अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| १२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
ब्रह्मोवाच
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| विष्णुर्मानुषरूपेण भविष्यति रघोः कुले ॥२९॥<br>यूयं सृजध्वं सर्वेऽपि वानरेष्वंशसम्भवान् ।<br>विष्णोः सहायं कुरुतं यावत्स्थास्यति भूतले ॥३०॥ | ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णु रघुकुलमें मनुष्य-रूपसे अवतार लेंगे। तुम लोग भी सब अपने-अपने अंशसे वानर-वंशमें पुत्र उत्पन्न करो तथा जबतक श्रीविष्णु भगवान् भूलोकमें रहें तबतक उनकी सहायता करते रहो ॥ २९-३० ॥ |
| इति देवान्समादिश्य समाश्वास्य च मेदिनीम्।<br>ययौ ब्रह्मा स्वभवनं विज्वरः सुखमास्थितः ॥३१॥ | इस प्रकार देवताओंको आज्ञा दे और पृथिवीको ढाढ़स बँधा ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और वहाँ निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ३१ ॥ |
| देवाश्च सर्वे हरिरूपधारिणः<br>स्थिताः सहायार्थमितस्ततो हरेः ।<br>महाबलाः पर्वतवृक्षयोधिनः<br>प्रतीक्षमाणा भगवन्तमिश्वरम् ॥३२॥ | इधर समस्त देवगण पर्वत और वृक्षोंसे लड़नेवाले महाबलवान् वानरोंका रूप धारण कर भगवान्की सहायताके लिये उनकी प्रतीक्षा करते हुए जहाँ-तहाँ रहने लगे ॥ ३२ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
भगवान्का जन्म और बाललीला
श्रीमहादेव उवाच
| संस्कृत | हिन्दी |
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| अथ राजा दशरथः श्रीमान्सत्यपरायणः ।<br>अयोध्यापतिर्वीरः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥ १॥<br>सोऽनपत्यत्वदुःखेन पीडितो गुरुमेकदा ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ २॥ | श्रीमहादेवजी बोले—एक बार सबलोकप्रसिद्ध सत्यपरायण श्रीमान् अयोध्यापति वीरवर महाराज दशरथने पुत्रके न होनेसे अत्यन्त दुःखित हो अपने कुलके आचार्य गुरुवर वशिष्ठजीको बुला उन्हें प्रणाम कर इस प्रकार कहा ॥ १-२ ॥ |
| स्वामिन्पुत्राः कथं मे स्युः सर्वलक्षणलक्षिताः ।<br>पुत्रहीनस्य मे राज्यं सर्वं दुःखाय कल्पते ॥ ३॥ | "स्वामिन् ! यह बताइये कि मेरे सर्व सुलक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र किस प्रकार हो सकते हैं ? क्योंकि बिना पुत्रके यह सम्पूर्ण राज्य मुझे दुःखरूप हो रहा है" ॥ ३ ॥ |
| ततोऽब्रवीद्वसिष्ठस्तं भविष्यन्ति सुतास्तव ।<br>चत्वारः सत्त्वसम्पन्ना लोकपाला इवापराः ॥ ४॥ | तब राजा दशरथसे वशिष्ठजीने कहा—"तुम्हारे साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अत्यन्त सामर्थ्यवान् चार पुत्र होंगे ॥ ४ ॥ |
| शान्ताभर्तारमानीय ऋष्यशृङ्गं तपोधनम् ।<br>अस्माभिः सहितः पुत्रकामेष्टिं शीघ्रमाचर ॥ ५॥ | तुम शान्ताके पति तपोधन ऋष्यशृंग※ को बुलाकर शीघ्र ही हमें साथ लेकर पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान करो" ॥ ५ ॥ |
※ ऋष्यशृंग मुनिवर विभाण्डकके पुत्र थे । एक बार विभाण्डक मुनि एक कुण्डमें समाधि लगाये बैठे थे, उस समय उधरसे उर्वशी अप्सरा निकली । उसे देखकर मुनिका वीर्य स्खलित हो गया । उसे जलके साथ एक मृगी पी गयी । उसीसे इनका जन्म हुआ । माताके समान इनके शिरपर भी शृङ्ग (सींग) होनेकी सम्भावना थी, इसलिये पिता विभाण्डकने इनका नाम ऋष्यशृङ्ग रखा । एक बार अङ्ग देशमें घोर अनावृष्टि हुई । उस संबंध...