अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ३ ] बालकाण्ड १३
तथेति मुनिनानीय मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।
यज्ञकर्म समारेभे मुनिभिर्वीतकल्मषैः ॥ ६ ॥
श्रद्धया हूयमानेऽग्नौ तप्तजाम्बूनदप्रभः।
पायसं स्वर्णपात्रस्थं गृहीत्वोवाच हव्यवाट् ॥ ७ ॥
गृहाण पायसं दिव्यं पुत्रियं देवनिर्मितम् ।
लप्स्यसे परमात्मानं पुत्रत्वेन न संशयः ॥ ८ ॥
इत्युक्त्वा पायसं दत्त्वा राज्ञे सोऽन्तर्दधेऽनलः।
ववन्दे मुनिशार्दूलौ राजा लब्धमनोरथः ॥ ९ ॥
वसिष्ठऋष्यशृङ्गाभ्यामनुज्ञातो ददौ हविः ।
कौसल्यायै सकैकैय्यै अर्धमर्धं प्रयत्नतः ॥ १० ॥
ततः सुमित्रा संप्राप्ता जगृध्नुः पौत्रिकं चरुम् ।
कौसल्या तु स्वभागार्धं ददौ तस्यै मुदान्विता ॥ ११ ॥
कैकैयी च स्वभागार्धं ददौ प्रीतिसमन्विता ।
उपभुज्य चरुं सर्वाः स्त्रियो गर्भसमन्विताः ॥ १२ ॥
देवता इव रेजुस्ताः स्वभासा राजमन्दिरे ।
दशमे मासि कौसल्या सुषुवे पुत्रमद्भुतम् ॥ १३ ॥
मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे ।
पुनर्वस्वृक्षसहिते उच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥ १४ ॥
मेषं पूषणि संप्राप्ते पुष्पवृष्टिसमाकुले ।
आविरासीज्जगन्नाथः परमात्मा सनातनः ॥ १५ ॥
नीलोत्पलदलश्यामः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।
जलजारुणनेत्रान्तः स्फुरत्कुण्डलमण्डितः ॥ १६ ॥
राजाने "बहुत अच्छा" कह मुनिवर ऋष्यशृंगको बुलाया और मन्त्रियोंके सहित पवित्र होकर निष्पाप मुनिजनोंकी सहायतासे यज्ञानुष्ठानं आरंभ किया ॥ ६ ॥ यज्ञानुष्ठानके समय अग्निमें श्रद्धापूर्वक आहुति देनेपर तप्त सुवर्णके समान दीप्तिमान् हव्यवाहन भगवान् अग्नि एक स्वर्णपात्रमें पायस लेकर प्रकट हुए और बोले ॥ ७ ॥ "हे राजन् ! यह देवताओंकी बनायी हुई पुत्र-प्रदायिनी दिव्य पायस (खीर) लो । इसके द्वारा तुम निस्सन्देह साक्षात् परमात्माको पुत्ररूपसे प्राप्त करोगे" ॥ ८ ॥
अग्निदेव ऐसा कहकर और वह खीर राजाको देकर अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर राजाने सफल-मनोरथ हो मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ और ऋष्यशृङ्गकी चरण-वन्दना की और उन दोनोंकी आज्ञासे बड़ी सावधानीके साथ वह हवि महारानी कौसल्या और कैकेयीमें आधी-आधी बाँट दी ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर उस पुत्र देनेवाले चरुको लेनेकी इच्छासे सुमित्राजी भी वहाँ आ पहुँचीं । इसपर कौसल्याजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने भागमेंसे आधा उन्हें दे दिया ॥ ११॥ तथा कैकेयीने भी प्रीतिपूर्वक अपने भागमेंसे आधा सुमित्राको दिया । इस प्रकार उस हविको खाकर सभी रानियाँ गर्भवती हो गयीं ॥ १२ ॥
वे तीनों रानियाँ उस राजभवनमें अपनी कान्तिसे देवताओंके समान शोभा पाने लगीं । फिर दशवाँ महीना लगनेपर कौसल्याने एक अद्भुत बालकको जन्म दिया ॥ १३ ॥ चैत्रमासके शुक्ल-पक्षकी नवमीके दिन कर्क-लग्नमें पुनर्वसु-नक्षत्रके समय जब कि पाँच ग्रह उच्च स्थानमें तथा सूर्य मेषराशिपर थे तब (मध्याह्न-कालमें) सनातन परमात्मा जगन्नाथका आविर्भाव हुआ । उस समय आकाश दिव्य पुष्पोंकी वर्षासे पूर्ण हो गया ॥ १४-१५॥ जो नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण हैं, पीताम्बर पहिने हुए हैं और चार भुजाएँ धारण किये हैं तथा जिनके नेत्रोंके भीतरका भाग अरुण
मुनियोंने अङ्गनरेश रोमपादसे कहा, यदि बाल्यब्रह्मचारी ऋष्यशृङ्गको यहाँ स्त्रियाँ लावें तो वृष्टि हो । राजाने इसके लिये वेश्याओंको नियुक्त किया । उनमेंसे एक ब्रह्मचारीका वेष बनाकर उन्हें मोहित कर ले आयी । उनके अङ्गदेशमें आते ही पुष्कल वर्षा हो गयी । राजाने उनका ऐसा अद्भुत प्रभाव देखकर उन्हें अपनी कन्या शान्ता विवाह दीं । कहीं-कहीं ऐसा भी कहा जाता है कि यह शान्ता महाराज दशरथकी पुत्री थी और इन्होंने इसे अपने मित्र रोमपादको गोद दे दिया था ।