भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 423 में से

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पृष्ठ 318

सर्ग ११] युद्धकाण्ड २८९


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽभवन्महायुद्धं भैरवं रोमहर्षणम् ॥२६॥<br>महात्मनो राघवस्य रावणस्य च धीमतः ।<br>आग्नेयेन च आग्नेयं दैवं दैवेन राघवः ॥२७॥<br>अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ।<br>ततस्तु ससृजे घोरं राक्षसं चास्त्रमस्त्रवित् ॥<br>क्रोधेन महताऽऽविष्टो रामस्योपरि रावणः ॥२८॥<br>रावणस्य धनुर्मुक्ताः सर्पा भूत्वा महाविषाः ।<br>शराः काञ्चनपुङ्खाभा राघवं परितोऽपतन् ॥२९॥<br>तैः शरैः सर्पवदनैर्वमद्भिरनलं मुखैः ।<br>दिशश्च विदिशश्चैव व्याप्तास्तत्र तदाऽभवन् ॥३०॥<br>रामः सर्पांस्ततो दृष्ट्वा समन्तात्परिपूरितान् ।<br>सौपर्णमस्त्रं तद्घोरं पुरः प्रावर्तयद्रणे ॥३१॥<br>रामेण मुक्तास्ते बाणा भूत्वा गरुडरूपिणः ।<br>चिच्छिदुः सर्पबाणांस्तान्स मन्तात्सर्पशत्रवः ॥३२॥<br>अस्त्रे प्रतिहते युद्धे रामेण दशकन्धरः ।<br>अभ्यवर्षत्ततो रामं घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥३३॥<br>ततः पुनः शरानीकै राममक्लिष्टकारिणम् ।<br>अर्दयित्वा तु घोरेण मातलिं प्रत्यविध्यत ॥३४॥<br>पातयित्वा रथो पस्थे रथकेतुं च काञ्चनम् ।<br>ऐन्द्रानश्वानभ्यहनद्रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥३५॥<br><br>विषेदुर्देवगन्धर्वाश्चारणाः पितरस्तथा ।<br>आर्त्ताकारं हरिं दृष्ट्वा व्यथिताश्च महर्षयः ॥३६॥<br>व्यथिता वानरेन्द्राश्च बभूवुः सविभीषणाः ।<br>दशास्यो विंशतिभुजः प्रगृहीतशरासनः ॥३७॥<br>ददृशे रावणस्तत्र मैनाक इव पर्वतः ।<br>रामस्तु भ्रुकुटिं बद्ध्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥३८॥<br>कोपं चकार सदृशं निर्दहन्निव राक्षसम् ।<br>धनुरादाय देवेन्द्रधनुराकारमद्भुतम् ॥३९॥<br>गृहीत्वा पाणिना बाणं कालानलसमप्रभम् ।<br>निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां ददृशे रिपुमन्तिके ॥४०॥<br>३७आरूढ़ हुए। फिर महात्मा राम और बुद्धिमान् रावणका महाभयानक और रोमाञ्चकारी घोर युद्ध होने लगा । अस्त्र-विद्यामें परम कुशल श्रीरामचन्द्रजीने रावणके आग्नेयास्त्रको आग्नेयास्त्रसे और दैवास्त्रको दैवास्त्रसे काट डाला । तब अस्त्रविद्याविशारद रावणने अत्यन्त क्रोधाविष्ट हो श्रीरामचन्द्रजीपर महाभयंकर राक्षसास्त्र छोड़ा ॥२६—२८॥ रावणके धनुषसे छूटे हुए बाण, जो सुवर्णमय पंखसे भासमान हो रहे थे, महाविषधर सर्प होकर श्रीरघुनाथजीके चारों ओर गिरने लगे ॥ २९॥ जिनके मुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं रावणके उन सर्पमुख-बाणोंसे उस समय सम्पूर्ण दिशा-विदिशाएँ व्याप्त हो गयीं ॥ ३० ॥ रामने जब रणभूमिमें सब ओर सर्पोंको व्याप्त देखा तो महाभयंकर गारुडास्त्र छोड़ा ॥ ३१॥ श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े हुए वे बाण सर्पोंके शत्रु गरुड होकर जहाँ-तहाँ सर्परूप बाणोंको काटने लगे ॥ ३२॥ इस प्रकार भगवान् रामद्वारा अपने शस्त्रको नष्ट हुआ देख रावणने उनके ऊपर भयंकर बाण-वर्षा की ॥ ३३ ॥ और फिर लीलाविहारी भगवान् रामको अति तीव्र बाणावलीसे पीड़ित कर मातलिको वेध डाला ॥ ३४ ॥ (इतना ही नहीं) क्रोधसे उन्मत्त हुए रावणने रथकी सुवर्णमयी ध्वजा काट कर उसके पृष्ठ भागपर गिरा दी और इन्द्रके घोड़ोंको भी हताहत कर दिया ॥३५॥<br><br>भगवान्‌को इस आपत्तिमें देखकर देवता, गन्धर्व, चारण और पितर आदि विषादग्रस्त हो गये तथा महर्षिगण मन-ही-मन दुःख मानने लगे ॥ ३६ ॥ विभीषणके सहित समस्त वानर-यूथपतिगण अति चिन्तित हुए । उस समय हाथमें धनुषबाण लिये दश मुख और बीस भुजाओंवाला रावण मैनाक पर्वतके समान दीख पड़ता था । भगवान् रामके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, उनकी त्यौरी चढ़ गयी और उस राक्षसको मानो जला डालेंगे ऐसा क्रोध करते हुए उन्होंने इन्द्र-धनुषके समान एक विचित्र धनुष उठाया तथा हाथमें एक कालाग्निके समान तेजोमय बाण लेकर अपने नेत्रोंसे समीपवर्ती शत्रु की ओर इस प्रकार निहारा मानो भस्म कर देंगे ॥३७-४०॥ काल-
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