भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२९० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ११

पराक्रमं दर्शयितुं तेजसा प्रज्वलन्निव ।
प्रचक्रमे कालरूपी सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४१॥

विकृष्य चापं रामस्तु रावणं प्रतिविध्य च ।
हर्षयन्वानरानीकं कालान्तक इवाबभौ ॥४२॥

क्रुद्धं रामस्य वदनं दृष्ट्वा शत्रुं प्रधावतः ।
तत्रसुः सर्वभूतानि चचाल च वसुन्धरा ॥४३॥

रामं दृष्ट्वा महारौद्रमुत्पातांश्च सुदारुणान् ।
त्रस्तानि सर्वभूतानि रावणं चाविशद्भयम् ॥४४॥

विमानस्थाः सुरगणाः सिद्धगन्धर्वकिन्नराः ।
ददृशुः सुमहायुद्धं लोकसंवर्तकोपमम् ।
ऐन्द्रमस्त्रं समादाय रावणस्य शिरोऽच्छिनत् ॥४५॥

मूर्धानो रावणस्याथ बहवो रुधिरोक्षिताः ।
गगनात्प्रपतन्तिस्म तालादिव फलानि हि ॥४६॥

न दिनं न च वै रात्रिर्न सन्ध्या न दिशोऽपि वा ।
प्रकाशन्ते न तद्रूपं दृश्यते तत्र सङ्गरे ॥४७॥

ततो रामो बभूवाथ विस्मयाविष्टमानसः ।
शतमेकोत्तरं छिन्नं शिरसां चैकवर्चसाम् ॥४८॥

न चैव रावणः शान्तो दृश्यते जीवितक्षयात्
ततः सर्वास्त्रविद्वीरः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥४९॥

अस्त्रैश्च बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामास राघवः ।
यैर्येर्बाणैर्हता दैत्या महासत्त्वपराक्रमाः ॥५०॥

त एते निष्फलं याता रावणस्य निपातने ।
इति चिन्ताकुले रामे समीपस्थो विभीषणः ॥५१॥

उवाच राघवं वाक्यं ब्रह्मदत्तवरो ह्यसौ ।
विच्छिन्ना बाहवोऽप्यस्य विच्छिन्नानि शिरांसि च
उत्पत्स्यन्ति पुनः शीघ्रमित्याह भगवानजः । | रूपी भगवान् रामने अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो सम्पूर्ण लोकोंके सामने अपना पराक्रम दिखाना आरम्भ किया ॥ ४१ ॥ उन्होंने अपना धनुष खींचकर रावण को वींध डाला । और वे सम्पूर्ण वानर-सेनाको आनन्दित करते हुए लोकान्तकारी कालके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४२ ॥

शत्रुपर धावा करते हुए भगवान् रामका क्रोधयुक्त मुख देखकर समस्त प्राणी भयभीत हो गये और पृथिवी डगमगाने लगी ॥ ४३ ॥ रामको अति रौद्र-रूप और इन दारुण उत्पातोंको देखकर समस्त जीवोंमें त्रास छा गया और रावणके अन्तःकरणमें भी आतंक समा गया ॥ ४४ ॥ उस समय देवता, सिद्ध, गन्धर्व और किन्नरगण विमानोंपर चढ़े हुए संसारके महाप्रलयके समान इस घोर युद्धको देख रहे थे । इसी बीचमें श्रीरामचन्द्रजीने ऐन्द्रास्त्र छोड़कर रावणके शिर काट डाले ॥४५॥ तब रावणके बहुत-से शिर रुधिरसे लथपथ हो आकाश-मण्डलसे इस प्रकार गिरने लगे जैसे ताल-वृक्षसे उसके फल गिरते हैं ॥ ४६ ॥ उस समय दिन, रात, सन्ध्या अथवा दिशाएँ आदि कुछ भी स्पष्ट नहीं जान पड़ती थीं तथा उस संग्राम-भूमिमें रावणका रूप भी दिखायी नहीं देता था (केवल कटे हुए शिर ही दीख पड़ते थे) ॥ ४७ ॥

तब तो श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा ही विस्मय हुआ (वे सोचने लगे) 'मैंने समान-तेज-सम्पन्न एक सौ एक शिर काटे हैं ॥ ४८ ॥ किन्तु फिर भी रावण प्राण-नाशसे शान्त हुआ दिखायी नहीं देता ।' तब अनेक अस्त्रोंसे युक्त सर्वास्त्रविशारद धीरवीर कौशल्यानन्दन रघुनाथजीने विचारा—"मैंने जिन-जिन बाणोंसे बड़े-बड़े तेजस्वी और पराक्रमी दैत्योंको मारा था, इस रावणका वध करनेमें वे सभी निष्फल हो गये।”

भगवान् रामको इस प्रकार चिन्ताग्रस्त देख उनके पास खड़े हुए विभीषणने कहा—"भगवन् ! ब्रह्माजीने इसे एक वर दिया था । उन्होंने कहा था कि इसकी 'भुजाएँ और शिर बारम्बार काट दिये जानेपर भी फिर तुरन्त नये उत्पन्न हो जायेंगे।' इसके नाभि-

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