अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ११] युद्धकाण्ड २९१
[संस्कृत श्लोक]
नाभिदेशेऽमृतं तस्य कुण्डलाकारसंस्थितम् ॥५३॥
तच्छोषयानलास्त्रेण तस्य मृत्युस्ततो भवेत् ।
विभीषणवचः श्रुत्वा रामः शीघ्रपराक्रमः ॥५४॥
पावकास्त्रेण संयोज्य नाभिं विव्याध रक्षसः ।
अनन्तरं च चिच्छेद शिरांसि च महाबलः ॥५५॥
बाहूनपि च संरब्धो रावणस्य रघूत्तमः ।
ततो घोरां महाशक्तिमादाय दशकन्धरः ॥५६॥
विभीषणवधार्थाय चिक्षेप क्रोधविह्वलः ।
चिच्छेद राघवो बाणैस्तां शितैर्हेमभूषितैः ॥५७॥
दशग्रीवशिरश्छेदात्तदा तेजो विनिर्गतम् ।
म्लानरूपो बभूवाथ छिन्नैः शीर्षैर्भयङ्करैः ॥५८॥
एकेन मुख्यशिरसा बाहुभ्यां रावणो बभौ ।
रावणस्तु पुनः क्रुद्धो नानाशस्त्रास्त्रवृष्टिभिः ॥५९॥
ववर्ष रामं तं रामस्तथा बाणैर्ववर्ष च ।
ततो युद्धमभूद्धोरं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥६०॥
अथ संस्मारयामास मातली राघवं तदा ।
विसृज्यास्त्रं वधायास्य ब्राह्मं शीघ्रं रघूत्तम ॥६१॥
विनाशकालः प्रथितो यः सुरैः सोऽद्य वर्तते ।
उत्तमाङ्गं न चैतस्य छेत्तव्यं राघव त्वया ॥६२॥
नैव शीर्ष्णि प्रभो वध्यो वध्य एव हि मर्मणि ।
ततः संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातलेः ॥६३॥
जग्राह सशरं दीप्तं निश्वसन्तमिवोरगम् ।
यस्य पार्श्वे तु पवनः फले भास्करपावकौ ॥६४॥
शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ।
पर्वस्वपि च विन्यस्ता लोकपाला महौजसः ॥६५॥
जाज्वल्यमानं वपुषा भातं भास्करवर्चसा ।
तमुग्रमस्त्रं लोकानां भयनाशनमद्भुतम् ॥६६॥
[हिन्दी अनुवाद]
देशमें कुण्डलाकारसे अमृत रखा हुआ है ॥४९-५३॥ उसे आप आग्नेयास्त्रसे सुखा डालिये, तभी इसकी मृत्यु हो जायगी ।” विभीषणके वचन सुनकर शीघ्रपराक्रमी भगवान् रामने अपने धनुषपर आग्नेयास्त्र चढ़ाकर उस राक्षसकी नाभिमें मारा और फिर महाबली रघुनाथजीने क्रोधित होकर उसके शिर और भुजाएँ काट डालीं ।
इसपर रावणने अत्यन्त क्रोधातुर हो विभीषणको मारनेके लिये एक महाभयानक शक्ति छोड़ी । किन्तु रघुनाथजीने उसे तुरन्त ही सुवर्णमण्डित तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला ॥ ५४-५७॥ रावणके शिर काटे जानेसे उसका तेज निकल गया और वह उन भयंकर शिरोंके कट जानेसे विरूप दिखायी देने लगा ॥५८॥ अब, रावणके एक मुख्य शिर और दो भुजाएँ रह गयी थीं । किन्तु फिर भी वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर भगवान् रामपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगा । इसी प्रकार रामने भी उसपर भयंकर वाणवर्षा की । फिर तो वहाँ अत्यन्त रोमाञ्चकारी घमासान युद्ध छिड़ गया ॥ ५९-६० ॥
तब मातलिने श्रीरामचन्द्रजीको स्मरण दिलाया कि “हे रघुश्रेष्ठ ! इसका वध करनेके लिये आप शीघ्र ही ब्रह्मास्त्र छोड़िये ॥ ६१ ॥ देवताओने इसके नाशका जो समय निश्चित किया है वह इस समय वर्तमान है । हे रघुनन्दन ! आप इसका मस्तक न काटियेगा ॥ ६२ ॥ (क्योंकि) हे प्रभो ! यह शिर काटनेसे नहीं मर सकता, बल्कि (हृदयरूप) मर्मस्थानके विद्ध होनेपर ही इसका अन्त हो सकता है ।” मातलिके इन वाक्योंसे स्मरण दिलाये जानेपर भगवान् रामने फुफकारते हुए सर्पके समान एक परम तेजस्वी बाण निकाला । उसके पार्श्वभागमें पवनकी, नोंकपर सूर्य और अग्निकी, गुरुता (भारीपन) में सुमेरु और मन्दराचलकी तथा गाँठोंमें महातेजस्वी लोकपालोंकी स्थापना की गयी थी, एवं उसका स्वरूप आकाशमय था ॥६३-६५॥ उसका आकार अत्यन्त देदीप्यमान होनेके कारण वह सूर्यके समान प्रकाशमान था । महाबाहु