उत्तम रथमें हरे रंगके घोड़े जोतकर भगवान् रामकी विजयके लिये स्वर्गसे चलकर उनके पास उपस्थित हुआ तथा उनसे हाथ जोड़कर बोला—"हे रघुश्रेष्ठ ! मुझे देवराज इन्द्रने भेजा है ॥ २१-२२ ॥ हे प्रभो ! यह रथ इन्द्रका ही है, इसे उन्होंने आपकी विजयके लिये भेजा है। हे महाराज ! इसके साथ ही यह अति शोभायमान ऐन्द्र धनुष, अभेद्य कवच, खड्ग और दो दिव्य तूणीर भी भेजे हैं। हे राम ! मुझ सारथीके साथ, इन्द्रने जिस प्रकार वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार हे देव ! आप इस रथपर आरूढ होकर राक्षस रावणका वध कीजिये।"<br><br>मातलिके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी परिक्रमा कर उसे नमस्कार किया ॥२३-२५॥ और सम्पूर्ण लोकोंको श्रीसम्पन्न करते हुए उसपर