अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ें१० १४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३
सहस्रार्कप्रतीकाशः किरीटी कुञ्चितालकः ।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविराजितः ॥१७॥
अनुग्रहाख्यहृत्स्थेन्दुसूचकस्मितचन्द्रिकः ।
करुणारससम्पूर्णविशालोत्पललोचनः ।
श्रीवत्सहारकेयूरनूपुरादिविभूषणः ॥१८॥
दृष्ट्वा तं परमात्मानं कौसल्या विस्मयाकुला ।
हर्षाश्रुपूर्णनयना नत्वा प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥१९॥
कौसल्योवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु शङ्खचक्रगदाधर ।
परमात्माऽच्युतोऽनन्तः पूर्णस्त्वं पुरुषोत्तमः॥२०॥
वदन्त्यगोचरं वाचां बुद्ध्यादीनामतीन्द्रियम् ।
त्वां वेदवादिनः सत्तामात्रं ज्ञानैकविग्रहम् ॥२१॥
त्वमेव मायया विश्वं सृजस्यवसि हंसि च ।
सत्त्वादिगुणसंयुक्तस्तुर्य एवामलः सदा ॥२२॥
करोषीव न कर्ता त्वं गच्छसीव न गच्छसि ।
शृणोषि न शृणोषीव पश्यसीव न पश्यसि ॥२३॥
अप्राणो ह्यमनाः शुद्ध इत्यादि श्रुतिरब्रवीत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्नपि न लक्ष्यसे ॥२४॥
अज्ञानध्वान्तचित्तानां व्यक्त एव सुमेधसाम् ।
जठरे तव दृश्यन्ते ब्रह्माण्डाः परमाणवः ॥२५॥
त्वं ममोदरसम्भूत इति लोकान्विडम्बसे ।
भक्तेषु पारवश्यं ते दृष्टं मेऽद्य रघूत्तम ॥२६॥
संसारसागरे मग्ना पतिपुत्रधनादिषु ।
भ्रमामि मायया तेऽद्य पादमूलमुपागता ॥२७॥
कमलके समान शोभायमान है, कानोंमें कान्तिमान् कुण्डल सुशोभित हैं ॥ १६ ॥ हजारों सूर्योंके समान जिनका प्रकाश है, जिनके शिरपर प्रकाशमान मुकुट और घुँघराली अलकें हैं, हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म तथा गलेमें वैजयन्ती-माला विराजमान है ॥ १७ ॥ जिनके मुख-कमलपर हृदयस्थ अनुग्रहरूप चन्द्रमाकी सूचना देनेवाली मुस्कानरूप चन्द्रिका छिटक रही है, जिनके करुणा-रस-पूर्ण नयन कमलदलके समान विशाल हैं तथा जो श्रीवत्स, हार, केयूर और नूपुर आदि आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥ १८ ॥ पुत्ररूपसे प्रकट हुए उन परमात्माको देखकर कौसल्याने विस्मयसे व्याकुल हो, नेत्रोंमें आनन्दाश्रु-भर, हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा ॥१९॥
श्रीकौसल्याजी बोलीं— हे देवदेव ! आपको नमस्कार है; हे शंख-चक्र-गदा-धर ! आप अच्युत और अनन्त परमात्मा हैं तथा सर्वत्र पूर्ण पुरुषोत्तम हैं ॥२०॥ वेदवादीगण आपको मन और वाणी आदिके अविषय तथा इन्द्रियोंसे अतीत सत्तामात्र और एकमात्र ज्ञान-स्वरूप बतलाते हैं ॥ २१ ॥ आप ही अपनी मायाके आश्रयसे सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे युक्त होकर इस विश्वकी रचना, पालन और संहार करते हैं तथापि वास्तवमें आप सदा निर्मल तुरीय पदमें स्थित हैं ॥ २२ ॥ आप कर्त्ता नहीं हैं तथापि करते-से प्रतीत होते हैं; चलते नहीं हैं फिर भी चलते-से मालूम पड़ते हैं, न सुनते हुए भी सुनते-से दिखायी देते हैं और न देखकर भी देखते हुए-से प्रतीत होते हैं ॥२३॥ भगवती श्रुति भी कहती है कि आप 'प्राण और मनसे रहित तथा शुद्ध' हैं। आप समस्त प्राणियोंमें समान-भावसे स्थित हैं, तथापि जिनका अन्तःकरण अज्ञानान्धकारसे ढँका हुआ है उन्हें आप दिखायी नहीं देते, आपका साक्षात्कार सुबुद्धि पुरुषोंको ही होता है । हे भगवन् ! आपके उदरमें अनेकों ब्रह्माण्ड परमाणुओंके समान दिखलायी देते हैं तथापि 'आपने मेरे पेटसे जन्म लिया' ऐसा जो आप लोगोंमें प्रकट कर रहे हैं इससे मैंने आज आपकी भक्त-वत्सलता देख ली ॥ २४–२६ ॥ हे प्रभो ! मैं आपकी मायासे मोहित होकर संसार-सागरमें डूबी हुई पति, पुत्र और धन आदिके फेरमें पड़ रही थी; आज परम सौभाग्यवश आपके चरण-कमलोंकी शरणमें आयी हूँ ॥ २७ ॥ हे देव !